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बोरिस जॉनसन का बड़ा दावा: नेहरू ने कहा था- भारत हमेशा रूस के साथ रहेगा

बोरिस जॉनसन ने कहा कि अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने एक बार महारानी एलिजाबेथ द्वितीय से इस बात पर चर्चा की थी कि भारत को रूस के खिलाफ मजबूती से खड़े होने के लिए मनाना इतना कठिन क्यों है। जॉनसन के मुताबिक, यह बातचीत महारानी के निधन से कुछ समय पहले हुई थी।

बोरिस जॉनसन का बड़ा दावा: नेहरू ने कहा था- भारत हमेशा रूस के साथ रहेगा
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नई दिल्ली। भारत और रूस के दशकों पुराने रिश्तों को लेकर ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने एक अहम दावा किया है। उन्होंने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और ब्रिटेन की दिवंगत महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के बीच हुई एक पुरानी बातचीत का जिक्र करते हुए कहा कि भारत के रूस के साथ संबंधों की जड़ें काफी गहरी हैं। जॉनसन के मुताबिक, नेहरू ने 1952 में महारानी से बातचीत के दौरान कहा था कि भारत मूल रूप से हमेशा रूस के साथ रहेगा। जॉनसन ने यह बात 'द इकोनॉमिक टाइम्स वर्ल्ड लीडर्स फोरम' में बोलते हुए कही। उनके बयान में भारत की विदेश नीति और रूस के साथ उसके ऐतिहासिक संबंधों को समझने की कोशिश नजर आई।

महारानी से हुई बातचीत का जॉनसन ने किया जिक्र

बोरिस जॉनसन ने कहा कि अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने एक बार महारानी एलिजाबेथ द्वितीय से इस बात पर चर्चा की थी कि भारत को रूस के खिलाफ मजबूती से खड़े होने के लिए मनाना इतना कठिन क्यों है। जॉनसन के मुताबिक, यह बातचीत महारानी के निधन से कुछ समय पहले हुई थी। उन्होंने बताया कि महारानी ने तत्काल उन्हें 1952 की वह बातचीत याद दिलाई, जब उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से बात की थी। जॉनसन के अनुसार, महारानी ने कहा था कि नेहरू ने उस समय उनसे कहा था कि भारत मूल रूप से हमेशा रूस के पक्ष में रहेगा।

'कुछ बातें कभी नहीं बदलतीं'

जॉनसन ने इस प्रसंग को याद करते हुए कहा कि कुछ चीजें समय के साथ भी नहीं बदलतीं। उन्होंने कहा कि महारानी की बात ने उन्हें काफी प्रभावित किया और यह समझने की जरूरत है कि भारत और रूस के रिश्तों के पीछे एक लंबा ऐतिहासिक संदर्भ मौजूद है। हालांकि, जॉनसन ने यह भी संकेत दिया कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए भारत के रुख को केवल पुराने संबंधों के आधार पर नहीं समझा जा सकता। भारत लंबे समय से अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर देता रहा है।

भारत-रूस रिश्तों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत और रूस के संबंधों को शीत युद्ध के दौर से ही महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष और रणनीतिक सहयोग जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच लंबे समय से साझेदारी रही है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर दबाव बढ़ाया, लेकिन भारत ने रूस के साथ अपने संबंधों को बनाए रखा। इसी संदर्भ में बोरिस जॉनसन का बयान महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ब्रिटेन और उसके पश्चिमी सहयोगी रूस के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते रहे हैं, जबकि भारत ने रूस के साथ संवाद और कूटनीतिक संबंध जारी रखने पर जोर दिया है।

भारत-अमेरिका-ब्रिटेन सहयोग की वकालत

फोरम में जॉनसन ने केवल भारत-रूस संबंधों पर ही बात नहीं की। उन्होंने भारत, अमेरिका और ब्रिटेन के बीच बेहतर रणनीतिक सहयोग की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कोरोना महामारी के दौरान ब्रिटेन को वैक्सीन की आपूर्ति में भारत की भूमिका की सराहना की। जॉनसन ने भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापारिक संबंधों का भी उल्लेख किया और कहा कि ब्रेक्जिट के बाद दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार को आगे बढ़ाने के नए अवसर पैदा हुए हैं। उन्होंने भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में रेखांकित किया।

ईरान युद्ध और होर्मुज संकट पर भी बोले

बोरिस जॉनसन ने हाल में ईरान युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज संकट पर भी अपनी राय रखी थी। उन्होंने कहा था कि भारत, अमेरिका और ब्रिटेन को मिलकर ऐसा रास्ता तलाशना चाहिए जिससे ईरान के साथ युद्ध समाप्त हो और इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से जहाजों की आवाजाही सामान्य हो सके। जॉनसन ने अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को भी गलत फैसला बताया था। उनके मुताबिक, क्षेत्र में संघर्ष को लंबा खींचने के बजाय कूटनीतिक समाधान की दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए।

रूस नीति पर भारत के रुख की चर्चा

बोरिस जॉनसन का ताजा बयान ऐसे समय आया है जब रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर पश्चिमी देशों और भारत के रुख में अंतर लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। भारत रूस के साथ अपने पुराने रणनीतिक संबंधों को बनाए रखते हुए सभी पक्षों के बीच बातचीत और कूटनीति के जरिए समाधान की वकालत करता रहा है। ऐसे में नेहरू और महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के कथित संवाद का जिक्र कर जॉनसन ने भारत-रूस संबंधों की ऐतिहासिक निरंतरता की ओर ध्यान खींचा है। उनका बयान इस बात को रेखांकित करता है कि वैश्विक राजनीति में बदलते समीकरणों के बावजूद भारत की विदेश नीति को उसके लंबे रणनीतिक और ऐतिहासिक संदर्भ में समझना जरूरी है।


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