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होर्मुज बंद रहने से भी भारत पर नहीं पड़ेगा असर, तेल सौदागरों की आपसी फूट का ऐसे मिल सकता है फायदा

ईरान से जुड़े तनाव के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से भारत की तेल आपूर्ति पर असर पड़ा है। अनुमान के मुताबिक, भारत को करीब 4,80,000 बैरल प्रतिदिन की कमी का सामना करना पड़ रहा है। खासकर इराक से आने वाली सप्लाई लगभग पूरी तरह ठप हो गई है।

होर्मुज बंद रहने से भी भारत पर नहीं पड़ेगा असर, तेल सौदागरों की आपसी फूट का ऐसे मिल सकता है फायदा
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आबूधाबी। होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव और पेट्रोलियम निर्यातक देशों के बीच बढ़ती खींचतान ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। हालांकि, इस अनिश्चितता के बीच भारत के लिए कुछ सकारात्मक संकेत भी उभर रहे हैं। खासतौर पर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के OPEC और OPEC+ से अलग होने के फैसले ने प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की संभावना पैदा की है, जिसका फायदा भारत जैसे बड़े आयातक देश को मिल सकता है।

होर्मुज बंद होने का असर

ईरान से जुड़े तनाव के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से भारत की तेल आपूर्ति पर असर पड़ा है। अनुमान के मुताबिक, भारत को करीब 4,80,000 बैरल प्रतिदिन की कमी का सामना करना पड़ रहा है। खासकर इराक से आने वाली सप्लाई लगभग पूरी तरह ठप हो गई है, जो सामान्य परिस्थितियों में भारत के लिए एक बड़ा स्रोत था। यह स्थिति ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाती है, लेकिन साथ ही वैकल्पिक स्रोतों की तलाश को भी तेज कर रही है।

सऊदी अरब और UAE से बढ़ी आपूर्ति

संकट के बावजूद भारत ने अपनी सप्लाई चेन को काफी हद तक संतुलित बनाए रखा है। आंकड़ों के अनुसार, 1 अप्रैल से 26 अप्रैल 2026 के बीच सऊदी अरब ने भारत को औसतन 6.97 लाख बैरल प्रतिदिन तेल की आपूर्ति की, जो पिछले साल के औसत 6.68 लाख बैरल से अधिक है। सऊदी अरब ने लाल सागर के रास्ते तेल भेजकर होर्मुज पर निर्भरता कम की है। इसी तरह UAE ने भी अपनी सप्लाई में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है। इस अवधि में उसने भारत को लगभग 6.19 लाख बैरल प्रतिदिन तेल उपलब्ध कराया, जो 2025-26 के औसत 4.30 लाख बैरल से काफी ज्यादा है। UAE फुजेराह पोर्ट के जरिए तेल सप्लाई कर रहा है, जो होर्मुज के विकल्प के रूप में उभरा है।

कुल सप्लाई पर सीमित असर

अगर कुल आपूर्ति की बात करें, तो अप्रैल महीने में भारत को औसतन 44 लाख बैरल प्रतिदिन तेल मिला। यह 2025-26 के औसत 48 लाख बैरल से थोड़ा कम जरूर है, लेकिन गिरावट उतनी बड़ी नहीं है जितनी आशंका जताई जा रही थी। इससे साफ है कि भारत ने अपने आयात स्रोतों में विविधता लाकर संकट के असर को काफी हद तक नियंत्रित किया है।

OPEC में दरार से नई संभावनाएं

OPEC में उभरती दरार भारत के लिए नई संभावनाएं लेकर आ सकती है। UAE के अलग होने के बाद वह स्वतंत्र रूप से तेल उत्पादन और निर्यात बढ़ा सकता है। भारत और UAE के बीच मजबूत रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं, जिसका फायदा ऊर्जा क्षेत्र में भी मिल सकता है। हाल के महीनों में दोनों देशों के बीच सहयोग और बढ़ा है, जिससे भविष्य में स्थिर आपूर्ति की उम्मीद की जा रही है।

नए स्रोतों की ओर बढ़ता भारत

भारत ने पारंपरिक सप्लायर्स के अलावा नए स्रोतों से भी तेल आयात बढ़ाया है। ओमान से आयात में बड़ी छलांग देखने को मिली है—जहां पहले 18,000 बैरल प्रतिदिन तेल खरीदा जाता था, अब यह आंकड़ा 1 लाख बैरल से ऊपर पहुंच गया है। इसी तरह वेनेजुएला से आयात भी तेजी से बढ़ा है। पहले जहां यह करीब 10,000 बैरल प्रतिदिन था, अब बढ़कर 2.58 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया है। यह रणनीति भारत को वैश्विक अस्थिरता से बचाने में मदद कर रही है।


होर्मुज पर अनिश्चितता बरकरार

अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य फिलहाल अनिश्चितकाल तक बंद रह सकता है। अमेरिकी प्रशासन ने इस क्षेत्र में अपनी रणनीति को और सख्त करने के संकेत दिए हैं। खबरों के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पेंटागन को निर्देश दिया है कि वह होर्मुज के बाहरी हिस्सों को और मजबूत तरीके से नियंत्रित करे, ताकि ईरान पर दबाव बनाया जा सके।


वैश्विक तेल बाजार पर प्रभाव

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है। इसके बंद रहने से वैश्विक बाजार में अस्थिरता बनी हुई है। ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत में गतिरोध भी इस स्थिति को और जटिल बना रहा है। ऐसे में तेल की कीमतों और आपूर्ति दोनों पर दबाव बना रह सकता है।


भारत की रणनीति और आगे का रास्ता

मौजूदा परिस्थितियों में भारत की रणनीति स्पष्ट है—आयात स्रोतों में विविधता और मजबूत कूटनीतिक संबंध। सऊदी अरब, UAE, ओमान और वेनेजुएला जैसे देशों के साथ बढ़ते सहयोग से भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को संतुलित कर रहा है। OPEC में दरार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ने से भारत को बेहतर कीमत और स्थिर सप्लाई मिलने की संभावना है। कुल मिलाकर, होर्मुज संकट जहां दुनिया के लिए चुनौती बना हुआ है, वहीं भारत के लिए यह एक अवसर भी बन सकता है—अगर वह अपनी रणनीति को इसी तरह संतुलित और लचीला बनाए रखता है।


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