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US-ईरान वार्ता फेल: क्या यह तेहरान की रणनीतिक चाल? बदलते समीकरणों में किसके हाथ में बढ़त

विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति दरअसल ईरान की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकती है, जिसमें वह सैन्य टकराव से ज्यादा कूटनीतिक दबाव और आर्थिक संतुलन का खेल खेल रहा है।

US-ईरान वार्ता फेल: क्या यह तेहरान की रणनीतिक चाल? बदलते समीकरणों में किसके हाथ में बढ़त
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इस्लामाबाद/तेहरान/वॉशिंगटन: US-Iran Ceasefire Deal: इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच करीब 21 घंटे तक चली मैराथन शांति वार्ता भले ही किसी ठोस समझौते के बिना खत्म हो गई हो, लेकिन इसे सिर्फ कूटनीतिक विफलता के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं है। विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति दरअसल ईरान की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकती है, जिसमें वह सैन्य टकराव से ज्यादा कूटनीतिक दबाव और आर्थिक संतुलन का खेल खेल रहा है।

वार्ता का परिणाम और उसका संकेत

इस बातचीत का मकसद परमाणु मुद्दे और क्षेत्रीय तनाव को कम करना था, लेकिन कोई सहमति नहीं बन सकी। पहली नजर में यह गतिरोध लगता है, मगर गहराई से देखने पर संकेत मिलते हैं कि ईरान ने अपने रुख में कोई नरमी न दिखाकर एक संदेश दिया है, वह दबाव में आने वाला नहीं है। ईरान का मौजूदा रवैया ‘प्रतिरोध’ से आगे बढ़कर ‘मोलभाव’ की रणनीति जैसा दिखता है, जहां वह अपनी शर्तों पर समझौता करवाने की कोशिश कर रहा है।

भौगोलिक ताकत: ईरान की सबसे बड़ी पूंजी

ईरान की सबसे बड़ी ताकत उसकी भौगोलिक स्थिति है। वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास स्थित है, जो दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। यही वजह है कि ईरान को ‘आर्थिक नब्ज’ पर पकड़ रखने वाला देश माना जाता है। किसी भी तरह का तनाव या हलचल यहां पूरी दुनिया के तेल बाजार को प्रभावित कर सकती है। ईरान इसी रणनीतिक बढ़त का इस्तेमाल अमेरिका पर दबाव बनाने के लिए कर रहा है।

अमेरिका पर घरेलू दबाव

दूसरी ओर, अमेरिका कई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दबावों से घिरा हुआ है। देश में बढ़ती महंगाई और तेल की कीमतों में उछाल सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। इसके अलावा मिड-टर्म चुनाव नजदीक हैं, अंतरराष्ट्रीय दौरों और कूटनीतिक प्रतिबद्धताओं का दबाव है और लंबी सैन्य कार्रवाई से आर्थिक बोझ बढ़ने का खतरा है। इन परिस्थितियों में अमेरिका किसी लंबी जंग का जोखिम लेने से बचना चाहता है, जो उसकी रणनीति को सीमित करता है।

खाड़ी देशों और इजरायल की भूमिका

इस पूरे घटनाक्रम में खाड़ी देशों और इजरायल की भूमिका भी अहम मानी जा रही है। माना जा रहा है कि ये देश नहीं चाहते थे कि अमेरिका और ईरान के बीच कोई बड़ा समझौता हो। उनकी चिंता यह है कि अगर ईरान के साथ समझौता होता है, तो क्षेत्र में उसका प्रभाव और बढ़ सकता है। इससे शक्ति संतुलन बदल सकता है, जो इन देशों के हितों के खिलाफ होगा। इस वजह से पर्दे के पीछे की कूटनीतिक खींचतान ने भी वार्ता को प्रभावित किया हो सकता है।

ईरान की सैन्य स्थिति

सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान अभी भी मजबूत स्थिति में है। उसके पास मिसाइलों और ड्रोन का बड़ा जखीरा मौजूद है, जिसका एक बड़ा हिस्सा अब भी सुरक्षित बताया जा रहा है। इसका मतलब यह है कि ईरान लंबे समय तक संघर्ष झेलने की क्षमता रखता है। यही वजह है कि वह पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहा।

अमेरिका की सीमाएं

अमेरिका के पास भले ही अत्याधुनिक हथियार और मजबूत सैन्य ढांचा हो, लेकिन इस क्षेत्र में उसकी कार्रवाई कई सीमाओं से बंधी हुई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में कार्रवाई बिना NATO सहयोग के मुश्किल है। अकेले उतरने पर बड़े नुकसान का खतरा है। क्षेत्रीय अस्थिरता का वैश्विक असर पड़ सकता है।
इन कारणों से अमेरिका फिलहाल बड़े सैन्य कदम उठाने से बचता दिख रहा है और सीमित कार्रवाई या दबाव की रणनीति अपना सकता है।

क्या आगे बढ़ेगा टकराव?

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान अब इस संघर्ष को लंबा खींचने की रणनीति अपना सकता है। उसका उद्देश्य अमेरिका को आर्थिक और राजनीतिक रूप से थकाना हो सकता है। वहीं अमेरिका भी पूरी तरह पीछे हटने की स्थिति में नहीं है, इसलिए सीमित दबाव बनाए रखने की कोशिश जारी रखेगा। ऐसे में टकराव का स्वरूप सीधा युद्ध नहीं, बल्कि लंबी खिंचने वाली रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का हो सकता है।


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