दुनिया का नक्शा बदलने की तैयारी, UN में मर्केटर मैप के खिलाफ प्रस्ताव पास; अमेरिका ने किया विरोध
इस पहल का उद्देश्य ऐसे विश्व मानचित्र के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है, जिसमें देशों और महाद्वीपों का आकार धरती पर उनके वास्तविक क्षेत्रफल के अनुपात के ज्यादा करीब दिखाई दे। प्रस्ताव अफ्रीकी देशों की ओर से आगे बढ़ाया गया।

न्यूयॉर्क: दुनिया को देखने और समझने के तरीके में बदलाव की दिशा में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक अहम कदम उठाया है। महासभा ने 16वीं सदी से इस्तेमाल हो रहे मर्केटर मानचित्र के विकल्प को बढ़ावा देने वाले प्रस्ताव के पक्ष में भारी बहुमत से मतदान किया। प्रस्ताव 164 देशों के समर्थन के साथ पारित हुआ, जबकि अमेरिका ने इसका विरोध किया। छह देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। इस पहल का उद्देश्य ऐसे विश्व मानचित्र के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है, जिसमें देशों और महाद्वीपों का आकार धरती पर उनके वास्तविक क्षेत्रफल के अनुपात के ज्यादा करीब दिखाई दे। प्रस्ताव अफ्रीकी देशों की ओर से आगे बढ़ाया गया। इसके पीछे तर्क दिया गया कि मौजूदा मानचित्र दुनिया के अलग-अलग हिस्सों को देखने की हमारी धारणा को प्रभावित करता है और अफ्रीका जैसे महाद्वीपों के वास्तविक आकार को कम करके दिखाता है।
अफ्रीकी देशों ने क्यों उठाया यह मुद्दा?
इस अभियान में टोगो की अहम भूमिका रही। टोगो ने मर्केटर प्रोजेक्शन के इस्तेमाल को सीमित करने और दुनिया का ज्यादा संतुलित मानचित्र अपनाने की दिशा में पहल की। मतदान से पहले टोगो के विदेश मंत्री राबर्ट डुसे ने कहा कि एक निष्पक्ष दुनिया की शुरुआत एक निष्पक्ष मानचित्र से होनी चाहिए। अफ्रीकी संघ ने भी संयुक्त राष्ट्र के फैसले का स्वागत किया। उसके मुताबिक, दुनिया के भौगोलिक आकार को ज्यादा सटीक तरीके से प्रस्तुत करना केवल तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि इससे वैश्विक स्तर पर देशों और महाद्वीपों को देखने की धारणा में भी बदलाव आ सकता है। अफ्रीकी देशों का कहना है कि मौजूदा मर्केटर नक्शे में ध्रुवों के करीब स्थित क्षेत्र जरूरत से ज्यादा बड़े दिखाई देते हैं। इसके मुकाबले भूमध्य रेखा के आसपास स्थित अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका जैसे विशाल भूभाग अपेक्षाकृत छोटे नजर आते हैं।
मर्केटर मैप में आखिर समस्या क्या है?
मर्केटर मानचित्र को यूरोपीय मानचित्रकार जेरार्डस मर्केटर ने 1569 में तैयार किया था। इसका सबसे बड़ा फायदा यह था कि समुद्री यात्राओं और जहाजों के नेविगेशन के लिए यह बेहद उपयोगी साबित हुआ। इसी वजह से यह लंबे समय तक दुनिया के सबसे लोकप्रिय मानचित्रों में शामिल रहा। हालांकि, पृथ्वी गोल है और उसे सपाट कागज या स्क्रीन पर दिखाने के लिए किसी न किसी तरह का भौगोलिक विकृति पैदा होती है। मर्केटर प्रोजेक्शन में जैसे-जैसे कोई क्षेत्र भूमध्य रेखा से दूर होता जाता है, उसका आकार नक्शे पर वास्तविक आकार से बड़ा दिखाई देने लगता है। इसका सबसे चर्चित उदाहरण ग्रीनलैंड है। मर्केटर मानचित्र पर ग्रीनलैंड कई बार अफ्रीका के आकार के आसपास दिखाई देता है। जबकि वास्तविकता में अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से लगभग 14 गुना अधिक है। ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल करीब 22 लाख वर्ग किलोमीटर है, जबकि अफ्रीका का क्षेत्रफल लगभग 3 करोड़ वर्ग किलोमीटर है।
नेविगेशन के लिए उपयोगी, लेकिन आकार बताने में सीमित
मर्केटर मानचित्र को पूरी तरह गलत कहना भी उचित नहीं होगा। समुद्री नेविगेशन के लिए इसकी अपनी महत्वपूर्ण उपयोगिता रही है। सीधी रेखाओं के जरिए दिशा और समुद्री मार्गों को समझने में यह प्रोजेक्शन लंबे समय तक नाविकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा। समस्या तब पैदा होती है जब इसी मानचित्र को देशों और महाद्वीपों के वास्तविक आकार की तुलना के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में ध्रुवीय क्षेत्रों की विकृति बढ़ जाती है और कुछ देशों का आकार वास्तविकता से काफी बड़ा दिखाई देता है। इसी कारण अब ऐसे मैप प्रोजेक्शन पर जोर दिया जा रहा है जो क्षेत्रफल को ज्यादा सही अनुपात में प्रस्तुत कर सकें।
अमेरिका ने प्रस्ताव का क्यों किया विरोध?
संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव का विरोध करते हुए अमेरिकी प्रतिनिधि यारिना फेरेन्सेविच ने इस पहल की आलोचना की। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र को दुनिया की वास्तविक समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, न कि 16वीं सदी के मानचित्र को बदलने जैसी बहसों पर। अमेरिकी पक्ष ने इसे एक वैचारिक एजेंडे से जोड़ते हुए कहा कि इस तरह की बहसें संयुक्त राष्ट्र के वास्तविक उद्देश्यों से ध्यान भटका सकती हैं। अमेरिका के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय शांति, समृद्धि और देशों के बीच बेहतर संबंध जैसे मुद्दे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
क्या अब तुरंत बदल जाएगा दुनिया का नक्शा?
संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव पारित होने का मतलब यह नहीं है कि दुनिया में इस्तेमाल होने वाले सभी नक्शे तुरंत बदल जाएंगे। अलग-अलग उद्देश्यों के लिए अलग-अलग मैप प्रोजेक्शन का इस्तेमाल होता है। नेविगेशन, शिक्षा, मौसम विज्ञान, भूगोल और सांख्यिकीय प्रस्तुतियों में जरूरत के मुताबिक अलग प्रोजेक्शन उपयोग किए जाते हैं। हालांकि, UN का यह फैसला इस बहस को जरूर नई गति देता है कि दुनिया को नक्शे पर किस तरह प्रस्तुत किया जाना चाहिए। खासकर अफ्रीकी देशों के लिए यह केवल भौगोलिक सटीकता का मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक धारणा और प्रतिनिधित्व से जुड़ा सवाल भी है।


