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Davos 2026: ग्रीनलैंड पर ट्रंप के इरादों के खिलाफ यूरोप का खुला मोर्चा, नाटो युद्धाभ्यास की तैयारी; जानें किस नेता ने क्या कहा
नाटो सदस्य देश डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को अमेरिका में मिलाने की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मंशा ने ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में गंभीर तनाव पैदा कर दिया है। इस मुद्दे पर अब यूरोप के शीर्ष नेता खुलकर सामने आ गए हैं।

दावोस/कोपेनहेगन/पेरिस। नाटो सदस्य देश डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को अमेरिका में मिलाने की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मंशा ने ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में गंभीर तनाव पैदा कर दिया है। इस मुद्दे पर अब यूरोप के शीर्ष नेता खुलकर सामने आ गए हैं। फ्रांस, कनाडा, बेल्जियम, पोलैंड और यूरोपीय संघ के नेतृत्व ने ट्रंप की नीति को न केवल खारिज किया है, बल्कि इसे आधुनिक दौर की साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक सोच करार दिया है। यूरोपीय नेताओं ने संकेत दिए हैं कि नाटो के सैनिक ग्रीनलैंड में संयुक्त सैन्य अभ्यास कर सकते हैं, ताकि डेनमार्क और ग्रीनलैंड की संप्रभुता को लेकर एक स्पष्ट राजनीतिक और सैन्य संदेश दिया जा सके।
नाटो युद्धाभ्यास का संकेत, फ्रांस तैयार
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों के कार्यालय ने पुष्टि की है कि यदि नाटो ग्रीनलैंड में सैन्य अभ्यास का निर्णय लेता है, तो फ्रांस उसमें योगदान देने को तैयार है। मैक्रों ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को सीधे निशाने पर लेते हुए कहा, “कोई भी देश धमकी देकर या दबाव बनाकर ग्रीनलैंड को नहीं ले सकता।” इस बयान को अमेरिका के लिए अब तक की सबसे कड़ी यूरोपीय प्रतिक्रिया माना जा रहा है।
दावोस में यूरोप का सख्त संदेश
स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच (WEF) की बैठक के दौरान ग्रीनलैंड मुद्दा यूरोपीय नेताओं की चर्चाओं के केंद्र में रहा। यहां एक स्वर में ट्रंप की नीति पर चिंता और नाराजगी जताई गई। मैक्रों ने चेतावनी दी कि दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां नया औपनिवेशिक दृष्टिकोण दशकों से चले आ रहे अंतरराष्ट्रीय सहयोग को कमजोर कर सकता है। उन्होंने कहा, “यह बदलाव नियमविहीन दुनिया की ओर इशारा करता है, जहां अंतरराष्ट्रीय कानून को पैरों तले रौंदा जाता है और जहां सबसे ताकतवर का कानून चलता है। साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं एक बार फिर लौट रही हैं।”
“यह साम्राज्यवाद की वापसी है”: मैक्रों
मैक्रों ने आधुनिक औपनिवेशिक दुस्साहस के खिलाफ बड़ी शक्तियों को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि इस सोच को अभी नहीं रोका गया, तो वैश्विक व्यवस्था अस्थिर हो जाएगी। उनके मुताबिक, “आज ग्रीनलैंड है, कल कोई और क्षेत्र हो सकता है। यह केवल भूगोल का सवाल नहीं, बल्कि नियमों, मूल्यों और संप्रभुता का सवाल है।”
कनाडा का समर्थन
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने भी ग्रीनलैंड मुद्दे पर दो टूक रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में बड़ी और मध्यम शक्तियों के बीच टकराव बढ़ रहा है। कार्नी ने कहा, “बड़ी शक्तियां फिलहाल अकेले चलने का जोखिम उठा सकती हैं। उनके पास बड़े बाजार, सैन्य ताकत और शर्तें तय करने की क्षमता है। मध्यम शक्तियों के पास यह सुविधा नहीं है।”
“एकजुट नहीं हुए तो खत्म कर दिए जाएंगे”
कनाडाई प्रधानमंत्री ने मध्यम शक्तियों को एकजुट होने का आह्वान करते हुए चेतावनी दी। कहा कि बड़ी शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता की दुनिया में हमारे पास दो ही रास्ते हैं या तो कृपापात्र बनने के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा करें, या फिर एकजुट होकर तीसरा रास्ता बनाएं, जिसका असर हो।” उन्होंने स्पष्ट कहा, “हम ग्रीनलैंड और डेनमार्क के साथ मजबूती से खड़े हैं और ग्रीनलैंड के भविष्य का फैसला करने के उसके अधिकार का पूर्ण समर्थन करते हैं।”
