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बस ड्राइवर से राष्ट्रपति तक: जानें निकोलस मादुरो के 40 साल लंबे राजनीतिक सफर के बारे में
निकोलस मादुरो का जन्म 23 नवंबर 1962 को काराकस में हुआ। वह एक श्रमिक संगठन के नेता के बेटे हैं, जिससे उन्हें बचपन से ही मजदूर आंदोलनों और वामपंथी राजनीति का माहौल मिला।

काराकस। वेनेजुएला के मौजूदा राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का राजनीतिक सफर साधारण पृष्ठभूमि से सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने की कहानी है। एक समय बस ड्राइवर रहे मादुरो आज लैटिन अमेरिका के सबसे विवादास्पद और शक्तिशाली नेताओं में गिने जाते हैं। उनका यह सफर न केवल व्यक्तिगत संघर्षों का है, बल्कि वेनेजुएला की राजनीति, समाजवाद और आर्थिक संकट की जटिल कहानी भी बयान करता है।
शुरुआती जीवन और वैचारिक आधार
निकोलस मादुरो का जन्म 23 नवंबर 1962 को काराकस में हुआ। वह एक श्रमिक संगठन के नेता के बेटे हैं, जिससे उन्हें बचपन से ही मजदूर आंदोलनों और वामपंथी राजनीति का माहौल मिला। औपचारिक शिक्षा के नाम पर उन्होंने केवल हाई स्कूल तक पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी करने के बाद मादुरो ने बस ड्राइवर के रूप में काम किया और वहीं से उनका जुड़ाव ट्रेड यूनियनों से गहराता गया। राजनीति में औपचारिक प्रवेश से पहले मादुरो ने क्यूबा की यात्रा की, जहां उन्होंने समाजवादी विचारधारा और क्रांतिकारी राजनीति का गहन अध्ययन किया। क्यूबा की यह यात्रा उनके वैचारिक निर्माण में अहम मानी जाती है।
ह्यूगो शावेज से मुलाकात और राजनीतिक उभार
मादुरो के राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ वर्ष 1992 में आया, जब उन्होंने तत्कालीन सैन्य अधिकारी ह्यूगो शावेज के नेतृत्व में हुए असफल तख्तापलट में हिस्सा लिया। हालांकि यह प्रयास विफल रहा, लेकिन इसी दौरान मादुरो शावेज के करीबी सहयोगी बन गए। 1998 में जब ह्यूगो शावेज ने राष्ट्रपति चुनाव लड़ा, तो मादुरो उनके भरोसेमंद सिपाही के रूप में उभरे। शावेज की जीत के बाद मादुरो को लगातार अहम जिम्मेदारियां सौंपी गईं। वह पहले नेशनल असेंबली के अध्यक्ष बने और बाद में उन्हें विदेश मंत्री नियुक्त किया गया।
विदेश मंत्री के रूप में भूमिका
विदेश मंत्री रहते हुए मादुरो ने वेनेजुएला के तेल कूटनीति को वैश्विक स्तर पर विस्तार दिया। उन्होंने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों के साथ ऊर्जा समझौते किए और अमेरिका विरोधी धुरी को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। इस दौर में मादुरो शावेज सरकार के सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल हो गए।
राष्ट्रपति पद तक पहुंच
मार्च 2013 में ह्यूगो शावेज के निधन से पहले उन्होंने मादुरो को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया। शावेज की मौत के बाद हुए चुनाव में मादुरो ने बेहद कम अंतर से जीत दर्ज की और वेनेजुएला के राष्ट्रपति बने। हालांकि राष्ट्रपति बनने के बाद मादुरो के सामने चुनौतियों का अंबार था। तेल की कीमतों में गिरावट, आर्थिक कुप्रबंधन और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के चलते देश गहरे आर्थिक संकट में फंसता चला गया।
आर्थिक संकट और विरोध प्रदर्शन
मादुरो के शासनकाल में वेनेजुएला ने अभूतपूर्व महंगाई, खाद्य संकट और दवाइयों की भारी कमी का सामना किया। लाखों लोग देश छोड़कर पड़ोसी देशों में पलायन करने को मजबूर हुए। इसी दौरान 2014 और 2017 में सरकार विरोधी बड़े आंदोलन हुए, जिन्हें मादुरो सरकार ने सख्ती से कुचल दिया। इन कार्रवाइयों में सुरक्षा बलों पर मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप लगे।
चुनावी विवाद और तीसरा कार्यकाल
जनवरी 2025 में हुए राष्ट्रीय चुनाव में मादुरो तीसरी बार राष्ट्रपति चुने गए। हालांकि विपक्ष और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने इन चुनावों को धांधली से भरा बताया। चुनाव के बाद हजारों विपक्षी कार्यकर्ताओं को जेल में डाले जाने की खबरें सामने आईं। विपक्षी नेता और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मारिया कोरीना मचाडो ने मादुरो सरकार की दमनात्मक नीतियों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उजागर किया।
विवादों में घिरा शासन
आज निकोलस मादुरो का शासन चुनावी अनियमितताओं, मानवाधिकार हनन और आर्थिक विफलताओं के आरोपों से घिरा हुआ है। समर्थक उन्हें शावेज की समाजवादी विरासत का रक्षक मानते हैं, जबकि आलोचक उन्हें वेनेजुएला की बदहाली का जिम्मेदार ठहराते हैं। मादुरो का राजनीतिक सफर सत्ता, संघर्ष और विवादों का ऐसा अध्याय है, जो आने वाले वर्षों तक वेनेजुएला की राजनीति को प्रभावित करता रहेगा।
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