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क्या आने वाला है महाविनाश? 2026 के लिए डूम्सडे क्लॉक में प्रलय सिर्फ 85 सेकंड दूर

संस्था के अनुसार, डूम्सडे क्लॉक को आगे बढ़ाने के पीछे कई आपस में जुड़े वैश्विक कारण हैं। इनमें सबसे अहम हैं— अमेरिका, रूस और चीन जैसे परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच बढ़ता तनाव, परमाणु हथियार नियंत्रण समझौतों का कमजोर या निष्क्रिय होना, यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में जारी संघर्ष, जो बड़े टकराव का रूप ले सकते हैं।

क्या आने वाला है महाविनाश? 2026 के लिए डूम्सडे क्लॉक में प्रलय सिर्फ 85 सेकंड दूर
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वाशिंगटन। दुनिया के प्रमुख परमाणु वैज्ञानिकों और सुरक्षा विशेषज्ञों ने मानव सभ्यता के भविष्य को लेकर एक बार फिर गंभीर चेतावनी दी है। ‘डूम्सडे क्लॉक’ (प्रलय की घड़ी) को अब तक की सबसे खतरनाक स्थिति में पहुंचा दिया गया है। यह घड़ी अब आधी रात से केवल 85 सेकंड दूर है, जो यह संकेत देती है कि दुनिया वैश्विक विनाश जैसे परमाणु युद्ध या व्यापक तबाही के बेहद करीब पहुंच चुकी है। यह घोषणा प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्था ‘बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स’ ने की है। संस्था का कहना है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात, महाशक्तियों का आक्रामक रुख और नई तकनीकों के अनियंत्रित इस्तेमाल ने जोखिम को अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ा दिया है।

क्यों बढ़ाया गया खतरे का अलार्म?

संस्था के अनुसार, डूम्सडे क्लॉक को आगे बढ़ाने के पीछे कई आपस में जुड़े वैश्विक कारण हैं। इनमें सबसे अहम हैं— अमेरिका, रूस और चीन जैसे परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच बढ़ता तनाव, परमाणु हथियार नियंत्रण समझौतों का कमजोर या निष्क्रिय होना, यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में जारी संघर्ष, जो बड़े टकराव का रूप ले सकते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का सैन्य प्रणालियों में तेजी से और बिना पर्याप्त नियंत्रण के इस्तेमाल। जलवायु परिवर्तन, जिसकी गंभीरता लगातार बढ़ती जा रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन सभी कारकों का एक साथ मौजूद होना दुनिया को पहले से कहीं अधिक अस्थिर बना रहा है।

सैन्य एआई बना नया खतरा

‘बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स’ ने विशेष रूप से एआई के सैन्य उपयोग को लेकर चिंता जताई है। संस्था का कहना है कि बिना मानव नियंत्रण के काम करने वाले स्वचालित हथियार और सैन्य सिस्टम किसी भी गलत फैसले या तकनीकी त्रुटि के कारण तबाही मचा सकते हैं। इसके अलावा एआई का दुरुपयोग जैविक हथियारों के निर्माण, फर्जी सूचनाओं और दुष्प्रचार और समाजों को अंदर से अस्थिर करने जैसे क्षेत्रों में भी हो सकता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, तकनीक की रफ्तार नीति और कानून से कहीं आगे निकल चुकी है।

जलवायु संकट भी बढ़ा रहा है जोखिम

परमाणु खतरे के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन को भी डूम्सडे क्लॉक के करीब आने का बड़ा कारण बताया गया है। बढ़ते तापमान, चरम मौसम घटनाएं, खाद्य और जल संकट ये सभी समस्याएं देशों के बीच तनाव बढ़ा सकती हैं और संघर्ष की संभावना को और तेज कर सकती हैं। संस्था का मानना है कि जलवायु संकट अब केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक सुरक्षा का प्रश्न बन चुका है।

नेतृत्व की विफलता का संकेत

संस्था की अध्यक्ष एलेक्जेंड्रा बेल ने मौजूदा हालात को वैश्विक नेतृत्व की विफलता करार दिया। उन्होंने कहा, “डूम्सडे क्लॉक की मौजूदा स्थिति यह दिखाती है कि दुनिया भर के नेता साझा खतरों से निपटने में असफल रहे हैं।” बेल ने चेतावनी दी कि बढ़ती राष्ट्रवादी सोच, ताकत दिखाने की राजनीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की कमी मानवता को और भी बड़े संकट की ओर धकेल रही है।

क्या है डूम्सडे क्लॉक?

डूम्सडे क्लॉक कोई असली घड़ी नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक मापदंड है। इसे यह दिखाने के लिए बनाया गया है कि इंसान खुद अपने कर्मों से पृथ्वी के विनाश के कितने करीब पहुंच गया है। इसमें आधी रात का मतलब है—पूर्ण वैश्विक तबाही। जैसे परमाणु युद्ध, या ऐसी आपदा जिससे मानव सभ्यता बच न सके। यह घड़ी दुनिया के हालात के आधार पर आगे या पीछे की जाती है।

कैसे और कब शुरू हुई यह घड़ी?

डूम्सडे क्लॉक की शुरुआत 1947 में हुई थी। इसे ‘बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स’ ने शुरू किया, जिसका गठन परमाणु वैज्ञानिकों अल्बर्ट आइंस्टीन और जे. रॉबर्ट ओपनहाइमर के सहयोग से हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद परमाणु बम की भयावहता देखकर वैज्ञानिकों ने महसूस किया कि दुनिया को लगातार चेतावनी देने की जरूरत है। उसी सोच से डूम्सडे क्लॉक का जन्म हुआ।

कौन तय करता है समय?

हर साल वैज्ञानिकों, परमाणु विशेषज्ञों, जलवायु वैज्ञानिकों और सुरक्षा विश्लेषकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम यह तय करती है कि घड़ी को कहां रखा जाए। वे मूल्यांकन करते हैं परमाणु जोखिम, भू-राजनीतिक तनाव, तकनीकी खतरे और पर्यावरणीय हालात। अगर दुनिया सुरक्षित दिशा में जाती है, तो घड़ी को पीछे किया जाता है। हालात बिगड़ने पर इसे आधी रात के करीब लाया जाता है।

कभी था सबसे सुरक्षित दौर

डूम्सडे क्लॉक का सबसे सुरक्षित समय शीत युद्ध के बाद आया था। उस दौर में घड़ी आधी रात से 17 मिनट दूर तक पहुंच गई थी। इसे अब तक का सबसे शांत और सुरक्षित अंतरराष्ट्रीय दौर माना जाता है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में यह घड़ी लगातार आगे बढ़ती गई है, जो बढ़ते वैश्विक संकट का संकेत है।

मानवता के लिए चेतावनी

डूम्सडे क्लॉक का 85 सेकंड पर पहुंचना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि मानवता के लिए गंभीर चेतावनी है। वैज्ञानिकों का साफ संदेश है कि अगर दुनिया ने सहयोग, हथियार नियंत्रण और जलवायु कार्रवाई की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए, तो खतरा और बढ़ेगा। यह घड़ी यह याद दिलाती है कि विनाश कोई दूर की कल्पना नहीं, बल्कि एक ऐसा जोखिम है जिसे इंसान खुद पैदा कर रहा है और जिसे अभी भी टाला जा सकता है, अगर समय रहते समझदारी दिखाई जाए।


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