Begin typing your search above and press return to search.
No Kings Protests: ट्रंप के खिलाफ 50 राज्यों में रैलियों में लाखों लोग उतरे, वैश्विक स्तर पर भी समर्थन
देशभर में हुए इन प्रदर्शनों का केंद्र न्यूयॉर्क, लॉस एंजिलिस, वॉशिंगटन डीसी और मिनेसोटा के ट्विन सिटीज रहे। हालांकि इस बार की खास बात यह रही कि बड़ी संख्या में रैलियां छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में भी आयोजित की गईं।

वॉशिंगटन/न्यूयॉर्क: No Kings Protests: अमेरिका में शनिवार को “नो किंग्स” (No Kings) यानी “कोई राजा नहीं” आंदोलन के तहत अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। देश के सभी 50 राज्यों में हजारों रैलियां आयोजित की गईं, जिनमें लाखों लोगों ने हिस्सा लिया। यह विरोध केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यूरोप, लैटिन अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया सहित कई देशों में भी लोगों ने सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज बुलंद की।
आयोजकों के अनुसार, इस बार 3,200 से अधिक प्रदर्शन कार्यक्रम तय किए गए थे और अनुमान था कि करीब 90 लाख लोग इसमें शामिल हो सकते हैं। इसे अमेरिका के इतिहास का सबसे बड़ा एक-दिवसीय अहिंसक विरोध प्रदर्शन बताया जा रहा है।
कहां-कहां हुईं प्रमुख रैलियांदेशभर में हुए इन प्रदर्शनों का केंद्र न्यूयॉर्क, लॉस एंजिलिस, वॉशिंगटन डीसी और मिनेसोटा के ट्विन सिटीज रहे। हालांकि इस बार की खास बात यह रही कि बड़ी संख्या में रैलियां छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में भी आयोजित की गईं। ‘इंडिविजिबल’ समूह की सह-संस्थापक लेह ग्रीनबर्ग ने कहा कि इस आंदोलन की असली ताकत केवल भीड़ नहीं, बल्कि उसका भौगोलिक विस्तार है। उन्होंने कहा, “यह मायने रखता है कि लोग कहां खड़े हो रहे हैं- छोटे कस्बों से लेकर बड़े शहरों तक हर जगह विरोध की आवाज उठ रही है।” ‘इंडिविजिबल’ वही संगठन है जिसने पिछले साल “नो किंग्स” आंदोलन की शुरुआत की थी और इस बार के प्रदर्शनों के आयोजन में भी अहम भूमिका निभाई।
तीसरी बड़ी रैली, बढ़ती भागीदारी
शनिवार का प्रदर्शन इस आंदोलन की तीसरी बड़ी रैली थी। आयोजकों के मुताबिक, जून में करीब 50 लाख और अक्टूबर में 70 लाख लोग इस आंदोलन में शामिल हुए थे। इस बार भागीदारी और भी अधिक रहने का अनुमान जताया गया। कुल 3,100 से ज्यादा कार्यक्रम आयोजित किए गए, जो पिछले अक्टूबर के मुकाबले करीब 500 अधिक हैं। इनमें से लगभग दो-तिहाई प्रदर्शन छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में हुए, जो इस आंदोलन के व्यापक फैलाव को दर्शाता है।
मिनेसोटा बना केंद्र, स्प्रिंगस्टीन का खास संदेशइस बार की सबसे बड़ी और प्रतीकात्मक रैली मिनेसोटा की राजधानी सेंट पॉल में आयोजित की गई, जिसे राष्ट्रीय मुख्य कार्यक्रम घोषित किया गया था।यहां मशहूर रॉक गायक ब्रूस स्प्रिंगस्टीन ने “स्ट्रीट्स ऑफ मिनियापोलिस” गीत प्रस्तुत किया, जो उन्होंने कथित तौर पर इमिग्रेशन एजेंटों की कार्रवाई में मारे गए लोगों की याद में लिखा था। स्प्रिंगस्टीन ने अपने संबोधन में कहा कि मिनेसोटा के लोगों की हिम्मत और एकजुटता पूरे देश के लिए उम्मीद का संदेश है।इस कार्यक्रम में अभिनेता रॉबर्ट डी नीरो, गायिका जोन बेज, अभिनेत्री जेन फोंडा और सीनेटर बर्नी सैंडर्स जैसे कई प्रमुख चेहरे शामिल हुए। कैपिटल की सीढ़ियों पर एक बड़ा बैनर भी लगाया गया, जिस पर लिखा था—“हमारे पास सीटियां थीं, उनके पास बंदूकें।”
