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ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शहबाज शरीफ की एंट्री, पाकिस्तान में सियासी तूफान, विपक्ष बोला- यह कूटनीति नहीं, बूट पॉलिश है

दावोस में ट्रंप के ठीक बगल में बैठे मुस्कुराते और उनके कानों में कुछ फुसफुसाते शहबाज शरीफ की तस्वीरें सोशल मीडिया से लेकर पाकिस्तानी टीवी चैनलों तक चर्चा का केंद्र बनी हुई हैं। आलोचकों का कहना है कि यह तस्वीर केवल एक औपचारिक कूटनीतिक पल नहीं, बल्कि अमेरिका को खुश करने की पाकिस्तान की पुरानी नीति की नई मिसाल है।

ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शहबाज शरीफ की एंट्री, पाकिस्तान में सियासी तूफान, विपक्ष बोला- यह कूटनीति नहीं, बूट पॉलिश है
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दावोस/ इस्लामाबाद। अमेरिका के साथ कूटनीतिक नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अपने ही देश में सवालों के घेरे में आ गए हैं। विश्व आर्थिक मंच की बैठक के दौरान दावोस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अध्यक्षता वाले ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के चार्टर पर हस्ताक्षर करना शहबाज के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को प्रासंगिक दिखाने का मौका था, लेकिन यही फैसला पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में भारी विवाद की वजह बन गया है।
दावोस में ट्रंप के ठीक बगल में बैठे, मुस्कुराते और उनके कानों में कुछ फुसफुसाते शहबाज शरीफ की तस्वीरें सोशल मीडिया से लेकर पाकिस्तानी टीवी चैनलों तक चर्चा का केंद्र बनी हुई हैं। आलोचकों का कहना है कि यह तस्वीर केवल एक औपचारिक कूटनीतिक पल नहीं, बल्कि अमेरिका को खुश करने की पाकिस्तान की पुरानी नीति की नई मिसाल है।

क्या है ‘बोर्ड ऑफ पीस’?


‘बोर्ड ऑफ पीस’ का विचार पहली बार गाजा युद्ध के दौरान सामने आया, जब अमेरिका ने अपने नेतृत्व में एक शांति योजना का खाका पेश किया था। आधिकारिक तौर पर यह बोर्ड गाजा में शांति प्रक्रिया की निगरानी के लिए बनाया गया, लेकिन इसके स्वरूप और संरचना को लेकर शुरू से ही सवाल उठते रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह बोर्ड केवल गाजा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के समाधान के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है। आलोचकों का दावा है कि राष्ट्रपति ट्रंप इसके जरिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के समानांतर एक अमेरिकी-नियंत्रित मंच खड़ा करना चाहते हैं, जहां फैसलों पर अमेरिका का सीधा असर हो। दावोस में इस बोर्ड के चार्टर पर पाकिस्तान समेत 19 देशों के नेताओं ने हस्ताक्षर किए। ट्रंप स्वयं इसके अध्यक्ष हैं और सदस्यों का चयन भी उनकी पसंद से किया गया है, यही बात पाकिस्तान में सबसे ज्यादा विवाद की जड़ बन गई।

शहबाज शरीफ की रणनीति: अंतरराष्ट्रीय मंच पर वापसी?


राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शहबाज शरीफ के लिए यह कदम केवल विदेश नीति का फैसला नहीं, बल्कि घरेलू मजबूरियों से जुड़ा हुआ है। पाकिस्तान इस समय गंभीर आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घटती साख से जूझ रहा है। ऐसे में ट्रंप के करीब दिखना शहबाज के लिए एक तरह से ‘इगो बूस्टर’ और सत्ता को स्थिर दिखाने का जरिया माना जा रहा है। खास बात यह रही कि दावोस में पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर की मौजूदगी के बावजूद अंतरराष्ट्रीय कैमरों और मीडिया का फोकस पूरी तरह शहबाज शरीफ पर ही रहा। सरकार समर्थक हलकों का तर्क है कि इससे पाकिस्तान को वैश्विक कूटनीति में फिर से जगह मिलेगी और अमेरिका के साथ रिश्तों में नई गर्मजोशी आएगी, जिसका फायदा आर्थिक मदद और अंतरराष्ट्रीय समर्थन के रूप में मिल सकता है।