बेल्जियम का तीखा बयान: गरिमा का सवाल
बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर ने ग्रीनलैंड मुद्दे को यूरोप की गरिमा और आत्मसम्मान से जोड़ते हुए बेहद सख्त शब्दों में प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “ग्रीनलैंड के मामले में यूरोप में कई मर्यादाएं तोड़ी जा चुकी हैं।” वेवर ने चेतावनी दी, “एक खुशहाल जागीरदार होना एक बात है और दुखी गुलाम होना दूसरी। अगर आप अभी पीछे हटते हैं, तो आप अपनी गरिमा खो देंगे।”
“या तो साथ होंगे या बिखर जाएंगे”
बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने यूरोप को एकजुट रहने की अपील करते हुए कहा, “हम या तो साथ खड़े होंगे या बंटे हुए। अगर हम बंटे रहे, तो यह 80 साल के अटलांटिकवाद के युग का अंत होगा।” उनका यह बयान अमेरिका-यूरोप संबंधों में संभावित ऐतिहासिक बदलाव की ओर इशारा करता है।
यूरोपीय आयोग की चेतावनी
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वान डेर लेयेन ने कहा कि पश्चिमी देशों के बीच बढ़ती कूटनीतिक गिरावट का फायदा केवल उनके विरोधियों को मिलेगा। उन्होंने ट्रंप की टैरिफ नीति पर भी सवाल उठाते हुए कहा, “प्रस्तावित अतिरिक्त टैरिफ एक गलती है, खासकर लंबे समय से सहयोगी देशों के बीच।”
“डील का सम्मान होना चाहिए”
उर्सुला ने याद दिलाया कि यूरोपीय संघ और अमेरिका जुलाई में एक व्यापार समझौते पर सहमत हुए थे। उन्होंने कहा, “बिजनेस की तरह राजनीति में भी एक डील, डील होती है। उसे सम्मान मिलना चाहिए।”
“अगर बदलाव स्थायी है, तो यूरोप को भी बदलना होगा”
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष ने साफ संकेत दिए कि यदि अमेरिका का यह रुख स्थायी होता है, तो यूरोप को भी अपनी रणनीति में बुनियादी बदलाव करने होंगे। उन्होंने कहा, “यूरोप अंतरराष्ट्रीय दबाव का जवाब देने के लिए बाध्य है। यह समय इस बदलाव को स्वीकार करने और एक नया, अधिक स्वतंत्र यूरोप बनाने का है।”
पोलैंड की चेतावनी: तुष्टीकरण से बचें
पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर यूरोपीय नेताओं से तुष्टीकरण की नीति से बचने का आग्रह किया। उन्होंने लिखा, “तुष्टीकरण हमेशा कमजोरी की निशानी होता है। यूरोप कमजोर होने का जोखिम नहीं उठा सकता—न अपने दुश्मनों के खिलाफ और न ही अपने सहयोगियों के खिलाफ।”
“तुष्टीकरण का मतलब अपमान”
टस्क ने कहा, “तुष्टीकरण का अर्थ सिर्फ अपमान है। यूरोपीय दृढ़ता और आत्मविश्वास अब समय की मांग बन चुके हैं।”
नाटो प्रमुख की चुप्पी, पर्दे के पीछे प्रयास
नाटो महासचिव मार्क रूट ने इस पूरे विवाद पर सार्वजनिक टिप्पणी से फिलहाल परहेज किया है। उन्होंने बुधवार को कहा कि वह पर्दे के पीछे इस मुद्दे पर काम कर रहे हैं, लेकिन मौजूदा हालात में सार्वजनिक बयान देना उचित नहीं है। उनकी यह चुप्पी नाटो के भीतर चल रहे गहन मंथन की ओर इशारा करती है।
जी-7 बैठक टली, फ्रांस के पास अध्यक्षता
इस बीच फ्रांस ने शेड्यूल संबंधी दिक्कतों का हवाला देते हुए जी-7 देशों के वित्त मंत्रियों की ऑनलाइन बैठक को अगले सप्ताह तक के लिए टाल दिया है। इस वर्ष जी-7 की अध्यक्षता फ्रांस के पास है और माना जा रहा है कि ग्रीनलैंड और अमेरिका-यूरोप तनाव इस बैठक के एजेंडे में प्रमुखता से शामिल होंगे।
ग्रीनलैंड बना शक्ति संतुलन की परीक्षा
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की नीति अब केवल अमेरिका और डेनमार्क के बीच का विवाद नहीं रह गई है। यह मुद्दा वैश्विक शक्ति संतुलन, अंतरराष्ट्रीय कानून और पश्चिमी एकता की बड़ी परीक्षा बन चुका है। यूरोपीय नेताओं के तीखे बयान और नाटो युद्धाभ्यास के संकेत यह साफ करते हैं कि यूरोप अब दबाव की राजनीति को स्वीकार करने के मूड में नहीं है। आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि यह टकराव कूटनीति के जरिए सुलझता है या ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों में स्थायी दरार बन जाता है।
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