किन मुद्दों पर भड़का गुस्सा?प्रदर्शनकारियों की नाराजगी कई मुद्दों को लेकर थी। सबसे बड़ा मुद्दा ट्रंप प्रशासन की आक्रामक इमिग्रेशन नीति रही, खासकर मिनेसोटा में इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एन्फोर्समेंट (ICE) की कार्रवाइयों को लेकर लोगों में गहरा असंतोष देखा गया। इसके अलावा ईरान के खिलाफ जारी सैन्य कार्रवाई, ट्रांसजेंडर अधिकारों में कथित कटौती, और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे भी विरोध का केंद्र रहे। वॉशिंगटन डीसी में लिंकन मेमोरियल के पास सैकड़ों लोगों ने मार्च किया, जहां बैनरों पर “ताज उतारो” और “बदलाव यहीं से शुरू होता है” जैसे संदेश लिखे थे। सैन डिएगो में करीब 40,000 लोग सड़कों पर उतरे। न्यूयॉर्क में न्यूयॉर्क सिविल लिबर्टीज यूनियन की प्रमुख डोना लिबरमैन ने कहा कि “डर का माहौल बनाकर लोगों को चुप नहीं कराया जा सकता।”अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गूंजयह आंदोलन वैश्विक स्तर पर भी फैलता नजर आया। जिन देशों में राजशाही व्यवस्था है, वहां इसे “नो टायरेंट्स” (No Tyrants) यानी “कोई तानाशाह नहीं” के नाम से आयोजित किया गया। रोम में हजारों लोगों ने मार्च निकालते हुए युद्ध और पश्चिम एशिया में अमेरिकी-इजरायली कार्रवाइयों के खिलाफ नारे लगाए। लंदन में प्रदर्शनकारियों ने “नस्लवाद के खिलाफ खड़े हो” और “दक्षिणपंथ को रोको” जैसे बैनर उठाए। पेरिस के बैस्टिल चौक पर फ्रांस में रहने वाले अमेरिकी नागरिकों के साथ श्रमिक संगठनों और मानवाधिकार समूहों ने भी भाग लिया।ट्रम्प समर्थकों की प्रतिक्रियाजहां एक ओर यह आंदोलन तेजी से फैलता दिखा, वहीं ट्रंप प्रशासन और उनके समर्थकों ने इसे खारिज करने की कोशिश की। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता अबीगेल जैक्सन ने इन रैलियों को “ट्रंप डिरेंजमेंट थेरेपी सेशंस” करार देते हुए कहा कि यह “वामपंथी फंडिंग का खेल” है और आम जनता का इससे कोई लेना-देना नहीं है। रिपब्लिकन पार्टी की संसदीय समिति ने भी इन प्रदर्शनों को “हेट अमेरिका रैलियां” बताया। हालांकि जमीनी स्तर पर तस्वीर कुछ अलग नजर आई। इडाहो, मोंटाना और यूटा जैसे पारंपरिक रिपब्लिकन राज्यों में भी बड़ी संख्या में लोग प्रदर्शन में शामिल हुए।चुनावी साल में बढ़ता राजनीतिक महत्वइस साल के अंत में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के मद्देनजर इस आंदोलन को राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आयोजकों का दावा है कि रिपब्लिकन-बहुल राज्यों में भी विरोध प्रदर्शनों के लिए पंजीकरण करने वालों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। टीचर्स फेडरेशन की प्रमुख रांडी वेनगार्टेन ने कहा, “चाहे कोई कितना भी अनसुना करने की कोशिश करे, लाखों लोगों की आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”विरोध की नई लहर“नो किंग्स” आंदोलन ने यह दिखा दिया है कि अमेरिका में राजनीतिक असहमति अब केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों तक फैल चुकी है। यह आंदोलन न सिर्फ ट्रंप प्रशासन की नीतियों के खिलाफ एक व्यापक जनआक्रोश का संकेत है, बल्कि आने वाले चुनावों से पहले बदलते राजनीतिक माहौल का भी इशारा करता है।
प्रदर्शनकारियों की नाराजगी कई मुद्दों को लेकर थी। सबसे बड़ा मुद्दा ट्रंप प्रशासन की आक्रामक इमिग्रेशन नीति रही, खासकर मिनेसोटा में इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एन्फोर्समेंट (ICE) की कार्रवाइयों को लेकर लोगों में गहरा असंतोष देखा गया। इसके अलावा ईरान के खिलाफ जारी सैन्य कार्रवाई, ट्रांसजेंडर अधिकारों में कथित कटौती, और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे भी विरोध का केंद्र रहे।
वॉशिंगटन डीसी में लिंकन मेमोरियल के पास सैकड़ों लोगों ने मार्च किया, जहां बैनरों पर “ताज उतारो” और “बदलाव यहीं से शुरू होता है” जैसे संदेश लिखे थे। सैन डिएगो में करीब 40,000 लोग सड़कों पर उतरे। न्यूयॉर्क में न्यूयॉर्क सिविल लिबर्टीज यूनियन की प्रमुख डोना लिबरमैन ने कहा कि “डर का माहौल बनाकर लोगों को चुप नहीं कराया जा सकता।”
