नेपाल में PM बनते ही सामने आया बालेन शाह का असली चेहरा, 45 दिन में भारत के खिलाफ लिए ये 4 फैसले
नेपाल सरकार ने भारत-नेपाल सीमा से आने-जाने वाले लोगों के लिए नई व्यवस्था लागू करने की घोषणा की है। अब भारत से नेपाल जाने वाले भारतीय नागरिकों को हर समय पहचान पत्र साथ रखना होगा। इसके अलावा सुरक्षा जांच की प्रक्रिया भी अनिवार्य कर दी गई है।

काठमांडू। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के हालिया फैसलों ने भारत-नेपाल संबंधों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से खुले सीमा संबंध और सांस्कृतिक निकटता रही है, लेकिन हाल के कुछ कदमों को भारत के प्रति सख्त रुख के तौर पर देखा जा रहा है। सीमा नियमों में बदलाव से लेकर पुराने क्षेत्रीय विवादों को दोबारा उठाने तक, कई फैसलों ने राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है।
सीमा पर नए नियम लागू
नेपाल सरकार ने भारत-नेपाल सीमा से आने-जाने वाले लोगों के लिए नई व्यवस्था लागू करने की घोषणा की है। अब भारत से नेपाल जाने वाले भारतीय नागरिकों को हर समय पहचान पत्र साथ रखना होगा। इसके अलावा सुरक्षा जांच की प्रक्रिया भी अनिवार्य कर दी गई है। अब तक दोनों देशों की खुली सीमा व्यवस्था के कारण सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग बिना किसी बड़ी औपचारिकता के आवाजाही करते थे। नेपाल के नए नियमों को सीमा प्रबंधन और सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया जा रहा है, लेकिन इससे सीमा क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की परेशानियां बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। भारत और नेपाल के बीच करीब 1751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है, जिसका इस्तेमाल रोजाना हजारों लोग व्यापार, रोजगार और पारिवारिक कारणों से करते हैं।
विक्रम मिस्री की यात्रा रद्द होने की चर्चा
रविवार को नेपाल की मीडिया में यह खबर भी सामने आई कि नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री से मुलाकात से इनकार कर दिया, जिसके बाद उनकी प्रस्तावित नेपाल यात्रा रद्द हो गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह दौरा भारत और नेपाल के बीच विदेश नीति और द्विपक्षीय सहयोग पर बातचीत के लिए तय किया गया था। हालांकि, दावा किया गया कि बालेन शाह ने केवल अपने समकक्ष स्तर के प्रतिनिधियों से ही बैठक करने की बात कही। इसके बाद कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ पाया। इस घटनाक्रम को दोनों देशों के रिश्तों में बढ़ती दूरी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
सीमा व्यापार पर भी सख्ती
नेपाल सरकार ने सीमा क्षेत्रों में व्यापार और सामान ले जाने के नियमों को भी कड़ा कर दिया है। पहले भारत से नेपाल के तराई क्षेत्रों में रहने वाले लोग आसानी से रोजमर्रा का सामान खरीदकर ले जाते थे, जिससे महंगाई का असर कम पड़ता था। अब नए नियम के तहत यदि कोई व्यक्ति भारत से 100 नेपाली रुपये से अधिक का सामान लेकर नेपाल जाता है, तो उस पर कस्टम शुल्क लगाया जाएगा। इस फैसले के बाद सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों के बीच नाराजगी देखने को मिल रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि दोनों देशों की खुली सीमा व्यवस्था का सबसे ज्यादा फायदा गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों को मिलता था, लेकिन नए नियमों से उनकी आर्थिक मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
फिर उठा कालापानी और लिपुलेख विवाद
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से चले आ रहे कालापानी और लिपुलेख सीमा विवाद को भी फिर से चर्चा में ला दिया है। हाल ही में मानसरोवर यात्रा को लेकर चीन की ओर से जारी एडवाइजरी के संदर्भ में बालेन शाह ने कहा कि नेपाल की सहमति के बिना किसी भी सीमा क्षेत्र को लेकर निर्णय स्वीकार नहीं किया जा सकता। नेपाल लंबे समय से कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा क्षेत्रों पर अपना दावा करता रहा है। इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के कार्यकाल में नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी कर इन क्षेत्रों को अपने नक्शे में शामिल किया था। भारत ने उस समय नेपाल के इस कदम का विरोध करते हुए इसे कृत्रिम विवाद पैदा करने की कोशिश बताया था।
बालेन शाह की पुरानी छवि फिर चर्चा में
बालेन शाह पहले भी भारत को लेकर अपने बयानों और फैसलों के कारण चर्चा में रह चुके हैं। 2022 में उन्होंने “ग्रेटर नेपाल” का नक्शा साझा किया था, जिसे लेकर विवाद खड़ा हो गया था। काठमांडू के मेयर रहते हुए उन्होंने फिल्म ‘आदिपुरुष’ को वहां रिलीज होने से रोक दिया था। उस समय उन्होंने दावा किया था कि फिल्म में सीता को लेकर आपत्तिजनक संदर्भ दिए गए हैं। हालांकि प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उम्मीद जताई जा रही थी कि बालेन शाह भारत के साथ संबंधों को संतुलित रखने की कोशिश करेंगे, लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने उस उम्मीद पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रिश्तों पर पड़ सकता है असर
भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध बेहद गहरे रहे हैं। दोनों देशों के नागरिकों को विशेष आवागमन और रोजगार की सुविधाएं भी प्राप्त हैं। ऐसे में सीमा नियमों में सख्ती और राजनीतिक बयानबाजी का असर आम लोगों और द्विपक्षीय रिश्तों पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के लिए संवाद और सहयोग की प्रक्रिया को बनाए रखना जरूरी होगा, ताकि सीमा और राजनीतिक मुद्दे बड़े विवाद का रूप न लें।


