Begin typing your search above and press return to search.
ईरान पर हमले को लेकर ब्रिटेन ने अमेरिका को एयरबेस देने से किया इनकार, डिएगो गार्सिया और RAF फेयरफोर्ड के इस्तेमाल पर मतभेद
अमेरिका संभावित सैन्य विकल्पों पर विचार करते हुए दो प्रमुख ठिकानों डिएगो गार्सिया (हिंद महासागर) और RAF फेयरफोर्ड (ब्रिटेन) का इस्तेमाल करना चाहता है। डिएगो गार्सिया चागोस द्वीप समूह का सबसे बड़ा द्वीप है और 1970 के दशक से यह ब्रिटेन और अमेरिका का साझा सैन्य अड्डा है।

लंदन/वॉशिंगटन। ईरान को लेकर बढ़ते तनाव के बीच ब्रिटेन ने अमेरिका को अपने सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। अमेरिकी प्रशासन कथित तौर पर ईरान पर संभावित सैन्य कार्रवाई की तैयारी के तहत हिंद महासागर स्थित डिएगो गार्सिया और ब्रिटेन के RAF फेयरफोर्ड एयरबेस का उपयोग करना चाहता था, लेकिन लंदन ने इसकी मंजूरी नहीं दी।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ब्रिटेन के इस फैसले से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नाराज बताए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के उस समझौते से समर्थन वापस ले लिया है, जिसके तहत चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस को सौंपने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही थी। हालांकि इस पर आधिकारिक स्तर पर कोई संयुक्त बयान सामने नहीं आया है।
किन ठिकानों को लेकर है विवाद?
रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका संभावित सैन्य विकल्पों पर विचार करते हुए दो प्रमुख ठिकानों डिएगो गार्सिया (हिंद महासागर) और RAF फेयरफोर्ड (ब्रिटेन) का इस्तेमाल करना चाहता है। डिएगो गार्सिया चागोस द्वीप समूह का सबसे बड़ा द्वीप है और 1970 के दशक से यह ब्रिटेन और अमेरिका का साझा सैन्य अड्डा है। यह ठिकाना रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि यहां से एशिया, अफ्रीका और मध्य-पूर्व तक लंबी दूरी के सैन्य अभियान संचालित किए जा सकते हैं। ब्रिटेन के पुराने रक्षा समझौतों के अनुसार, उसके किसी भी सैन्य ठिकाने का इस्तेमाल करने के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री की अनुमति आवश्यक होती है। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत भी यदि कोई देश यह जानते हुए कि सैन्य कार्रवाई अवैध या विवादित है, उसमें सहयोग करता है, तो उसे भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
ट्रंप की प्रतिक्रिया: “चागोस छोड़ना बड़ी गलती”
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चागोस आइलैंड्स को लेकर ब्रिटेन की नीति की आलोचना की है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म “ट्रुथ सोशल” पर लिखा कि किसी देश को 100 साल की लीज पर रणनीतिक ठिकाना सौंपना सही निर्णय नहीं हो सकता। ट्रंप ने कहा कि डिएगो गार्सिया जैसा महत्वपूर्ण सैन्य अड्डा छोड़ना “बहुत बड़ी गलती” होगी। उनका तर्क है कि यदि ईरान के साथ कोई समझौता नहीं होता, तो अमेरिका को हिंद महासागर में मौजूद इन एयरफील्ड्स का इस्तेमाल करना पड़ सकता है, ऐसे में इनका नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है। हालांकि, व्हाइट हाउस की ओर से इस मुद्दे पर कोई औपचारिक नीति परिवर्तन की पुष्टि नहीं की गई है।
ब्रिटेन का रुख
ब्रिटिश सरकार का कहना है कि मॉरीशस के साथ चागोस द्वीप समूह को लेकर किया गया समझौता सुरक्षा और कानूनी स्थिरता के लिहाज से आवश्यक है। लंदन का तर्क है कि यह कदम लंबे और महंगे अंतरराष्ट्रीय कानूनी विवादों से बचने के लिए उठाया जा रहा है। अनुमान है कि पूरे समझौते की लागत करीब 35 बिलियन पाउंड तक पहुंच सकती है। ब्रिटेन का मानना है कि यदि संप्रभुता विवाद का समाधान नहीं किया गया, तो डिएगो गार्सिया में संयुक्त सैन्य बेस के संचालन पर भविष्य में कानूनी संकट खड़ा हो सकता है।
डिएगो गार्सिया क्यों है अहम?
