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'बोर्ड आफ पीस' में शामिल होने के लिए ट्रंप ने भारत को दिया न्योता, संयुक्त राष्ट्र को मिल सकती है चुनौती

इस बोर्ड में शामिल होने के लिए दुनिया के करीब 60 देशों को आमंत्रण भेजा गया है, जिनमें भारत भी शामिल है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसका उद्देश्य गाजा संकट का समाधान बताया जा रहा है, लेकिन राजनयिक हलकों में इसे कहीं अधिक व्यापक और दूरगामी प्रभाव वाला कदम माना जा रहा है।

बोर्ड आफ पीस में शामिल होने के लिए ट्रंप ने भारत को दिया न्योता, संयुक्त राष्ट्र को मिल सकती है चुनौती
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वाशिंगटन। गाजा के विकास और शांति प्रक्रिया को गति देने के नाम पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नया अंतरराष्ट्रीय मंच ‘बोर्ड ऑफ पीस’ गठित करने की पहल की है। इस बोर्ड में शामिल होने के लिए दुनिया के करीब 60 देशों को आमंत्रण भेजा गया है, जिनमें भारत भी शामिल है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसका उद्देश्य गाजा संकट का समाधान बताया जा रहा है, लेकिन राजनयिक हलकों में इसे कहीं अधिक व्यापक और दूरगामी प्रभाव वाला कदम माना जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि यह पहल संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की स्थापित भूमिका को कमजोर कर सकती है और एक तरह से नया ‘ट्रंप संयुक्त राष्ट्र’ खड़ा करने की कोशिश है।

गाजा के नाम पर वैश्विक एजेंडा


राजनयिक सूत्रों के अनुसार, बोर्ड ऑफ पीस का दायरा केवल गाजा तक सीमित नहीं रहेगा। इसका लक्ष्य भविष्य में मध्य एशिया सहित अन्य क्षेत्रों के संघर्षों और वैश्विक विवादों के समाधान में सक्रिय भूमिका निभाना है। इसी आशंका ने कई देशों और विशेषज्ञों को चिंतित कर दिया है कि यह मंच मौजूदा बहुपक्षीय व्यवस्था, खासकर संयुक्त राष्ट्र की केंद्रीय भूमिका को चुनौती दे सकता है। अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर मिलेई द्वारा सोशल मीडिया पर साझा किए गए ट्रंप के पत्र से इस मंच के इरादों की झलक मिलती है। पत्र में ट्रंप ने लिखा है कि बोर्ड ऑफ पीस “मध्य एशिया में शांति को मजबूत करने के साथ-साथ वैश्विक संघर्षों को सुलझाने के लिए नए और साहसिक दृष्टिकोण” अपनाएगा।

कौन-कौन शामिल, कौन चुप


ट्रंप के करीबी और समर्थक माने जाने वाले हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने की पुष्टि करने वाले पहले नेता बने हैं। उनके अलावा जॉर्डन, ग्रीस, साइप्रस, कनाडा, तुर्किये, मिस्र, पराग्वे, अर्जेंटीना और अल्बानिया ने भी निमंत्रण मिलने की बात स्वीकार की है। पाकिस्तान ने भी दावा किया है कि उसे ट्रंप की ओर से आमंत्रण मिला है। वहीं दूसरी ओर फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और कई प्रमुख यूरोपीय देशों ने अब तक इस पर सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। एक वरिष्ठ यूरोपीय राजनयिक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “यह संयुक्त राष्ट्र के समानांतर खड़ा किया जा रहा एक मंच है, जो यूएन चार्टर की मूल भावना को नजरअंदाज करता है।”

बोर्ड ऑफ पीस की प्रस्तावित रूपरेखा


बोर्ड ऑफ पीस के मसौदा चार्टर के अनुसार, इसकी अध्यक्षता आजीवन डोनाल्ड ट्रंप के पास रहेगी। बोर्ड का पहला और प्राथमिक लक्ष्य गाजा संघर्ष का समाधान होगा, जिसके बाद इसके कार्यक्षेत्र को अन्य वैश्विक विवादों तक विस्तारित किया जाएगा। चार्टर में सदस्यता को लेकर भी विवादास्पद प्रावधान हैं। इसके तहत जो देश बोर्ड की गतिविधियों के लिए एक अरब डॉलर का योगदान देंगे, उन्हें स्थायी सदस्यता दी जाएगी। अन्य देशों की सदस्यता तीन वर्षों के लिए सीमित होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्यवस्था आर्थिक शक्ति के आधार पर वैश्विक निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास हो सकती है।

कार्यकारी समिति में दिग्गज चेहरे


ट्रंप ने बोर्ड ऑफ पीस की कार्यकारी समिति में कई प्रभावशाली और चर्चित नामों को शामिल करने की घोषणा की है। इसमें अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो, विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर और विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा शामिल हैं। इन नामों ने इस पहल को और अधिक राजनीतिक व रणनीतिक बना दिया है।

समर्थन, सावधानी और विरोध


कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने गाजा से जुड़े प्रस्ताव पर सैद्धांतिक सहमति जताई है, जबकि इटली की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी ने कहा कि उनका देश “अपनी भूमिका निभाने को तैयार” है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी कदम को अंतरराष्ट्रीय कानून और मौजूदा संस्थाओं के अनुरूप होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र महासचिव के प्रवक्ता ने संयमित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सदस्य देश अलग-अलग समूह बनाने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र अपने अनिवार्य और केंद्रीय कार्यों को जारी रखेगा।

मानवाधिकार संगठनों की चेतावनी


मानवाधिकार संगठनों ने बोर्ड ऑफ पीस की अवधारणा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि किसी विदेशी क्षेत्र के शासन और विकास की निगरानी के लिए इस तरह का ढांचा औपनिवेशिक सोच को दर्शाता है। संगठनों का आरोप है कि इससे स्थानीय लोगों की राजनीतिक स्वायत्तता और अधिकारों को नजरअंदाज किया जा सकता है।

क्या बदलेगी वैश्विक कूटनीति?


विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बोर्ड ऑफ पीस प्रभावी रूप से आगे बढ़ता है, तो यह बहुपक्षीय कूटनीति की मौजूदा व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकता है। संयुक्त राष्ट्र, जो दशकों से वैश्विक शांति और संघर्ष समाधान का प्रमुख मंच रहा है, उसकी केंद्रीय भूमिका पर गंभीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं। फिलहाल भारत सहित कई देशों की आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है। लेकिन इतना तय है कि ट्रंप की यह पहल सिर्फ गाजा तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका पर दूरगामी असर डाल सकती है।


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