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ईरान समझौते पर अमेरिका में सियासी बवाल, ट्रंप को अपनी ही पार्टी में झेलना पड़ रहा विरोध

समझौते की सबसे चर्चित शर्तों में ईरान के लिए 300 अरब डॉलर के संभावित पुनर्निर्माण फंड का प्रावधान शामिल बताया जा रहा है। इसके अलावा ईरान को तेल निर्यात की अनुमति, प्रतिबंधों में ढील और भविष्य में जमे हुए फंड जारी करने की संभावना ने भी आलोचना को जन्म दिया है।

ईरान समझौते पर अमेरिका में सियासी बवाल, ट्रंप को अपनी ही पार्टी में झेलना पड़ रहा विरोध
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वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने के लिए किए गए अंतरिम समझौते को लेकर अमेरिका में तीखी बहस छिड़ गई है। शुरुआत में इस समझौते के दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए गए थे, जिसके कारण इसके प्रावधानों को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे थे। अब जैसे-जैसे समझौते के प्रमुख बिंदु सामने आ रहे हैं, वैसे-वैसे ट्रंप को न केवल विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी बल्कि अपनी रिपब्लिकन पार्टी और समर्थक वर्ग के भीतर भी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, 14 बिंदुओं वाले इस अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं, लेकिन इसके कई प्रावधान विवाद का कारण बन गए हैं।

300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण फंड पर उठे सवाल

समझौते की सबसे चर्चित शर्तों में ईरान के लिए 300 अरब डॉलर के संभावित पुनर्निर्माण फंड का प्रावधान शामिल बताया जा रहा है। इसके अलावा ईरान को तेल निर्यात की अनुमति, प्रतिबंधों में ढील और भविष्य में जमे हुए फंड जारी करने की संभावना ने भी आलोचना को जन्म दिया है। ट्रंप के विरोधियों का कहना है कि इतने बड़े आर्थिक पैकेज से ईरान को फायदा मिलेगा, जबकि समर्थकों का एक वर्ग इसे अमेरिका की रणनीतिक कमजोरी के रूप में देख रहा है।

होर्मुज और युद्धविराम पर भी विवाद

समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य से नौसैनिक नाकेबंदी हटाने और परमाणु वार्ता के लिए 60 दिनों के युद्धविराम का प्रावधान शामिल है। आलोचकों का तर्क है कि युद्ध के बाद हालात लगभग उसी स्थिति में पहुंच गए हैं, जहां से संघर्ष शुरू हुआ था। इसके अलावा यह आशंका भी जताई जा रही है कि भविष्य में ईरान इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग का इस्तेमाल करने वाले जहाजों से शुल्क या सेवा कर वसूलना जारी रख सकता है।

परमाणु कार्यक्रम पर स्पष्टता नहीं होने से चिंता

समझौते को लेकर सबसे बड़ी चिंता यह है कि इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर कोई स्पष्ट और ठोस प्रतिबद्धता दिखाई नहीं देती। आलोचकों का कहना है कि दस्तावेज की भाषा काफी अस्पष्ट है और इसमें परमाणु हथियारों के विकास को पूरी तरह रोकने के लिए कोई निश्चित समयसीमा या कठोर शर्तें निर्धारित नहीं की गई हैं।

ईरान समर्थित संगठनों पर खामोशी भी विवाद का कारण

रिपब्लिकन पार्टी के कई नेताओं और इजराइल समर्थक समूहों ने इस बात पर चिंता जताई है कि समझौते में हिज्बुल्ला, हमास और यमन के हूती विद्रोहियों जैसे ईरान समर्थित संगठनों की गतिविधियों पर कोई विशेष प्रावधान नहीं है। उनका मानना है कि इन संगठनों की सैन्य क्षमता को सीमित किए बिना स्थायी शांति संभव नहीं है।

