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US-India Trade Deal: ये तीन बन रहे भारत के साथ व्यापार समझौते में रोड़ा', अमेरिकी सांसद का दावा

भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों को लेकर रिपब्लिकन खेमे में एक राय नहीं दिख रही है। एक तरफ टेड क्रूज जैसे नेता भारत को अमेरिका का रणनीतिक और आर्थिक साझेदार मानते हैं, वहीं ट्रंप खेमे के नेता इसे कठोर टैरिफ और दबाव की नीति से साधने के पक्षधर हैं।

US-India Trade Deal: ये तीन बन रहे भारत के साथ व्यापार समझौते में रोड़ा, अमेरिकी सांसद का दावा
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वाशिंटनः भारत–अमेरिका ट्रेड डील को लेकर वॉशिंगटन में सियासी और रणनीतिक खींचतान तेज हो गई है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, सीनेटर जेडी वेंस और उनके करीबी माने जाने वाले पीटर नवारो की सख्त व्यापार नीति ने भारत के साथ संभावित समझौते को मुश्किलों में डाल दिया है। इस बीच रिपब्लिकन पार्टी के भीतर ही भारत को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। पार्टी के प्रभावशाली सीनेटर टेड क्रूज ने ट्रेड डील में आ रही बाधाओं के लिए सीधे अपनी ही पार्टी के नेताओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

रिपब्लिकन पार्टी में भारत को लेकर कलह

भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों को लेकर रिपब्लिकन खेमे में एक राय नहीं दिख रही है। एक तरफ टेड क्रूज जैसे नेता भारत को अमेरिका का रणनीतिक और आर्थिक साझेदार मानते हैं, वहीं ट्रंप खेमे के नेता इसे कठोर टैरिफ और दबाव की नीति से साधने के पक्षधर हैं। टेड क्रूज ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि भारत के साथ रिश्तों को केवल टैरिफ के चश्मे से देखना अमेरिका के दीर्घकालिक हितों के खिलाफ है। उनके मुताबिक, भारत एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में अमेरिका का अहम सहयोगी है। टेड क्रूज की एक ऑडियो रिकॉर्डिंग सामने आई है, जिसके बाद ट्रंप प्रशासन के भीतर की दरारें सुर्खियों में आ गई हैं। इस रिकॉर्डिंग में अमेरिकी सांसद ने उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, व्हाइट हाउस के सलाहकार पीटर नवारो और राष्ट्रपति ट्रंप की आलोचना की है। उन्होंने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को रोकने के लिए वेंस, नवारो और राष्ट्रपति ट्रंप को दोषी ठहराया।

50% टैरिफ से बिगड़े रिश्ते

विवाद की सबसे बड़ी वजह भारतीय उत्पादों पर प्रस्तावित 50% तक का टैरिफ है। ट्रंप और उनके सहयोगियों का मानना है कि भारत अमेरिकी बाजार में सस्ते उत्पाद भेजकर अमेरिकी उद्योगों को नुकसान पहुंचा रहा है। दूसरी ओर भारत का तर्क है कि इतने ऊंचे टैरिफ से न सिर्फ व्यापार प्रभावित होगा, बल्कि दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों में भी खटास आएगी। भारत पहले ही साफ कर चुका है कि एकतरफा दबाव की नीति पर वह समझौते के लिए तैयार नहीं होगा।

कृषि और डेयरी सेक्टर बना सबसे बड़ी अड़चन

भारत–अमेरिका ट्रेड डील में सबसे जटिल मुद्दा कृषि और डेयरी सेक्टर बनकर उभरा है। अमेरिका चाहता है कि भारत अपने कृषि और डेयरी बाजार को अमेरिकी उत्पादों के लिए और ज्यादा खोले। भारत का कहना है कि उसका कृषि क्षेत्र करोड़ों छोटे किसानों और दुग्ध उत्पादकों की आजीविका से जुड़ा है। ऐसे में बिना सुरक्षा उपायों के अमेरिकी डेयरी और कृषि उत्पादों को खुली छूट देना घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है। यही वजह है कि यह सेक्टर समझौते की सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।

ट्रंप–नवारो की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति

डोनाल्ड ट्रंप और उनके पूर्व व्यापार सलाहकार पीटर नवारो लंबे समय से ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के समर्थक रहे हैं। नवारो खुले तौर पर भारत सहित कई देशों पर अनुचित व्यापार प्रथाओं का आरोप लगाते रहे हैं। उनका मानना है कि भारत अमेरिकी कंपनियों को पर्याप्त बाजार पहुंच नहीं देता और आयात शुल्क के जरिए घरेलू उद्योगों को बचाता है। इसी सोच के चलते भारत के साथ व्यापक ट्रेड डील पर सहमति बनाना मुश्किल होता जा रहा है।

जेडी वेंस का सख्त रुख


उपराष्‍ट्रपति जेडी वेंस, जिन्हें ट्रंप का करीबी माना जाता है, भी भारत को लेकर सख्त रुख अपनाए हुए हैं। वेंस का कहना है कि अमेरिका को ऐसे व्यापार समझौतों से बचना चाहिए, जिनसे घरेलू नौकरियां खतरे में पड़ें। हालांकि आलोचकों का कहना है कि वेंस का यह नजरिया भारत जैसे उभरते साझेदार देशों के साथ सहयोग की संभावनाओं को सीमित कर रहा है।

टेड क्रूज का पलटवार

इन सबके बीच टेड क्रूज ने रिपब्लिकन पार्टी के भीतर ही असंतोष जाहिर किया है। उन्होंने कहा कि भारत के साथ टकराव की नीति अपनाकर अमेरिका खुद को नुकसान पहुंचा रहा है। क्रूज के मुताबिक, अगर अमेरिका भारत को व्यापारिक दुश्मन की तरह ट्रीट करेगा, तो इसका सीधा फायदा चीन को मिलेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत के साथ संतुलित और व्यावहारिक ट्रेड डील दोनों देशों के हित में है।

रणनीतिक साझेदारी पर भी असर का खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रेड डील में लगातार देरी और टैरिफ विवाद का असर सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा। इसका प्रभाव रक्षा सहयोग, इंडो-पैसिफिक रणनीति और तकनीकी साझेदारी पर भी पड़ सकता है। भारत और अमेरिका हाल के वर्षों में रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में काफी करीब आए हैं, लेकिन व्यापारिक तनाव इस साझेदारी की रफ्तार को धीमा कर सकता है।

रास्ता आसान नहीं

फिलहाल भारत–अमेरिका ट्रेड डील अधर में लटकी हुई है। दोनों देशों के अधिकारी बातचीत जारी रखने की बात जरूर कर रहे हैं, लेकिन रिपब्लिकन पार्टी के भीतर मतभेद और ट्रंप खेमे की सख्त नीति के चलते रास्ता आसान नहीं दिखता। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि अमेरिका भारत को रणनीतिक साझेदार के तौर पर प्राथमिकता देता है या फिर टैरिफ और दबाव की राजनीति हावी रहती है।

गहरी खाई बनी

भारत–अमेरिका ट्रेड डील सिर्फ आर्थिक समझौता नहीं, बल्कि दोनों देशों के रिश्तों की दिशा तय करने वाला मुद्दा बन चुका है। ट्रंप, वेंस और नवारो की सख्त नीतियों के बीच टेड क्रूज जैसे नेताओं की चेतावनी इस बात का संकेत है कि अमेरिका के भीतर ही इस मुद्दे पर गहरी खाई बनती जा रही है। अगर जल्द संतुलन नहीं बना, तो इसका असर दोनों देशों के लंबे समय के रिश्तों पर पड़ सकता है।


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