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सऊदी क्राउन प्रिंस का डर सच साबित, ईरान ने तोड़ डाला खाड़ी देशों का वर्चस्व, बना मिडिल ईस्ट की महाशक्ति?
ईरान आज की तारीख में भारी नुकसान के बाद भी इस युद्ध का निर्विवाद विजेता है। इजरायल वर्षों से ईरान की शक्ति को कुचलने की कोशिश में रहा है लेकिन आज इजरायल में 'मातम' है। इजरायली लीडरशिप को समझ नहीं आ रहा कि इस युद्धविराम पर क्या प्रतिक्रिया दें।

तेहरान। मिडिल ईस्ट में करीब 40 दिनों तक चले संघर्ष और उसके बाद हुए युद्धविराम ने क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर इस टकराव से किसे रणनीतिक बढ़त मिली और भविष्य में इसका असर क्या होगा। जहां कुछ विश्लेषक ईरान को मजबूत स्थिति में उभरता हुआ देख रहे हैं, वहीं कई विशेषज्ञ इसे जटिल और अस्थायी संतुलन का परिणाम मानते हैं। ईरान आज की तारीख में भारी नुकसान के बाद भी युद्ध का निर्विवाद विजेता है।
युद्ध के बाद उभरी नई बहससंघर्ष के शुरुआती दिनों में यह आशंका जताई जा रही थी कि या तो ईरान को बड़ा नुकसान होगा या फिर वह क्षेत्र में अपनी स्थिति और मजबूत कर लेगा। अब युद्धविराम के बाद इन दोनों संभावनाओं पर चर्चा तेज हो गई है। कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया था कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिका से ईरान के खिलाफ सख्त कार्रवाई की वकालत की थी, यह कहते हुए कि अगर ईरान को नहीं रोका गया तो वह और मजबूत होकर उभरेगा। मौजूदा हालात को देखते हुए इस आकलन पर फिर से चर्चा हो रही है।
ईरान ने खाड़ी देशों के वर्चस्व को कर डाला खत्म!युद्धविराम के बाद कई विश्लेषकों का मानना है कि ईरान ने दबाव के बावजूद अपनी रणनीतिक स्थिति बनाए रखी है। उसका राजनीतिक ढांचा कायम है। सैन्य क्षमताओं पर कोई निर्णायक असर नहीं दिखा। वह बातचीत की मेज तक अपनी शर्तों के साथ पहुंचा। आज के युद्धविराम ने साबित किया है ईरान मिडिल ईस्ट की शक्तियों पर भारी पड़ गया है। खाड़ी देशों की राजनीति पर नजर रखने जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट अली मुस्तफा ने लिखा है 'गल्फ अरब देशों का एकाधिकार अब खत्म हो चुका है।इस क्षेत्र में ईरान एक नई महाशक्ति बनकर उभरा है।'
खाड़ी देशों में बदलता संतुलनइस संघर्ष ने खाड़ी देशों की सुरक्षा और रणनीतिक स्थिति पर भी सवाल खड़े किए हैं। क्षेत्रीय ऊर्जा ठिकानों पर हमलों की खबरों ने चिंता बढ़ाई, तेल और गैस आपूर्ति को लेकर अस्थिरता सामने आई। कुछ जियो-पॉलिटिकल विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटनाक्रम के बाद मिडिल ईस्ट में शक्ति संतुलन पहले जैसा नहीं रहेगा। हालांकि, यह बदलाव कितना गहरा होगा, यह आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा।इजरायल की प्रतिक्रिया इजरायल इस पूरे घटनाक्रम में एक प्रमुख पक्ष रहा है। युद्धविराम के बाद वहां की राजनीति में भी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। विपक्षी नेताओं ने सरकार की रणनीति पर सवाल उठाए, कुछ बयानों में इसे कूटनीतिक चुनौती बताया गया। हालांकि, इजरायली सरकार की आधिकारिक स्थिति संतुलित रही है और उसने सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात दोहराई है। इजरायल वर्षों से ईरान की शक्ति को कुचलने की कोशिश में रहा है लेकिन आज इजरायल में 'मातम' है। इजरायली लीडरशिप को समझ नहीं आ रहा कि इस युद्धविराम पर क्या प्रतिक्रिया दें। विपक्षी नेता यैर लैपिड ने इसे प्रधानमंत्री नेतन्याहू की 'नाकामी' कहा है।
