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ईरान पर दबाव बनाने के लिए पाकिस्तान पर भरोसा करना अमेरिका को पड़ सकता है भारी, जानिए क्यों

ऊर्जा संकट, बलूचिस्तान की सुरक्षा और चीन के हितों के बीच फंसेगा इस्लामाबाद; तेहरान से रिश्ते बिगाड़ना पाकिस्तान के लिए आसान नहीं

ईरान पर दबाव बनाने के लिए पाकिस्तान पर भरोसा करना अमेरिका को पड़ सकता है भारी, जानिए क्यों
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इस्लामाबाद: ईरान पर अमेरिकी दबाव बढ़ाने की रणनीति में पाकिस्तान की भूमिका वाशिंगटन के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है। एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका अगर इस्लामाबाद से ईरान के खिलाफ प्रतिबंधों को सख्ती से लागू कराने या तेहरान पर अतिरिक्त दबाव डालने की उम्मीद करता है, तो उसे पाकिस्तान के अपने हितों को भी ध्यान में रखना होगा। पाकिस्तान की ऊर्जा जरूरतें, सीमावर्ती इलाकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय साझेदारियों के कारण ईरान के साथ उसके संबंध बेहद अहम हैं। ऐसे में अमेरिकी मांगों का पालन करना इस्लामाबाद के लिए सीधा और आसान फैसला नहीं होगा। ‘रियल क्लियर डिफेंस’ की रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिकी प्रतिबंधों और ईरान के तेल राजस्व पर दबाव ने तेहरान की आर्थिक क्षमता को प्रभावित किया है। हालांकि, इन प्रतिबंधों को और प्रभावी बनाने के लिए पाकिस्तान से सहयोग हासिल करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती हो सकता है। यदि ईरान और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ता है, तो इसका असर केवल दोनों देशों के राजनयिक संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।

ईरान से दूरी पाकिस्तान के ऊर्जा हितों के खिलाफ

पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसकी ऊर्जा जरूरतें हैं। ईरान लंबे समय से पाकिस्तान के लिए ऊर्जा सहयोग का संभावित साझेदार रहा है। दोनों देशों के बीच प्रस्तावित ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन इसका प्रमुख उदाहरण है। इस परियोजना का उद्देश्य ईरान से पाकिस्तान तक प्राकृतिक गैस पहुंचाना है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों और दूसरी बाधाओं के चलते यह योजना लंबे समय से अधूरी है। रिपोर्ट के अनुसार, ईरान अपनी ओर पाइपलाइन से संबंधित बुनियादी ढांचे का निर्माण कर चुका है, जबकि पाकिस्तान की ओर परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी है। तेहरान लगातार इस्लामाबाद से अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी करने की अपेक्षा करता रहा है। यदि पाकिस्तान अमेरिकी दबाव में ईरान के साथ ऊर्जा संबंधों को और सीमित करता है, तो दोनों देशों के बीच मतभेद गहरा सकते हैं। पाकिस्तान के लिए यह स्थिति इसलिए भी संवेदनशील है, क्योंकि उसे अपनी ऊर्जा आपूर्ति की जरूरतों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से जुड़े जोखिमों के बीच संतुलन बनाना है।

बलूचिस्तान में बढ़ सकती हैं सुरक्षा चुनौतियां

ईरान के साथ तनाव बढ़ने का असर पाकिस्तान के सीमावर्ती प्रांत बलूचिस्तान पर भी पड़ सकता है। यह इलाका पहले से ही सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना करता रहा है। सीमा पार आवाजाही, स्थानीय व्यापार और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे यहां की स्थिति को जटिल बनाते हैं। रिपोर्ट में ईरानी पेट्रोल और डीजल की सीमा पार तस्करी का भी उल्लेख किया गया है। बलूचिस्तान के कुछ इलाकों में इस कारोबार से स्थानीय व्यापारियों और समुदायों की आजीविका जुड़ी हुई है। यदि पाकिस्तान अमेरिकी दबाव में ईरानी ईंधन की आवाजाही पर सख्ती बढ़ाता है, तो स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है और सीमा क्षेत्र में असंतोष बढ़ने की आशंका पैदा हो सकती है। इसके अलावा, रिपोर्ट के मुताबिक मकरान तटीय क्षेत्र के कुछ हिस्सों में ईरान से मिलने वाली बिजली भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में ऊर्जा आपूर्ति या सीमा पार व्यापार में किसी तरह की बाधा स्थानीय लोगों की मुश्किलें बढ़ा सकती है।

चीन और सऊदी अरब के साथ संबंध भी अहम

ईरान के मुद्दे पर पाकिस्तान के फैसलों को चीन के साथ उसके रणनीतिक संबंधों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। रिपोर्ट के अनुसार, चीन ईरानी तेल का खरीदार है और खाड़ी क्षेत्र से ऊर्जा की निर्बाध आपूर्ति उसके लिए महत्वपूर्ण है। यदि पाकिस्तान अमेरिकी दबाव के तहत ईरान के खिलाफ अधिक सख्त रुख अपनाता है, तो उसे अपने करीबी साझेदार चीन के हितों का भी ध्यान रखना होगा। दूसरी ओर, सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान की रक्षा संबंधी प्रतिबद्धताएं उसकी रणनीतिक स्थिति को और पेचीदा बनाती हैं। इस्लामाबाद को एक ओर क्षेत्रीय सुरक्षा साझेदारियों को निभाना है, तो दूसरी ओर ईरान के साथ संबंधों को पूरी तरह बिगड़ने से बचाना है।

अमेरिका के लिए आसान नहीं होगी रणनीति

रिपोर्ट का मुख्य संकेत है कि ईरान पर दबाव बढ़ाने की अमेरिकी रणनीति में पाकिस्तान को एक साधन के रूप में देखना सीमित सोच साबित हो सकता है। इस्लामाबाद के लिए अपने आर्थिक और सुरक्षा हितों की अनदेखी करके अमेरिकी प्राथमिकताओं के अनुरूप कदम उठाना आसान नहीं होगा। यदि तेहरान और इस्लामाबाद के संबंध बिगड़ते हैं, तो ऊर्जा आपूर्ति, स्थानीय कारोबार और सीमावर्ती सुरक्षा पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए अमेरिका को पाकिस्तान से सहयोग की अपेक्षा करते समय क्षेत्रीय परिस्थितियों और उसके राष्ट्रीय हितों को भी समझना होगा। फिलहाल, ईरान के खिलाफ दबाव की नीति में पाकिस्तान की भूमिका इस बात पर निर्भर करेगी कि वह वाशिंगटन की अपेक्षाओं और अपने रणनीतिक हितों के बीच कितना संतुलन बना पाता है।


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