अब्राहम समझौते को लेकर बुरी तरह फंस गया पाकिस्तान, जानें क्या है ट्रंप का मकसद
विश्लेषकों के अनुसार, पाकिस्तान इस मुद्दे पर दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। यदि वह अब्राहम समझौते का खुलकर विरोध करता है तो अमेरिका के साथ उसके संबंधों पर असर पड़ सकता है। वहीं अगर वह इस पहल के समर्थन में जाता है, तो उसे घरेलू राजनीतिक विरोध और धार्मिक समूहों के दबाव का सामना करना पड़ सकता है

इस्लामाबाद : पश्चिम एशिया में बदलते कूटनीतिक समीकरणों के बीच पाकिस्तान एक जटिल स्थिति में दिखाई दे रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम कराने में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा इस्लामाबाद अब खुद नई क्षेत्रीय राजनीति के दबाव में आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में मुस्लिम और अरब देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने की अपील की थी, लेकिन पाकिस्तान ने फिलहाल इससे साफ दूरी बना ली है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने कहा है कि इस्लामाबाद ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगा, जो उसकी पारंपरिक विदेश नीति और फलस्तीन के समर्थन वाले रुख के खिलाफ हो। उन्होंने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान आज भी इजरायल को मान्यता नहीं देता और वर्तमान परिस्थितियों में अब्राहम समझौते में शामिल होने का सवाल नहीं उठता।
फलस्तीन मुद्दे पर पुरानी नीति कायम
समा टीवी को दिए एक साक्षात्कार में ख्वाजा आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान की नीति वर्षों से स्पष्ट रही है। उनके अनुसार, जब तक 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर स्वतंत्र फलस्तीनी राष्ट्र की स्थापना नहीं होती, तब तक इजरायल के साथ संबंध सामान्य नहीं किए जाएंगे। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पाकिस्तान के पासपोर्ट पर आज भी इजरायल यात्रा मान्य नहीं है। इसे उन्होंने पाकिस्तान की आधिकारिक नीति का प्रतीक बताया। रक्षा मंत्री के अनुसार, यह केवल किसी सरकार की अस्थायी सोच नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही राष्ट्रीय नीति है, जिसे बदलना आसान नहीं होगा।
इजरायल पर भरोसे को लेकर संदेह
ख्वाजा आसिफ ने इजरायल के साथ स्थायी समझौते की संभावना पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि ऐसे पक्ष के साथ स्थायी शांति स्थापित करना कठिन होता है, जिसके रुख और नीतियों पर लगातार संदेह बना रहे। हालांकि उन्होंने किसी सीधे टकराव वाली भाषा का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन उनके बयान से यह संकेत जरूर मिला कि पाकिस्तान फिलहाल इजरायल के साथ रिश्तों को लेकर बेहद सतर्क है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान के भीतर धार्मिक संगठनों और आम जनता के बीच फलस्तीन के समर्थन की भावना काफी मजबूत है। ऐसे में सरकार के लिए अचानक कोई बड़ा कूटनीतिक बदलाव करना घरेलू स्तर पर राजनीतिक चुनौती बन सकता है।
क्या हैं अब्राहम समझौते?
अब्राहम समझौते की शुरुआत वर्ष 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता से हुई थी। इसके तहत संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और सूडान जैसे देशों ने इजरायल के साथ अपने संबंध सामान्य किए थे। उस समय इसे पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा बदलाव माना गया था। ट्रंप प्रशासन अब इस ढांचे को और विस्तार देने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका का मानना है कि अरब देशों और इजरायल के बीच बढ़ते संबंधों से क्षेत्रीय स्थिरता मजबूत होगी और ईरान के साथ संभावित समझौते के लिए भी बेहतर माहौल तैयार किया जा सकेगा।
पाकिस्तान के सामने दोहरी चुनौती
विश्लेषकों के अनुसार, पाकिस्तान इस मुद्दे पर दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। यदि वह अब्राहम समझौते का खुलकर विरोध करता है तो अमेरिका के साथ उसके संबंधों पर असर पड़ सकता है। वहीं अगर वह इस पहल के समर्थन में जाता है, तो उसे घरेलू राजनीतिक विरोध और धार्मिक समूहों के दबाव का सामना करना पड़ सकता है। यही वजह है कि पाकिस्तान फिलहाल संतुलित और सतर्क रणनीति अपनाता दिख रहा है। इस्लामाबाद न तो अमेरिका को सीधे नाराज करना चाहता है और न ही अपनी पारंपरिक फलस्तीन समर्थक नीति से पीछे हटना चाहता है।
सऊदी अरब की भूमिका पर टिकी नजरें
पश्चिम एशिया की राजनीति में सऊदी अरब का रुख पाकिस्तान के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। रियाद ने अब तक इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने को फलस्तीनी समाधान से जोड़ा हुआ है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह चर्चा लगातार होती रही है कि भविष्य में सऊदी अरब भी अब्राहम समझौते की दिशा में आगे बढ़ सकता है। यदि ऐसा होता है, तो पाकिस्तान पर भी कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है। सऊदी अरब और पाकिस्तान के करीबी आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को देखते हुए इस संभावना को काफी अहम माना जा रहा है।
चीन के साथ रणनीतिक साझेदारी पर जोर
इसी बीच पाकिस्तान ने चीन के साथ अपने संबंध और मजबूत करने के संकेत दिए हैं। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की 23 से 26 मई तक की चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों ने रणनीतिक साझेदारी को नई मजबूती देने पर सहमति जताई। यात्रा के बाद जारी संयुक्त बयान में कहा गया कि पाकिस्तान और चीन साझा भविष्य के निर्माण तथा द्विपक्षीय संबंधों की रक्षा के लिए मिलकर काम करेंगे। इस दौरान शहबाज शरीफ की मुलाकात राष्ट्रपति शी चिनफिंग और प्रधानमंत्री ली कियांग से हुई। संयुक्त बयान में पाकिस्तान ने पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता को लेकर राष्ट्रपति शी चिनफिंग के प्रस्तावों का समर्थन किया। वहीं चीन ने अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम कराने तथा इस्लामाबाद में वार्ता आयोजित करने में पाकिस्तान की भूमिका की सराहना की।
दोनों देशों ने खाड़ी क्षेत्र में स्थिरता बहाल करने के लिए पांच सूत्रीय पहल को आगे बढ़ाने पर भी सहमति जताई। इससे साफ संकेत मिलता है कि पाकिस्तान अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाते हुए अपनी क्षेत्रीय भूमिका को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।