अमेरिका की भूमिका पर उठे सवालईरान ने अहसास कराया है कि अमेरिका अब कमजोर हो रही महाशक्ति है। मिडिल ईस्ट के देश जो अभी तक अमेरिकी छतरी के नीचे थे वो छतरी अब फट चुकी है। अब मिडिल ईस्ट की राजनीति तेजी से बदलेगी। अब ये देश अमेरिका की 'सुरक्षा पर निर्भर' रहने के बजाय 'रणनीतिक स्वायत्तता' की तरफ बढ़ेंगे। यहां अब चीन आएगा और यकीन मानिए अमेरिका के निकलने की नींव ईरान ने रख दी है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और ऊर्जा सुरक्षाहोर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है। इस संघर्ष के दौरान इस मार्ग को लेकर अनिश्चितता ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया। तेल कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया, सप्लाई चेन पर असर पड़ा, वैश्विक बाजारों में अस्थिरता रही। युद्धविराम के बाद स्थिति कुछ हद तक सामान्य हुई है, लेकिन यह मुद्दा अभी भी संवेदनशील बना हुआ है।क्या बदल रही है मिडिल ईस्ट की राजनीति?इस पूरे घटनाक्रम ने संकेत दिया है कि मिडिल ईस्ट की राजनीति में बदलाव संभव है। ईरान ने अपने 'असममित युद्ध' और मिसाइल क्षमता के जरिए यह दिखा दिया है कि वह क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को तोड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य को ब्लॉक कर उसने खाड़ी देशों के तेल कारोबार पर ताला लगा दिया। खाड़ी देश अपनी अर्थव्यवस्था पर आघात झेलकर भी कुछ नहीं कर पाए। इस युद्ध से तय हो गया कि आने वाले वक्त में इस क्षेत्र में ईरान ही अगली शक्ति है। क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा रणनीतियों पर पुनर्विचार कर सकते हैं। बाहरी शक्तियों पर निर्भरता कम करने की कोशिश हो सकती है। चीन जैसे देशों की भूमिका बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
ईरान ने खाड़ी देशों के वर्चस्व को कर डाला खत्म!युद्धविराम के बाद कई विश्लेषकों का मानना है कि ईरान ने दबाव के बावजूद अपनी रणनीतिक स्थिति बनाए रखी है। उसका राजनीतिक ढांचा कायम है। सैन्य क्षमताओं पर कोई निर्णायक असर नहीं दिखा। वह बातचीत की मेज तक अपनी शर्तों के साथ पहुंचा। आज के युद्धविराम ने साबित किया है ईरान मिडिल ईस्ट की शक्तियों पर भारी पड़ गया है। खाड़ी देशों की राजनीति पर नजर रखने जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट अली मुस्तफा ने लिखा है 'गल्फ अरब देशों का एकाधिकार अब खत्म हो चुका है।इस क्षेत्र में ईरान एक नई महाशक्ति बनकर उभरा है।'
खाड़ी देशों में बदलता संतुलनइस संघर्ष ने खाड़ी देशों की सुरक्षा और रणनीतिक स्थिति पर भी सवाल खड़े किए हैं। क्षेत्रीय ऊर्जा ठिकानों पर हमलों की खबरों ने चिंता बढ़ाई, तेल और गैस आपूर्ति को लेकर अस्थिरता सामने आई। कुछ जियो-पॉलिटिकल विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटनाक्रम के बाद मिडिल ईस्ट में शक्ति संतुलन पहले जैसा नहीं रहेगा। हालांकि, यह बदलाव कितना गहरा होगा, यह आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा।इजरायल की प्रतिक्रिया इजरायल इस पूरे घटनाक्रम में एक प्रमुख पक्ष रहा है। युद्धविराम के बाद वहां की राजनीति में भी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। विपक्षी नेताओं ने सरकार की रणनीति पर सवाल उठाए, कुछ बयानों में इसे कूटनीतिक चुनौती बताया गया। हालांकि, इजरायली सरकार की आधिकारिक स्थिति संतुलित रही है और उसने सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात दोहराई है। इजरायल वर्षों से ईरान की शक्ति को कुचलने की कोशिश में रहा है लेकिन आज इजरायल में 'मातम' है। इजरायली लीडरशिप को समझ नहीं आ रहा कि इस युद्धविराम पर क्या प्रतिक्रिया दें। विपक्षी नेता यैर लैपिड ने इसे प्रधानमंत्री नेतन्याहू की 'नाकामी' कहा है।
