FATF के रडार पर फिर आया पाकिस्तान, कहा- ग्रे लिस्ट से बाहर होना आतंक फंडिंग से छूट नहीं, फिर होगी कार्रवाई?
‘जियोपोलिटिकल मॉनिटर’ की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन दोबारा सक्रिय होते दिख रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन संगठनों की परिचालन क्षमता में निरंतरता इस बात का संकेत है कि उन्हें संसाधन और संरचनात्मक समर्थन उपलब्ध है।

ओटावा: पाकिस्तान को फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की ‘ग्रे लिस्ट’ से बाहर किए जाने के फैसले पर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल खड़े हो रहे हैं। कनाडा स्थित शोध मंच ‘जियोपोलिटिकल मॉनिटर’ की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान को सूची से हटाना “समय से पहले लिया गया निर्णय” साबित हो सकता है, क्योंकि देश में आतंकी संगठनों की गतिविधियां और वित्तपोषण तंत्र पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, हाल के घटनाक्रम इस बात का संकेत देते हैं कि मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के वित्तपोषण के खिलाफ कार्रवाई के मामले में पाकिस्तान की प्रगति सतही हो सकती है।
फिर सक्रिय हुए प्रतिबंधित संगठन
‘जियोपोलिटिकल मॉनिटर’ की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन दोबारा सक्रिय होते दिख रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन संगठनों की परिचालन क्षमता में निरंतरता इस बात का संकेत है कि उन्हें संसाधन और संरचनात्मक समर्थन उपलब्ध है। रिपोर्ट के मुताबिक, “साक्ष्य बताते हैं कि सत्ता प्रतिष्ठान इन आतंकवादी संगठनों के पुनरुद्धार को बढ़ावा दे रहे हैं या कुछ मामलों में उन्हें सुविधा भी प्रदान कर रहे हैं।” हालांकि इन दावों पर पाकिस्तान सरकार की ओर से तत्काल कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि प्रतिबंधित संगठनों की गतिविधियां वास्तव में जारी हैं, तो यह एफएटीएफ की सिफारिशों के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
एफएटीएफ की प्रक्रिया और पाकिस्तान
एफएटीएफ एक अंतर-सरकारी संस्था है, जो मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के वित्तपोषण के खिलाफ वैश्विक मानक तय करती है। किसी देश को ‘ग्रे लिस्ट’ में शामिल किए जाने का मतलब होता है कि उसकी निगरानी बढ़ा दी गई है और उसे सुधारात्मक कदम उठाने होते हैं। पाकिस्तान को पहले भी कई बार इस सूची में डाला गया था। लंबे समय तक निगरानी और कार्रवाई के आश्वासनों के बाद उसे सूची से बाहर किया गया। उस समय इसे इस्लामाबाद की कूटनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया गया था। लेकिन अब नई रिपोर्ट यह संकेत दे रही है कि जमीनी स्तर पर हालात उतने स्थिर नहीं हैं, जितना कि औपचारिक दस्तावेजों में दर्शाया गया था।
‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने की पहल
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि पाकिस्तान ने दावोस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पहल पर प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने की सहमति दी है। इसे शांति और स्थिरता की दिशा में एक कूटनीतिक कदम के रूप में पेश किया गया है। हालांकि ‘जियोपोलिटिकल मॉनिटर’ का आकलन है कि यह पहल पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने की कोशिश का हिस्सा हो सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले 12 महीनों की घटनाओं ने ऐसी पहलों की विश्वसनीयता को प्रभावित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय भागीदारी के बावजूद, यदि घरेलू स्तर पर आतंकी नेटवर्क और फंडिंग चैनल सक्रिय रहते हैं, तो कूटनीतिक प्रयासों की प्रभावशीलता सीमित रह सकती है।
फरवरी की पूर्ण बैठक से पहले बढ़ा दबाव
एफएटीएफ की अगली पूर्ण बैठक फरवरी में प्रस्तावित है। ऐसे समय में इस तरह की रिपोर्ट सामने आना पाकिस्तान के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यदि सदस्य देश इन आरोपों को गंभीरता से लेते हैं, तो पाकिस्तान पर दोबारा कड़ी निगरानी या अतिरिक्त स्पष्टीकरण का दबाव बन सकता है। हालांकि किसी देश को दोबारा ‘ग्रे लिस्ट’ में डालने की प्रक्रिया जटिल और बहुस्तरीय होती है। कूटनीतिक हलकों में चर्चा है कि वैश्विक समुदाय आतंकवाद के वित्तपोषण से जुड़े जोखिमों को लेकर संवेदनशील बना हुआ है और किसी भी तरह की ढिलाई पर सख्त प्रतिक्रिया संभव है।
‘टेरर फाइनेंसिंग’ के अनसुलझे जोखिम
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि पाकिस्तान में ‘टेरर फाइनेंसिंग’ से जुड़े जोखिम पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। इसमें हवाला नेटवर्क, गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से धन के प्रवाह और सीमापार वित्तीय लेन-देन जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया है। हालांकि रिपोर्ट में प्रस्तुत निष्कर्ष स्वतंत्र आकलन पर आधारित हैं और इनकी पुष्टि आधिकारिक संस्थानों द्वारा नहीं की गई है, लेकिन इससे अंतरराष्ट्रीय बहस को बल मिला है।
सतर्क निगाहों का सामना
पाकिस्तान के लिए यह समय अपनी वित्तीय निगरानी प्रणाली और आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की पारदर्शिता को और मजबूत करने का हो सकता है। एफएटीएफ की आगामी बैठक में सदस्य देशों की प्रतिक्रिया यह तय करेगी कि क्या इन आरोपों का औपचारिक स्तर पर कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं। फिलहाल, ‘ग्रे लिस्ट’ से बाहर होने के बावजूद पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सतर्क निगाहों का सामना करना पड़ रहा है। आने वाले हफ्तों में यह स्पष्ट होगा कि रिपोर्ट में उठाए गए सवाल कूटनीतिक विमर्श तक सीमित रहते हैं या किसी ठोस कार्रवाई की दिशा में बढ़ते हैं।


