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ईरान-अमेरिका युद्धविराम: पर्दे के पीछे कूटनीति, चीन की भूमिका और ‘किसकी जीत-किसकी हार’ पर बहस

चीन ने ईरान को संघर्ष-विराम के लिए तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। रिपोर्ट में दो अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि बीजिंग लगातार तेहरान के संपर्क में था और उसे अमेरिका के साथ बातचीत का रास्ता अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था।

ईरान-अमेरिका युद्धविराम: पर्दे के पीछे कूटनीति, चीन की भूमिका और ‘किसकी जीत-किसकी हार’ पर बहस
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वॉशिंगटन/इस्लामाबाद/तेहरान: मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्तों के युद्धविराम ने वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। जहां एक ओर इसे संभावित बड़े युद्ध को टालने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके नतीजों को लेकर अलग-अलग विश्लेषण सामने आ रहे हैं। कुछ इसे ईरान की रणनीतिक जीत बता रहे हैं, तो कुछ इसे अस्थायी कूटनीतिक विराम मान रहे हैं। इस बीच, अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि इस युद्धविराम के पीछे कई देशों की सक्रिय कूटनीतिक भूमिका रही, जिसमें चीन, पाकिस्तान, मिस्र और तुर्किये शामिल हैं।

पर्दे के पीछे की कूटनीति: चीन की एंट्री

समाचार एजेंसी एपी (AP) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने ईरान को संघर्ष-विराम के लिए तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। रिपोर्ट में दो अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि बीजिंग लगातार तेहरान के संपर्क में था और उसे अमेरिका के साथ बातचीत का रास्ता अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था। चीन, जो ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, इस पूरे घटनाक्रम में अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए सक्रिय रहा। रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने सीधे तौर पर नहीं, बल्कि मध्यस्थ देशों के जरिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया।

मध्यस्थों की अहम भूमिका

युद्धविराम की दिशा में कई देशों ने मिलकर काम किया।

पाकिस्तान: बातचीत की प्रक्रिया में सबसे आगे रहा और दोनों पक्षों के बीच संपर्क बनाए रखने में प्रमुख भूमिका निभाई।

मिस्र: पर्दे के पीछे अमेरिका और ईरान के बीच दूरी कम करने में निर्णायक भूमिका निभाई।

तुर्किये: क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के प्रयासों में सहयोगी रहा।

रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के बीच कई दौर की बातचीत हुई, जिसने इस समझौते को अंतिम रूप देने में मदद की।

क्या यह ईरान की रणनीतिक बढ़त है?

युद्धविराम के बाद कई विश्लेषकों का मानना है कि ईरान इस पूरे संघर्ष से अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में उभरा है। ईरान के प्रस्ताव के अनुसार, हॉर्मुज स्ट्रेट के रास्ते से गुजरने वाले हर जहाज से करीब 20 लाख डॉलर शुल्क लिया जाएगा, जिसे ओमान के साथ शेयर किया जाएगा। जंग के दौरान इस समुद्री मार्ग पर शिपिंग लगभग ठप हो गई थी, जिससे वैश्विक बाजारों में चिंता बढ़ गई थी। अब इसके खुलने से सप्लाई सामान्य होने की उम्मीद है।

1. सत्ता परिवर्तन की संभावना खत्म

संघर्ष के दौरान ईरान में सत्ता परिवर्तन की चर्चाएं थीं, लेकिन युद्धविराम के बाद मौजूदा शासन के बने रहने की संभावना मजबूत मानी जा रही है।

2. होर्मुज जलडमरूमध्य पर प्रभाव

होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है। युद्ध के बाद इस क्षेत्र में ईरान का प्रभाव बढ़ने की बात कही जा रही है, हालांकि इस पर स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय सहमति नहीं है।

3. परमाणु कार्यक्रम बरकरार

रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान का संवर्धित यूरेनियम भंडार सुरक्षित है। यह मुद्दा लंबे समय से अमेरिका-ईरान विवाद का केंद्र रहा है और भविष्य की वार्ताओं में भी अहम रहेगा।

4. IRGC की भूमिका

इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) का प्रभाव ईरान की राजनीति और सुरक्षा ढांचे में महत्वपूर्ण बना हुआ है। युद्ध के दौरान इसकी भूमिका और अधिक प्रमुख हुई।

5. मिसाइल और ड्रोन क्षमता

ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमताएं इस संघर्ष के दौरान चर्चा में रहीं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में एक महत्वपूर्ण कारक बना रहेगा।

अमेरिका के लिए क्या मायने?

अमेरिका की ओर से इस युद्धविराम को एक कूटनीतिक सफलता के रूप में पेश किया जा रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका अपने सैन्य उद्देश्यों को हासिल कर चुका है और अब दीर्घकालिक शांति की दिशा में आगे बढ़ रहा है। हालांकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका को अपने कुछ शुरुआती लक्ष्यों में समझौता करना पड़ा है। उदाहरण के लिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर पूर्ण नियंत्रण नहीं, क्षेत्रीय सैन्य संतुलन में सीमित बदलाव आया है। फिर भी, अमेरिका के लिए यह समझौता एक बड़े युद्ध से बचने और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने का तरीका भी माना जा रहा है।

इजरायल और अमेरिका के बीच मतभेद?

रिपोर्ट्स में यह भी संकेत दिया गया है कि इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका और इजरायल के रणनीतिक लक्ष्य पूरी तरह एक जैसे नहीं थे। इजरायल ईरान के खिलाफ अधिक आक्रामक रुख चाहता था, जबकि अमेरिका ने कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता दी। हालांकि, दोनों देशों के आधिकारिक बयान इस तरह के मतभेदों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करते।

मध्य पूर्व में बदलता शक्ति संतुलन

इस युद्धविराम ने मध्य पूर्व की भू-राजनीति पर भी असर डाला है।

खाड़ी देशों में सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं उभरी हैं

ऊर्जा आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा पर वैश्विक ध्यान बढ़ा है

क्षेत्रीय शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों के नए समीकरण बन रहे हैं


‘सरेंडर’ या ‘रणनीतिक विराम’?

युद्धविराम को लेकर सबसे बड़ी बहस यही है कि क्या यह किसी एक पक्ष की हार या जीत है, या फिर यह एक रणनीतिक विराम है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ईरान ने अपने प्रमुख हितों को सुरक्षित रखा, अमेरिका ने बड़े युद्ध से बचते हुए कूटनीतिक रास्ता चुना। इसलिए इसे किसी एक पक्ष की स्पष्ट जीत या हार कहना जल्दबाजी हो सकती है।

जमीन पर माहौल

रिपोर्ट्स के अनुसार, तेहरान में इस समझौते के बाद राहत और उत्साह का माहौल है। लंबे समय से प्रतिबंधों और सैन्य दबाव का सामना कर रहे देश के लिए यह एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। हालांकि, जमीनी स्थिति अभी भी नाजुक है और आने वाले हफ्तों में यह तय होगा कि यह युद्धविराम स्थायी शांति की ओर बढ़ता है या नहीं।


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