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सीजफायर वार्ता से ईरान का किनारा: लेबनान में शांति से पहले नहीं होगी बातचीत

गौरतलब है कि 7 अप्रैल को अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के अस्थायी सीजफायर पर सहमति बनी थी। इसी समझौते के तहत दोनों देशों के बीच आगे की बातचीत के लिए पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद को स्थान चुना गया था।

सीजफायर वार्ता से ईरान का किनारा: लेबनान में शांति से पहले नहीं होगी बातचीत
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तेहरान। मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित सीजफायर वार्ता को बड़ा झटका लगा है। ईरान ने पाकिस्तान में होने वाली इस अहम बैठक में शामिल होने से फिलहाल इनकार कर दिया है। ईरानी मीडिया ‘फार्स न्यूज एजेंसी’ के मुताबिक, तेहरान ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक लेबनान में सीजफायर लागू नहीं होता, वह किसी भी तरह की बातचीत में हिस्सा नहीं लेगा।

ईरान ने WSJ की रिपोर्ट को बताया फेक

इससे पहले अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) ने दावा किया था कि ईरान का उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान पहुंच चुका है। रिपोर्ट में कहा गया था कि इस डेलिगेशन में ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ और विदेश मंत्री हुसैन अमीर-अब्दुल्लाहियन (या अराघची) शामिल हैं। हालांकि, फार्स न्यूज एजेंसी ने इस खबर को पूरी तरह गलत बताते हुए खारिज कर दिया। एजेंसी के मुताबिक, ईरान ने ऐसी किसी भी यात्रा या भागीदारी की पुष्टि नहीं की है।

7 अप्रैल को हुआ था अस्थायी सीजफायर समझौता

गौरतलब है कि 7 अप्रैल को अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के अस्थायी सीजफायर पर सहमति बनी थी। इसी समझौते के तहत दोनों देशों के बीच आगे की बातचीत के लिए पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद को स्थान चुना गया था। योजना के अनुसार, शनिवार को इस्लामाबाद में दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच बैठक प्रस्तावित थी। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के आज पाकिस्तान पहुंचने की खबर है, लेकिन ईरान के इनकार के बाद इस बैठक पर संशय के बादल छा गए हैं।

लेबनान को लेकर सख्त रुख

ईरान का कहना है कि क्षेत्रीय स्थिरता को नजरअंदाज कर केवल द्विपक्षीय वार्ता संभव नहीं है। उसने लेबनान में जारी संघर्ष को प्राथमिक मुद्दा बताते हुए कहा है कि जब तक वहां सीजफायर लागू नहीं होता, वह किसी भी तरह की बातचीत में शामिल नहीं होगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यह रुख ईरान की व्यापक क्षेत्रीय रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जिसमें वह अपने सहयोगी समूहों और प्रभाव क्षेत्रों को प्राथमिकता देता है।

इन बड़े मुद्दों पर होनी थी बातचीत

अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित वार्ता में कई अहम और संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा होनी थी, जिनका वैश्विक असर पड़ सकता है।

1. ईरान का परमाणु कार्यक्रम

अमेरिका का रुख स्पष्ट है कि ईरान को यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह रोकना होगा। साथ ही, उसके पास मौजूद उच्च स्तर का संवर्धित यूरेनियम देश से बाहर भेजना होगा और परमाणु सुविधाओं को बंद या सीमित करना होगा। वहीं, ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण बताता रहा है और इस पर किसी भी एकतरफा प्रतिबंध का विरोध करता है।

2. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का नियंत्रण

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ईरान इस क्षेत्र पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहता है और जहाजों से टोल वसूलने की बात करता रहा है। इसके विपरीत, अमेरिका चाहता है कि यह मार्ग पूरी तरह खुला और सुरक्षित रहे, जहां किसी भी तरह की फीस या रुकावट न हो।

3. बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम

अमेरिका ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को लेकर भी चिंतित है। वह लंबी दूरी की मिसाइलों के विकास और तैनाती पर रोक लगाने की मांग कर रहा है। ईरान इसे अपनी सुरक्षा का अहम हिस्सा मानता है और इस पर समझौते के लिए तैयार नहीं दिखता।

4. प्रतिबंधों को हटाने की मांग

ईरान की प्रमुख मांगों में अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को तुरंत हटाना शामिल है। इसके साथ ही वह अपने फ्रीज किए गए विदेशी संपत्तियों की वापसी और आर्थिक नुकसान के लिए मुआवजे की भी मांग कर रहा है। अमेरिका इन मांगों पर चरणबद्ध तरीके से विचार करने की बात करता रहा है।

वार्ता पर अनिश्चितता, आगे क्या?

ईरान के इस फैसले से इस्लामाबाद में प्रस्तावित वार्ता का भविष्य अनिश्चित हो गया है। हालांकि, अमेरिका की ओर से अभी तक इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि मौजूदा हालात में कूटनीतिक समाधान की राह और कठिन हो सकती है। ईरान का लेबनान को लेकर सख्त रुख यह संकेत देता है कि वह क्षेत्रीय मुद्दों को नजरअंदाज कर किसी भी द्विपक्षीय समझौते के पक्ष में नहीं है।


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