वॉशिंगटन।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का विरोधाभासी और आक्रामक रुख एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में है। नाटो सहयोगियों समेत पूरे अटलांटिक क्षेत्र की सुरक्षा का जिम्मा लेने और ग्रीनलैंड को अमेरिका में मिलाने की बात करने वाले ट्रंप अब वैश्विक सुरक्षा से पल्ला झाड़ते नजर आ रहे हैं। ट्रंप प्रशासन ने एशिया और यूरोप के अपने रक्षा सहयोगियों को साफ संदेश दे दिया है कि वे अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठाएं, अमेरिका अब हर जगह सुरक्षा का ठेका नहीं लेगा और न ही उसका खर्च वहन करेगा। पेंटागन ने शुक्रवार को 34 पन्नों की ‘नई राष्ट्रीय रक्षा रणनीति’ जारी की, जिसमें ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति पूरी मजबूती से उभरकर सामने आई है। इस दस्तावेज का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अमेरिका अब खुद को दुनिया का “चौकीदार” नहीं मानता।
सहयोगियों को सख्त संदेश: अब खुद बनें मजबूत
नई रक्षा रणनीति में यूरोप और एशिया के कई देशों को कड़ी नसीहत दी गई है। पेंटागन का कहना है कि ये देश लंबे समय से अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर जरूरत से ज्यादा निर्भर रहे हैं। अब समय आ गया है कि वे रूस, उत्तर कोरिया और अन्य खतरों से निपटने के लिए अधिक जिम्मेदारी खुद उठाएं।
रणनीति दस्तावेज की शुरुआत ही तीखे शब्दों से होती है- “बहुत लंबे समय तक अमेरिकी सरकार ने अपने नागरिकों और उनके हितों को प्राथमिकता नहीं दी।” इस वाक्य के जरिए ट्रंप प्रशासन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब अमेरिकी संसाधन और सैन्य ताकत सबसे पहले अमेरिकी हितों की रक्षा में इस्तेमाल होगी।
पश्चिमी गोलार्ध पहली प्राथमिकता
नई रक्षा नीति में सबसे बड़ा बदलाव भौगोलिक प्राथमिकताओं को लेकर दिखता है।
2022 की नीति में क्या था
2022 की रणनीति में अमेरिका ने कहा था कि वह लैटिन अमेरिका और अपने पड़ोसी देशों के साथ मिलकर शांति और स्थिरता बनाए रखेगा। सहयोग, साझेदारी और साझा सुरक्षा पर जोर दिया गया था।
2026 में क्या बदला
2026 की नई नीति में पेंटागन ने साफ किया है कि उसकी पहली और सर्वोच्च प्राथमिकता पश्चिमी गोलार्ध होगा यानी अमेरिका के आसपास के इलाके।
इसमें ग्रीनलैंड और पनामा नहर का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। रणनीति के अनुसार, अमेरिका इन क्षेत्रों में अपने सैन्य और व्यापारिक हितों की हर हाल में रक्षा करेगा और जरूरत पड़ने पर तेज व निर्णायक कार्रवाई से भी पीछे नहीं हटेगा। विश्लेषकों का मानना है कि यह संकेत है कि अमेरिका अब वैश्विक हस्तक्षेप के बजाय अपने पड़ोस और रणनीतिक मार्गों पर ज्यादा ध्यान देगा।
चीन को लेकर बदला हुआ लहजा
नई रक्षा रणनीति में चीन को लेकर भी रुख में बड़ा बदलाव दिखता है।
2022 का नजरिया
2022 में चीन को अमेरिका की सबसे बड़ी चुनौती बताया गया था।
ताइवान की सुरक्षा को लेकर अमेरिका ने खुला समर्थन जताया था।
चीन की सैन्य गतिविधियों और दबाव बनाने की नीति को पूर्वी चीन सागर, दक्षिण चीन सागर और भारत के साथ लगती वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) तक फैले अस्थिरता के पैटर्न का हिस्सा बताया गया था।
2026 का बदला रुख
नई रणनीति में कहा गया है कि अमेरिका चीन को अपमानित या कमजोर नहीं करना चाहता।
पेंटागन के मुताबिक, अमेरिका का लक्ष्य सिर्फ इतना है कि चीन या कोई अन्य देश अमेरिका और उसके सहयोगियों पर हावी न हो।