डेमोक्रेटिक पार्टी ने पारदर्शिता की मांग उठाई

विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने ट्रंप प्रशासन पर समझौते के विवरण छिपाने का आरोप लगाया है। सीनेट में डेमोक्रेटिक नेता चक शूमर ने कहा कि अमेरिकी जनता और कांग्रेस को समझौते की पूरी जानकारी दी जानी चाहिए। उन्होंने प्रशासन से संसद के वरिष्ठ नेताओं के लिए विस्तृत खुफिया ब्रीफिंग आयोजित करने की मांग की है। डेमोक्रेट नेताओं का कहना है कि किसी भी अंतिम समझौते पर कांग्रेस में चर्चा और मतदान होना चाहिए। उनका आरोप है कि व्हाइट हाउस कानूनी प्रक्रियाओं को दरकिनार करने की कोशिश कर रहा है।

युद्ध से अमेरिका को क्या मिला, इस पर भी उठ रहे सवाल

डेमोक्रेटिक नेताओं ने यह सवाल भी उठाया है कि लंबे संघर्ष और सैन्य कार्रवाई के बाद अमेरिका को आखिर क्या रणनीतिक लाभ मिला। उनके अनुसार, युद्ध समाप्ति की घोषणाएं कई बार की गईं, लेकिन स्थायी समाधान अभी तक स्पष्ट नहीं है। पूर्व उप विदेश मंत्री वेंडी शर्मन ने भी टिप्पणी की कि समझौते के विवरण सार्वजनिक न किए जाने से यह संदेह पैदा होता है कि प्रशासन इसके राजनीतिक प्रभाव को लेकर चिंतित है।

MAGA समर्थक आधार में भी बढ़ी नाराजगी

ट्रंप के "मेक अमेरिका ग्रेट अगेन" (MAGA) समर्थक समूह के भीतर भी इस समझौते को लेकर मतभेद उभर आए हैं। कई कट्टर समर्थक मानते हैं कि युद्ध के दौरान अमेरिका को मिली सैन्य बढ़त को बातचीत के जरिए कमजोर किया जा रहा है। ईरानी वार्ताकारों की प्रशंसा करने वाले ट्रंप के हालिया बयान ने भी उनके कुछ समर्थकों को नाराज किया है। उनका मानना है कि ईरान को किसी भी प्रकार की आर्थिक रियायत देना गलत संदेश भेज सकता है।

इजराइल को लेकर भी उठे सवाल

राष्ट्रपति ट्रंप के कुछ समर्थकों का मानना है कि ईरान को दी जा रही रियायतें इजराइल के हितों के विपरीत हैं। उनका आरोप है कि युद्धविराम और समझौते की प्रक्रिया में इजराइल की चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। इसी कारण ट्रंप समर्थक मीडिया और कई रूढ़िवादी टिप्पणीकार भी समझौते को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

रिपब्लिकन पार्टी में दो धड़े आमने-सामने

इस मुद्दे पर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी दो अलग-अलग विचार सामने आए हैं। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस समझौते के सबसे बड़े समर्थकों में शामिल हैं। उनका कहना है कि अमेरिका को मध्य पूर्व के लंबे और महंगे युद्धों से बाहर निकलना चाहिए। उनके अनुसार, कूटनीतिक समाधान अमेरिका के हित में है। वहीं, पार्टी के कुछ नेता और सांसद इस समझौते को लेकर संशय में हैं। सीनेटर लिंडसे ग्राहम जैसे नेताओं ने जेडी वेंस से संसद के सामने आकर समझौते का बचाव करने की मांग की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा 2028 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले रिपब्लिकन पार्टी के भीतर वैचारिक विभाजन को और गहरा कर सकता है।

समझौते की सफलता पर टिकी निगाहें

ईरान के साथ हुए इस अंतरिम समझौते ने अमेरिका में राजनीतिक बहस को नई दिशा दे दी है। एक तरफ इसे युद्ध समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसकी शर्तों और पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि यह समझौता मध्य पूर्व में स्थिरता लाने में कितना सफल साबित होता है और अमेरिकी राजनीति पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।


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