गाजा और पाकिस्तान: एक बेहद संवेदनशील मुद्दा


पाकिस्तान में गाजा का मुद्दा केवल विदेश नीति नहीं, बल्कि भावनात्मक और वैचारिक सवाल है। देश की लगभग पूरी आबादी इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों की आलोचना करती रही है और फिलिस्तीन के समर्थन को नैतिक जिम्मेदारी मानती है। ऐसे माहौल में ट्रंप के नेतृत्व वाले बोर्ड में शामिल होना, जहां इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मौजूदगी की संभावना है, सरकार के लिए भारी राजनीतिक जोखिम बन गया है।

मलीहा लोधी का तीखा हमला


हालांकि पाकिस्तान के भीतर इस दलील को बहुत कम समर्थन मिला है। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की पूर्व राजदूत मलीहा लोधी ने शहबाज सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने इस कदम को सीधे तौर पर “ट्रंप की बूट पॉलिश” करार दिया। मलीहा लोधी ने सवाल उठाया कि क्या ट्रंप को खुश करना अब पाकिस्तान की विदेश नीति का सबसे बड़ा लक्ष्य बन गया है? उन्होंने कहा कि पाकिस्तान हमेशा से फिलिस्तीन मुद्दे पर एक स्पष्ट और सिद्धांत आधारित रुख रखता आया है, ऐसे में ऐसे बोर्ड में शामिल होना उस परंपरा से समझौता करने जैसा है।

“ट्रंप से शांति की उम्मीद बेवकूफी”


जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फजल) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने तो सरकार की आलोचना में और भी तीखी भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने संसद में कहा कि फलस्तीनी जनता की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार लोग ही आज शांति बोर्ड का हिस्सा बने हुए हैं। फजलुर रहमान ने तंज कसते हुए कहा, “ट्रंप से शांति की उम्मीद करना बेवकूफों की जन्नत में रहने जैसा है।” उन्होंने चेतावनी दी कि पाकिस्तान किसी भी हाल में हमास को निरस्त्र करने के अभियान का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। रहमान ने ट्रंप पर गंभीर आरोप लगाते हुए यह भी कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी का अपहरण तक किया है।

नेतन्याहू के साथ बैठने का सवाल


जेयूआई-एफ प्रमुख ने यह सवाल भी उठाया कि क्या प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ उसी बोर्ड में बैठेंगे, जहां इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू मौजूद होंगे, जबकि गाजा पर बमबारी अब भी जारी है? उनके मुताबिक, यह न केवल राजनीतिक बल्कि नैतिक विरोधाभास भी है, जिसे पाकिस्तान की जनता कभी स्वीकार नहीं करेगी।

इमरान की पार्टी पीटीआई का कड़ा विरोध


विपक्षी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) ने इस फैसले को असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक करार दिया है। पार्टी के अध्यक्ष गोहर अली खान ने कहा कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने बिना किसी परामर्श और संसद को विश्वास में लिए शांति बोर्ड में शामिल होने का फैसला कर लिया। गोहर अली खान ने सवाल उठाया, “क्या सरकार हमास को निरस्त्र करने की किसी योजना का हिस्सा बनेगी? अगर यह संयुक्त राष्ट्र का कोई निकाय होता, तो सरकार अपने स्तर पर फैसला ले सकती थी। लेकिन यह कोई यूएन बॉडी नहीं है।” उन्होंने कहा कि संसद को न केवल इस बोर्ड की शर्तों के बारे में बताया जाना चाहिए था, बल्कि राष्ट्रीय सहमति बनाना भी जरूरी था।

लोकतंत्र की छवि को नुकसान


पीटीआई के वरिष्ठ नेता और पूर्व स्पीकर असद कैसर ने भी सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर सर्वसम्मति से फैसला न लेना दुर्भाग्यपूर्ण है। कैसर के मुताबिक, “अगर संसद में इस पर बहस होती, तो दुनिया को यह संदेश जाता कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक प्रक्रिया जीवित है। लेकिन सरकार ने एकतरफा फैसला लेकर उस छवि को नुकसान पहुंचाया है।”

घरेलू राजनीति में बड़ी चुनौती


फिलहाल शहबाज सरकार अपने फैसले पर कायम है और इसे पाकिस्तान के दीर्घकालिक हितों से जोड़कर देख रही है। लेकिन जिस तरह विपक्ष, पूर्व राजनयिक और धार्मिक दल एक सुर में इसका विरोध कर रहे हैं, उससे साफ है कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होना शहबाज शरीफ के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर भले ही उपलब्धि हो, लेकिन घरेलू राजनीति में यह कदम उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर सड़कों तक और तेज होने की संभावना हैअऔर यह तय करेगा कि पाकिस्तान की विदेश नीति में अमेरिका के साथ ‘गलबहियां’ कितनी भारी पड़ सकती हैं।


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