सबसे अहम बदलाव यह है कि इस बार ताइवान का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया। विशेषज्ञ इसे अमेरिका की रणनीतिक अस्पष्टता या सहयोगियों को जिम्मेदारी सौंपने की नीति के रूप में देख रहे हैं।
एशिया में जिम्मेदारी का बंटवारा
2022: अमेरिका ने उत्तर कोरिया से निपटने में अपनी केंद्रीय भूमिका पर जोर दिया था और सैन्य अवरोध को प्राथमिकता बताया था।
2026: नई नीति में कहा गया है कि दक्षिण कोरिया अब उत्तर कोरिया को रोकने की मुख्य जिम्मेदारी खुद संभाल सकता है। अमेरिका केवल सीमित सहयोग और समर्थन देगा, जबकि क्षेत्रीय सुरक्षा की अगुवाई सियोल करेगा। यह बदलाव एशिया में अमेरिका की प्रत्यक्ष सैन्य भूमिका घटाने की दिशा में एक बड़ा संकेत माना जा रहा है।
यूरोप और नाटो: भरोसा भी, दूरी भी
यूरोप और नाटो को लेकर भी नई रणनीति में स्पष्ट बदलाव दिखता है।
अमेरिका ने नाटो को अपनी सुरक्षा नीति की रीढ़ बताया था।
रूस को बड़ा खतरा मानते हुए यूरोप में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई गई थी, खासकर यूक्रेन संकट के बाद।
2026 की स्थितिनई रक्षा रणनीति मानती है कि रूस नाटो के लिए खतरा बना रहेगा, लेकिन इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि यूरोपीय देश अब इतने सक्षम हैं कि वे अपनी पारंपरिक सुरक्षा खुद संभाल सकते हैं। अमेरिका ने साफ कर दिया है कि वह यूरोप में अपनी सैन्य मौजूदगी घटाएगा। यूक्रेन सीमा के पास तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या पहले ही कम की जा रही है, जिसे रूस-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में एक अहम संकेत माना जा रहा है।
मध्य पूर्व: अमेरिका पीछे, सहयोगी आगे
मध्य पूर्व को लेकर भी अमेरिकी नीति में बड़ा बदलाव सामने आया है।
2022 की नीति
अमेरिका ने ईरान से निपटने के लिए क्षेत्रीय साझेदारी और साझा सुरक्षा ढांचे पर जोर दिया था। खुद को क्षेत्रीय स्थिरता का प्रमुख स्तंभ बताया गया था।
2026 की नई सोच
नई रणनीति में कहा गया है कि ईरान और उसके समर्थक संगठनों से निपटने की जिम्मेदारी अब क्षेत्रीय देशों की होगी। इजरायल को खुला समर्थन दोहराया गया है। अरब देशों के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाने की बात कही गई है। लेकिन अमेरिका खुद सीधे टकराव में आगे रहने के बजाय पीछे से समर्थन देने की भूमिका में रहेगा।
‘अमेरिका फर्स्ट’ का वैश्विक असर
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन की यह नई रक्षा रणनीति दुनिया में सुरक्षा संतुलन को बदल सकती है। जहां अमेरिका के सहयोगी देशों को अब ज्यादा खर्च और जिम्मेदारी उठानी होगी, वहीं विरोधी ताकतों को भी यह संकेत मिल सकता है कि अमेरिका हर मोर्चे पर सीधे दखल नहीं देगा। कुछ विश्लेषक इसे अमेरिकी संसाधनों को बचाने की रणनीति बता रहे हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे वैश्विक अस्थिरता बढ़ सकती है।
दुनिया का चौकीदार बनने को तैयार नहीं
पेंटागन की नई राष्ट्रीय रक्षा रणनीति यह साफ कर देती है कि डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका अब दुनिया का चौकीदार बनने को तैयार नहीं है। ‘अमेरिका फर्स्ट’ का मतलब अब केवल नारा नहीं, बल्कि एक ठोस सैन्य और रणनीतिक नीति बन चुका है,जिसमें सहयोगियों से ज्यादा जिम्मेदारी, कम अमेरिकी दखल और अपने पड़ोस व हितों पर तीखा फोकस शामिल है। अब यह देखना अहम होगा कि अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी इस बदली हुई रणनीति के साथ खुद को कैसे ढालते हैं और वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था किस नई दिशा में आगे बढ़ती है।