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डोनाल्‍ड ट्रंप ने खींचे यूक्रेन से हाथ तो यूरोप की जेब हो गई साफ... एक साल में ही सवा नौ लाख करोड़ उड़े

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में वैश्विक सैन्य खर्च बढ़कर 2.9 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। यह 2024 की तुलना में लगभग 2.9 प्रतिशत अधिक है और लगातार 11वां साल है जब रक्षा बजट में बढ़ोतरी हुई है।

डोनाल्‍ड ट्रंप ने खींचे यूक्रेन से हाथ तो यूरोप की जेब हो गई साफ... एक साल में ही सवा नौ लाख करोड़ उड़े
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नई दिल्ली: SIPRI Report: दुनिया के कई हिस्सों में जारी संघर्ष और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच सैन्य खर्च में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में वैश्विक सैन्य खर्च बढ़कर 2.9 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। यह 2024 की तुलना में लगभग 2.9 प्रतिशत अधिक है और लगातार 11वां साल है जब रक्षा बजट में बढ़ोतरी हुई है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि दुनिया भर के देश सुरक्षा को लेकर पहले से अधिक सतर्क और सक्रिय हो गए हैं।

युद्ध और तनाव बना मुख्य कारण

रिपोर्ट के मुताबिक, रूस-यूक्रेन युद्ध, अमेरिका-ईरान-इजरायल तनाव, चीन-ताइवान विवाद और भारत-पाकिस्तान के बीच जारी खींचतान जैसे कई क्षेत्रीय और वैश्विक विवाद इस बढ़ोतरी के पीछे प्रमुख कारण हैं। इन संघर्षों ने देशों को अपनी सैन्य ताकत मजबूत करने के लिए प्रेरित किया है। परिणामस्वरूप, अब औसतन देश अपनी जीडीपी का 2.5 प्रतिशत हिस्सा रक्षा पर खर्च कर रहे हैं, जो 2009 के बाद सबसे अधिक है।

अमेरिका का खर्च घटा, लेकिन दबदबा कायम

दिलचस्प रूप से, 2025 में अमेरिका का सैन्य खर्च 7.5 प्रतिशत घटकर 954 अरब डॉलर रह गया। इसका मुख्य कारण यूक्रेन को नई सैन्य सहायता न देना बताया गया है। पिछले तीन वर्षों में अमेरिका यूक्रेन को 127 अरब डॉलर की सहायता दे चुका था, लेकिन 2025 में इसमें विराम लगा। हालांकि, इसके बावजूद अमेरिका अब भी दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा खर्च करने वाला देश बना हुआ है। साथ ही, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के प्रभाव को संतुलित करने के लिए अमेरिका अपनी सैन्य क्षमताओं पर निवेश जारी रखे हुए है।

यूरोप पर बढ़ा बोझ

अमेरिका के पीछे हटने का असर यूरोप पर साफ दिखा है। SIPRI रिपोर्ट के अनुसार, यूरोप का सैन्य खर्च 14 प्रतिशत बढ़कर 792 अरब डॉलर तक पहुंच गया। 2024 में यह आंकड़ा 694 अरब डॉलर था। यानी एक साल में लगभग 98 अरब डॉलर (करीब 9.25 लाख करोड़ रुपये) का अतिरिक्त बोझ यूरोप पर पड़ा। रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते यूरोपीय देशों ने अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए रक्षा बजट में उल्लेखनीय वृद्धि की है।

एशिया और ओशिनिया में भी बढ़ोतरी

एशिया और ओशिनिया क्षेत्र में भी सैन्य खर्च में 8.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इस क्षेत्र में चीन का रक्षा बजट लगातार बढ़ रहा है, जो क्षेत्रीय संतुलन के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। चीन, अमेरिका और रूस मिलकर दुनिया के कुल सैन्य खर्च का बड़ा हिस्सा वहन करते हैं। तीनों देशों ने मिलकर करीब 1.48 ट्रिलियन डॉलर रक्षा पर खर्च किए हैं।

रूस और यूक्रेन का रिकॉर्ड खर्च

रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध ने दोनों देशों के रक्षा बजट को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा दिया है। रूस का सैन्य खर्च 5.9 प्रतिशत बढ़कर 190 अरब डॉलर हो गया, जबकि यूक्रेन ने 20 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 84.1 अरब डॉलर खर्च किए। खास बात यह है कि यूक्रेन अपनी जीडीपी का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा रक्षा पर खर्च कर रहा है, जो किसी भी देश के लिए बेहद असाधारण स्थिति है।

नाटो देशों की बढ़ती भूमिका

रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में नाटो के 29 यूरोपीय सदस्य देशों ने मिलकर 559 अरब डॉलर का सैन्य खर्च किया। इनमें से 22 देशों ने अपनी जीडीपी का कम से कम 2 प्रतिशत रक्षा पर खर्च किया। जर्मनी ने सबसे ज्यादा बढ़ोतरी करते हुए अपना बजट 24 प्रतिशत बढ़ाकर 114 अरब डॉलर कर दिया, जबकि स्पेन का खर्च 50 प्रतिशत बढ़कर 40.2 अरब डॉलर पहुंच गया। यह 1994 के बाद पहली बार है जब स्पेन का रक्षा खर्च उसकी जीडीपी के 2 प्रतिशत से अधिक हुआ है।

भविष्य में और बढ़ सकता है खर्च

SIPRI के विशेषज्ञों का मानना है कि यह बढ़ोतरी आने वाले वर्षों में भी जारी रह सकती है। अमेरिका ने 2026 के लिए रक्षा बजट को 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक करने की मंजूरी दे दी है, जो 2027 तक 1.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। वहीं, रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध और अन्य वैश्विक तनाव इस ट्रेंड को और तेज कर सकते हैं।

अस्थिर दुनिया में बढ़ती सैन्य तैयारी

SIPRI की रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि दुनिया एक अस्थिर दौर से गुजर रही है, जहां सुरक्षा चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में देश अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह रुझान वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए चुनौती बन सकता है, क्योंकि बढ़ता सैन्यीकरण अक्सर तनाव को और गहरा कर देता है।


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