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अनिल अंबानी–जेफरी के बीच हुए सैकड़ों ईमेल, एपस्टीन ने खुद को बताया था व्हाइट हाउस का अंदरूनी व्यक्ति

दोनों के बीच संपर्क ऑनलाइन माध्यम से स्थापित हुआ। शुरुआती बातचीत में ही अनिल अंबानी ने एपस्टीन से स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें भारत-अमेरिका संबंधों और रक्षा सौदों को लेकर व्हाइट हाउस से संवाद स्थापित करने में मार्गदर्शन की जरूरत है।

अनिल अंबानी–जेफरी के बीच हुए सैकड़ों ईमेल, एपस्टीन ने खुद को बताया था व्हाइट हाउस का अंदरूनी व्यक्ति
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नई दिल्ली/वॉशिंगटन : Anil Ambani Jeffrey Epstein Connection: अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के शुरुआती दौर से जुड़ी एक दिलचस्प और संवेदनशील कहानी सामने आई है, जिसमें भारतीय उद्योगपति अनिल अंबानी और कुख्यात फाइनेंसर जेफरी एपस्टीन के बीच संपर्क की बात सामने आई है। सैकड़ों मैसेज की समीक्षा से यह संकेत मिलता है कि अंबानी ने ट्रंप प्रशासन की नीतियों, विशेषकर भारत-अमेरिका संबंधों और रक्षा सहयोग को लेकर जानकारी हासिल करने के लिए एपस्टीन से संपर्क साधा था।

ट्रंप प्रशासन और भारत की भूमिका जानने की कोशिश

2017 में जब डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी राष्ट्रपति पद संभाला, उस समय वैश्विक स्तर पर कई देशों और कारोबारी समूहों के लिए नई अमेरिकी नीतियों को समझना महत्वपूर्ण हो गया था। इसी संदर्भ में अनिल अंबानी यह जानने के इच्छुक थे कि ट्रंप की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में भारत की क्या भूमिका होगी और दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग किस दिशा में आगे बढ़ेगा। रिपोर्ट के मुताबिक, इसी जिज्ञासा ने उन्हें जेफरी एपस्टीन तक पहुंचाया, जिसने खुद को व्हाइट हाउस के अंदरूनी हलकों तक पहुंच रखने वाला प्रभावशाली व्यक्ति बताया।

ऑनलाइन संपर्क और ‘मार्गदर्शन’ की मांग

दोनों के बीच संपर्क ऑनलाइन माध्यम से स्थापित हुआ। शुरुआती बातचीत में ही अनिल अंबानी ने एपस्टीन से स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें भारत-अमेरिका संबंधों और रक्षा सौदों को लेकर व्हाइट हाउस से संवाद स्थापित करने में मार्गदर्शन की जरूरत है। इसके जवाब में एपस्टीन ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वह उन्हें “अंदरूनी जानकारी” उपलब्ध करा सकता है। यह दावा उसकी उस छवि को दर्शाता है, जिसमें वह खुद को वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली लोगों के बीच ‘पावर ब्रोकर’ के रूप में पेश करता था।

विदेश नीति और नियुक्तियों पर चर्चा

मैसेज के आदान-प्रदान से यह भी पता चलता है कि दोनों के बीच अमेरिकी विदेश नीति और उच्च स्तर की नियुक्तियों को लेकर चर्चा होती रही। मार्च 2017 में अनिल अंबानी ने एपस्टीन से पूछा कि क्या सीआईए के पूर्व निदेशक डेविड पेट्रायस को भारत में अमेरिकी राजदूत नियुक्त किया जाएगा। पेट्रायस उस समय इस पद के संभावित उम्मीदवारों में गिने जा रहे थे। इस पर एपस्टीन ने जवाब दिया कि उसे “बताया गया” है कि पेट्रायस को प्राथमिकता नहीं दी जा रही। बाद में नवंबर 2017 में केनेथ आई. जस्टर को भारत में अमेरिकी राजदूत नियुक्त किया गया, जिससे एपस्टीन की जानकारी आंशिक रूप से सही साबित हुई।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को लेकर ‘सटीक’ भविष्यवाणी

जुलाई 2017 में एपस्टीन ने एक और महत्वपूर्ण दावा किया। उसने अंबानी को बताया कि तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल एच.आर. मैकमास्टर ज्यादा समय तक अपने पद पर नहीं रहेंगे और उनकी जगह जॉन बोल्टन को नियुक्त किया जाएगा। उस समय यह एक विवादास्पद और अनिश्चित संभावना थी, क्योंकि ट्रंप प्रशासन ने सार्वजनिक रूप से मैकमास्टर का समर्थन किया था, भले ही कुछ रूढ़िवादी नेताओं ने उन्हें हटाने की मांग की थी। हालांकि, लगभग आठ महीने बाद एपस्टीन की यह भविष्यवाणी सच साबित हुई और जॉन बोल्टन ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का पद संभाला।

एपस्टीन की ‘पावर ब्रोकर’ छवि पर सवाल

इन खुलासों ने एक बार फिर जेफरी एपस्टीन की उस भूमिका को उजागर किया है, जिसमें वह खुद को वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली व्यक्तियों और सत्ता केंद्रों के बीच एक कड़ी के रूप में पेश करता था। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि एपस्टीन द्वारा दी गई जानकारी वास्तव में आधिकारिक स्रोतों से प्राप्त थी या उसने अपने संपर्कों और अटकलों के आधार पर ये दावे किए थे। फिर भी, कुछ मामलों में उसकी जानकारी का सही साबित होना यह दर्शाता है कि उसे किसी स्तर तक राजनीतिक हलकों की गतिविधियों की समझ या पहुंच जरूर थी।

बैक-चैनल कूटनीति की झलक

यह पूरा घटनाक्रम अंतरराष्ट्रीय संबंधों में ‘बैक-चैनल डिप्लोमेसी’ यानी अनौपचारिक संपर्कों की भूमिका को भी उजागर करता है। कई बार कारोबारी और प्रभावशाली व्यक्ति आधिकारिक कूटनीतिक माध्यमों के अलावा निजी संपर्कों के जरिए भी नीतिगत संकेत और संभावित फैसलों की जानकारी जुटाने की कोशिश करते हैं। अनिल अंबानी और एपस्टीन के बीच बातचीत इसी प्रवृत्ति का एक उदाहरण मानी जा सकती है।

प्रामाणिकता और प्रभाव पर सवाल

हालांकि इन संदेशों के सामने आने से कई सवाल खड़े होते हैं, लेकिन यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि किसी भी निजी बातचीत से प्राप्त जानकारी की प्रामाणिकता और उसके वास्तविक प्रभाव का आकलन करना आसान नहीं होता। यह स्पष्ट नहीं है कि इन संवादों का किसी नीति निर्माण या आधिकारिक निर्णय पर कोई प्रत्यक्ष असर पड़ा या नहीं।

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