अमेरिका की भूमिका पर उठे सवालईरान ने अहसास कराया है कि अमेरिका अब कमजोर हो रही महाशक्ति है। मिडिल ईस्ट के देश जो अभी तक अमेरिकी छतरी के नीचे थे वो छतरी अब फट चुकी है। अब मिडिल ईस्ट की राजनीति तेजी से बदलेगी। अब ये देश अमेरिका की 'सुरक्षा पर निर्भर' रहने के बजाय 'रणनीतिक स्वायत्तता' की तरफ बढ़ेंगे। यहां अब चीन आएगा और यकीन मानिए अमेरिका के निकलने की नींव ईरान ने रख दी है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और ऊर्जा सुरक्षाहोर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है। इस संघर्ष के दौरान इस मार्ग को लेकर अनिश्चितता ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया। तेल कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया, सप्लाई चेन पर असर पड़ा, वैश्विक बाजारों में अस्थिरता रही। युद्धविराम के बाद स्थिति कुछ हद तक सामान्य हुई है, लेकिन यह मुद्दा अभी भी संवेदनशील बना हुआ है।क्या बदल रही है मिडिल ईस्ट की राजनीति?इस पूरे घटनाक्रम ने संकेत दिया है कि मिडिल ईस्ट की राजनीति में बदलाव संभव है। ईरान ने अपने 'असममित युद्ध' और मिसाइल क्षमता के जरिए यह दिखा दिया है कि वह क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को तोड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य को ब्लॉक कर उसने खाड़ी देशों के तेल कारोबार पर ताला लगा दिया। खाड़ी देश अपनी अर्थव्यवस्था पर आघात झेलकर भी कुछ नहीं कर पाए। इस युद्ध से तय हो गया कि आने वाले वक्त में इस क्षेत्र में ईरान ही अगली शक्ति है। क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा रणनीतियों पर पुनर्विचार कर सकते हैं। बाहरी शक्तियों पर निर्भरता कम करने की कोशिश हो सकती है। चीन जैसे देशों की भूमिका बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
खाड़ी देशों में बदलता संतुलनइस संघर्ष ने खाड़ी देशों की सुरक्षा और रणनीतिक स्थिति पर भी सवाल खड़े किए हैं। क्षेत्रीय ऊर्जा ठिकानों पर हमलों की खबरों ने चिंता बढ़ाई, तेल और गैस आपूर्ति को लेकर अस्थिरता सामने आई। कुछ जियो-पॉलिटिकल विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटनाक्रम के बाद मिडिल ईस्ट में शक्ति संतुलन पहले जैसा नहीं रहेगा। हालांकि, यह बदलाव कितना गहरा होगा, यह आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा।इजरायल की प्रतिक्रिया इजरायल इस पूरे घटनाक्रम में एक प्रमुख पक्ष रहा है। युद्धविराम के बाद वहां की राजनीति में भी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। विपक्षी नेताओं ने सरकार की रणनीति पर सवाल उठाए, कुछ बयानों में इसे कूटनीतिक चुनौती बताया गया। हालांकि, इजरायली सरकार की आधिकारिक स्थिति संतुलित रही है और उसने सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात दोहराई है। इजरायल वर्षों से ईरान की शक्ति को कुचलने की कोशिश में रहा है लेकिन आज इजरायल में 'मातम' है। इजरायली लीडरशिप को समझ नहीं आ रहा कि इस युद्धविराम पर क्या प्रतिक्रिया दें। विपक्षी नेता यैर लैपिड ने इसे प्रधानमंत्री नेतन्याहू की 'नाकामी' कहा है।