डिएगो गार्सिया हिंद महासागर के बीचों-बीच स्थित एक विशाल सैन्य सुविधा है। यह ईरान की राजधानी तेहरान से लगभग 3,800 किलोमीटर दूर है। इस दूरी के कारण अमेरिका यहां से लंबी दूरी के अभियान बिना सीधे खतरे के दायरे में आए संचालित कर सकता है। इस बेस पर लंबा रनवे मौजूद है, जहां भारी बमवर्षक विमान जैसे B-2 और B-52 उतर सकते हैं। साथ ही ईंधन भरने वाले टैंकर विमान (जैसे KC-135) और निगरानी विमान भी यहां तैनात किए जा सकते हैं। सिर्फ हवाई सुविधा ही नहीं, यहां गहरे पानी का बंदरगाह भी है, जहां बड़े युद्धपोत और सप्लाई जहाज रुक सकते हैं। यही कारण है कि मध्य-पूर्व, अफगानिस्तान और अफ्रीका में अमेरिकी अभियानों के दौरान इस बेस का व्यापक उपयोग किया गया है।
चागोस द्वीप समूह का इतिहास
चागोस द्वीप समूह का इतिहास औपनिवेशिक दौर से जुड़ा है। 1814 में नेपोलियन की हार के बाद ब्रिटेन ने इन द्वीपों पर नियंत्रण स्थापित किया। 1965 में मॉरीशस को स्वतंत्रता देने से पहले ब्रिटेन ने चागोस को अलग कर “ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र” (BIOT) घोषित किया। 1968 में मॉरीशस को स्वतंत्रता मिली, लेकिन यह वादा किया गया था कि जब इन द्वीपों की रक्षा आवश्यकता समाप्त होगी, तब उन्हें मॉरीशस को लौटा दिया जाएगा। मॉरीशस 1980 के दशक से इन द्वीपों पर अपना दावा करता रहा है। 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने अपने परामर्शात्मक फैसले में कहा कि ब्रिटेन को चागोस द्वीप समूह पर अपना प्रशासन जल्द समाप्त करना चाहिए। इसके बाद 2022 में तत्कालीन कंजरवेटिव सरकार ने मॉरीशस के साथ संप्रभुता को लेकर वार्ता शुरू की। जुलाई 2024 के चुनाव से पहले इस मुद्दे पर कई दौर की बातचीत हो चुकी थी।
क्या यह ‘विशेष संबंध’ में दरार है?
ब्रिटेन और अमेरिका के संबंधों को लंबे समय से “स्पेशल रिलेशनशिप” कहा जाता है। द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर NATO गठबंधन, इराक-अफगानिस्तान अभियानों और ‘फाइव आइज’ खुफिया नेटवर्क तक दोनों देश अधिकांश वैश्विक मुद्दों पर साथ रहे हैं। लेकिन हाल के वर्षों में कुछ मुद्दों पर मतभेद सामने आए हैं, चाहे वह व्यापार नीति हो, चीन को लेकर रुख हो या अब ईरान और चागोस का प्रश्न। विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद दोनों देशों के बीच स्थायी दरार का संकेत नहीं है, लेकिन रणनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव जरूर दिखाता है। ब्रिटेन जहां अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीतिक संतुलन पर जोर दे रहा है, वहीं अमेरिका अपने सैन्य विकल्प खुले रखना चाहता है।
मतभेद गहराते दिखे
फिलहाल दोनों देशों की सरकारों ने आधिकारिक रूप से किसी बड़े टकराव की पुष्टि नहीं की है। लेकिन यह स्पष्ट है कि ईरान को लेकर संभावित सैन्य विकल्पों और चागोस द्वीप समूह के भविष्य पर मतभेद गहराते दिख रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या अमेरिका और ब्रिटेन इस मुद्दे पर कोई मध्य मार्ग निकालते हैं या यह विवाद व्यापक रणनीतिक असहमति का रूप ले लेता है। हिंद महासागर के बीच स्थित एक छोटा सा द्वीप डिएगो गार्सिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति के केंद्र में आ गया है।
Next Story