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गूंजयह आंदोलन वैश्विक स्तर पर भी फैलता नजर आया। जिन देशों में राजशाही व्यवस्था है, वहां इसे “नो टायरेंट्स” (No Tyrants) यानी “कोई तानाशाह नहीं” के नाम से आयोजित किया गया। रोम में हजारों लोगों ने मार्च निकालते हुए युद्ध और पश्चिम एशिया में अमेरिकी-इजरायली कार्रवाइयों के खिलाफ नारे लगाए। लंदन में प्रदर्शनकारियों ने “नस्लवाद के खिलाफ खड़े हो” और “दक्षिणपंथ को रोको” जैसे बैनर उठाए। पेरिस के बैस्टिल चौक पर फ्रांस में रहने वाले अमेरिकी नागरिकों के साथ श्रमिक संगठनों और मानवाधिकार समूहों ने भी भाग लिया।ट्रम्प समर्थकों की प्रतिक्रियाजहां एक ओर यह आंदोलन तेजी से फैलता दिखा, वहीं ट्रंप प्रशासन और उनके समर्थकों ने इसे खारिज करने की कोशिश की। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता अबीगेल जैक्सन ने इन रैलियों को “ट्रंप डिरेंजमेंट थेरेपी सेशंस” करार देते हुए कहा कि यह “वामपंथी फंडिंग का खेल” है और आम जनता का इससे कोई लेना-देना नहीं है। रिपब्लिकन पार्टी की संसदीय समिति ने भी इन प्रदर्शनों को “हेट अमेरिका रैलियां” बताया। हालांकि जमीनी स्तर पर तस्वीर कुछ अलग नजर आई। इडाहो, मोंटाना और यूटा जैसे पारंपरिक रिपब्लिकन राज्यों में भी बड़ी संख्या में लोग प्रदर्शन में शामिल हुए।चुनावी साल में बढ़ता राजनीतिक महत्वइस साल के अंत में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के मद्देनजर इस आंदोलन को राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आयोजकों का दावा है कि रिपब्लिकन-बहुल राज्यों में भी विरोध प्रदर्शनों के लिए पंजीकरण करने वालों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। टीचर्स फेडरेशन की प्रमुख रांडी वेनगार्टेन ने कहा, “चाहे कोई कितना भी अनसुना करने की कोशिश करे, लाखों लोगों की आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”विरोध की नई लहर“नो किंग्स” आंदोलन ने यह दिखा दिया है कि अमेरिका में राजनीतिक असहमति अब केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों तक फैल चुकी है। यह आंदोलन न सिर्फ ट्रंप प्रशासन की नीतियों के खिलाफ एक व्यापक जनआक्रोश का संकेत है, बल्कि आने वाले चुनावों से पहले बदलते राजनीतिक माहौल का भी इशारा करता है।
जहां एक ओर यह आंदोलन तेजी से फैलता दिखा, वहीं ट्रंप प्रशासन और उनके समर्थकों ने इसे खारिज करने की कोशिश की। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता अबीगेल जैक्सन ने इन रैलियों को “ट्रंप डिरेंजमेंट थेरेपी सेशंस” करार देते हुए कहा कि यह “वामपंथी फंडिंग का खेल” है और आम जनता का इससे कोई लेना-देना नहीं है। रिपब्लिकन पार्टी की संसदीय समिति ने भी इन प्रदर्शनों को “हेट अमेरिका रैलियां” बताया। हालांकि जमीनी स्तर पर तस्वीर कुछ अलग नजर आई। इडाहो, मोंटाना और यूटा जैसे पारंपरिक रिपब्लिकन राज्यों में भी बड़ी संख्या में लोग प्रदर्शन में शामिल हुए।
चुनावी साल में बढ़ता राजनीतिक महत्वइस साल के अंत में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के मद्देनजर इस आंदोलन को राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आयोजकों का दावा है कि रिपब्लिकन-बहुल राज्यों में भी विरोध प्रदर्शनों के लिए पंजीकरण करने वालों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। टीचर्स फेडरेशन की प्रमुख रांडी वेनगार्टेन ने कहा, “चाहे कोई कितना भी अनसुना करने की कोशिश करे, लाखों लोगों की आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”विरोध की नई लहर“नो किंग्स” आंदोलन ने यह दिखा दिया है कि अमेरिका में राजनीतिक असहमति अब केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों तक फैल चुकी है। यह आंदोलन न सिर्फ ट्रंप प्रशासन की नीतियों के खिलाफ एक व्यापक जनआक्रोश का संकेत है, बल्कि आने वाले चुनावों से पहले बदलते राजनीतिक माहौल का भी इशारा करता है।
“नो किंग्स” आंदोलन ने यह दिखा दिया है कि अमेरिका में राजनीतिक असहमति अब केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों तक फैल चुकी है। यह आंदोलन न सिर्फ ट्रंप प्रशासन की नीतियों के खिलाफ एक व्यापक जनआक्रोश का संकेत है, बल्कि आने वाले चुनावों से पहले बदलते राजनीतिक माहौल का भी इशारा करता है।
Next Story