अमेरिका की भूमिका पर उठे सवालईरान ने अहसास कराया है कि अमेरिका अब कमजोर हो रही महाशक्ति है। मिडिल ईस्ट के देश जो अभी तक अमेरिकी छतरी के नीचे थे वो छतरी अब फट चुकी है। अब मिडिल ईस्ट की राजनीति तेजी से बदलेगी। अब ये देश अमेरिका की 'सुरक्षा पर निर्भर' रहने के बजाय 'रणनीतिक स्वायत्तता' की तरफ बढ़ेंगे। यहां अब चीन आएगा और यकीन मानिए अमेरिका के निकलने की नींव ईरान ने रख दी है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और ऊर्जा सुरक्षाहोर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है। इस संघर्ष के दौरान इस मार्ग को लेकर अनिश्चितता ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया। तेल कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया, सप्लाई चेन पर असर पड़ा, वैश्विक बाजारों में अस्थिरता रही। युद्धविराम के बाद स्थिति कुछ हद तक सामान्य हुई है, लेकिन यह मुद्दा अभी भी संवेदनशील बना हुआ है।क्या बदल रही है मिडिल ईस्ट की राजनीति?इस पूरे घटनाक्रम ने संकेत दिया है कि मिडिल ईस्ट की राजनीति में बदलाव संभव है। ईरान ने अपने 'असममित युद्ध' और मिसाइल क्षमता के जरिए यह दिखा दिया है कि वह क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को तोड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य को ब्लॉक कर उसने खाड़ी देशों के तेल कारोबार पर ताला लगा दिया। खाड़ी देश अपनी अर्थव्यवस्था पर आघात झेलकर भी कुछ नहीं कर पाए। इस युद्ध से तय हो गया कि आने वाले वक्त में इस क्षेत्र में ईरान ही अगली शक्ति है। क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा रणनीतियों पर पुनर्विचार कर सकते हैं। बाहरी शक्तियों पर निर्भरता कम करने की कोशिश हो सकती है। चीन जैसे देशों की भूमिका बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
इजरायल इस पूरे घटनाक्रम में एक प्रमुख पक्ष रहा है। युद्धविराम के बाद वहां की राजनीति में भी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। विपक्षी नेताओं ने सरकार की रणनीति पर सवाल उठाए, कुछ बयानों में इसे कूटनीतिक चुनौती बताया गया। हालांकि, इजरायली सरकार की आधिकारिक स्थिति संतुलित रही है और उसने सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात दोहराई है। इजरायल वर्षों से ईरान की शक्ति को कुचलने की कोशिश में रहा है लेकिन आज इजरायल में 'मातम' है। इजरायली लीडरशिप को समझ नहीं आ रहा कि इस युद्धविराम पर क्या प्रतिक्रिया दें। विपक्षी नेता यैर लैपिड ने इसे प्रधानमंत्री नेतन्याहू की 'नाकामी' कहा है।
अमेरिका की भूमिका पर उठे सवालईरान ने अहसास कराया है कि अमेरिका अब कमजोर हो रही महाशक्ति है। मिडिल ईस्ट के देश जो अभी तक अमेरिकी छतरी के नीचे थे वो छतरी अब फट चुकी है। अब मिडिल ईस्ट की राजनीति तेजी से बदलेगी। अब ये देश अमेरिका की 'सुरक्षा पर निर्भर' रहने के बजाय 'रणनीतिक स्वायत्तता' की तरफ बढ़ेंगे। यहां अब चीन आएगा और यकीन मानिए अमेरिका के निकलने की नींव ईरान ने रख दी है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और ऊर्जा सुरक्षाहोर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है। इस संघर्ष के दौरान इस मार्ग को लेकर अनिश्चितता ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया। तेल कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया, सप्लाई चेन पर असर पड़ा, वैश्विक बाजारों में अस्थिरता रही। युद्धविराम के बाद स्थिति कुछ हद तक सामान्य हुई है, लेकिन यह मुद्दा अभी भी संवेदनशील बना हुआ है।क्या बदल रही है मिडिल ईस्ट की राजनीति?इस पूरे घटनाक्रम ने संकेत दिया है कि मिडिल ईस्ट की राजनीति में बदलाव संभव है। ईरान ने अपने 'असममित युद्ध' और मिसाइल क्षमता के जरिए यह दिखा दिया है कि वह क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को तोड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य को ब्लॉक कर उसने खाड़ी देशों के तेल कारोबार पर ताला लगा दिया। खाड़ी देश अपनी अर्थव्यवस्था पर आघात झेलकर भी कुछ नहीं कर पाए। इस युद्ध से तय हो गया कि आने वाले वक्त में इस क्षेत्र में ईरान ही अगली शक्ति है। क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा रणनीतियों पर पुनर्विचार कर सकते हैं। बाहरी शक्तियों पर निर्भरता कम करने की कोशिश हो सकती है। चीन जैसे देशों की भूमिका बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
ईरान ने अहसास कराया है कि अमेरिका अब कमजोर हो रही महाशक्ति है। मिडिल ईस्ट के देश जो अभी तक अमेरिकी छतरी के नीचे थे वो छतरी अब फट चुकी है। अब मिडिल ईस्ट की राजनीति तेजी से बदलेगी। अब ये देश अमेरिका की 'सुरक्षा पर निर्भर' रहने के बजाय 'रणनीतिक स्वायत्तता' की तरफ बढ़ेंगे। यहां अब चीन आएगा और यकीन मानिए अमेरिका के निकलने की नींव ईरान ने रख दी है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और ऊर्जा सुरक्षाहोर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है। इस संघर्ष के दौरान इस मार्ग को लेकर अनिश्चितता ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया। तेल कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया, सप्लाई चेन पर असर पड़ा, वैश्विक बाजारों में अस्थिरता रही। युद्धविराम के बाद स्थिति कुछ हद तक सामान्य हुई है, लेकिन यह मुद्दा अभी भी संवेदनशील बना हुआ है।क्या बदल रही है मिडिल ईस्ट की राजनीति?इस पूरे घटनाक्रम ने संकेत दिया है कि मिडिल ईस्ट की राजनीति में बदलाव संभव है। ईरान ने अपने 'असममित युद्ध' और मिसाइल क्षमता के जरिए यह दिखा दिया है कि वह क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को तोड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य को ब्लॉक कर उसने खाड़ी देशों के तेल कारोबार पर ताला लगा दिया। खाड़ी देश अपनी अर्थव्यवस्था पर आघात झेलकर भी कुछ नहीं कर पाए। इस युद्ध से तय हो गया कि आने वाले वक्त में इस क्षेत्र में ईरान ही अगली शक्ति है। क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा रणनीतियों पर पुनर्विचार कर सकते हैं। बाहरी शक्तियों पर निर्भरता कम करने की कोशिश हो सकती है। चीन जैसे देशों की भूमिका बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
इस पूरे घटनाक्रम ने संकेत दिया है कि मिडिल ईस्ट की राजनीति में बदलाव संभव है। ईरान ने अपने 'असममित युद्ध' और मिसाइल क्षमता के जरिए यह दिखा दिया है कि वह क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को तोड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य को ब्लॉक कर उसने खाड़ी देशों के तेल कारोबार पर ताला लगा दिया। खाड़ी देश अपनी अर्थव्यवस्था पर आघात झेलकर भी कुछ नहीं कर पाए। इस युद्ध से तय हो गया कि आने वाले वक्त में इस क्षेत्र में ईरान ही अगली शक्ति है। क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा रणनीतियों पर पुनर्विचार कर सकते हैं। बाहरी शक्तियों पर निर्भरता कम करने की कोशिश हो सकती है। चीन जैसे देशों की भूमिका बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
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