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क्या जमात-ए-इस्लामी को अमेरिका के साथ 'सीक्रेट मीटिंग' ले डूबी? जानें बांग्लादेश चुनाव में हार की वजह समझिए

चुनाव अभियान के दौरान एक अंतरराष्ट्रीय आयाम भी जुड़ गया। अमेरिकी अखबार द वॉशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि अमेरिकी राजनयिक जमात-ए-इस्लामी के साथ संपर्क बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

क्या जमात-ए-इस्लामी को अमेरिका के साथ सीक्रेट मीटिंग ले डूबी? जानें  बांग्लादेश चुनाव में हार की वजह समझिए
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ढाका: Bangladesh Election Result 2026: 13वें संसदीय चुनाव में बांग्लादेश की राजनीति ने निर्णायक मोड़ लिया है। तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता की मजबूत दावेदारी पेश की, जबकि 2024 के आंदोलन के बाद उभरी जमात-ए-इस्लामी उम्मीदों के बावजूद पीछे रह गई। कभी सत्ता के शिखर तक पहुंचने का सपना देख रही जमात का गठबंधन आधी सीटों तक भी नहीं पहुंच सका। सवाल उठ रहा है कि आखिर जमात-ए-इस्लामी क्यों नहीं चल पाई?

शुरुआती बढ़त, लेकिन कमजोर पड़ता जनसमर्थन

जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन ने शेख हसीना सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया था। इस उथल-पुथल के दौर में जमात-ए-इस्लामी को एक संगठित और सक्रिय ताकत के रूप में देखा जाने लगा। अवामी लीग के चुनाव से बाहर होने और शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद राजनीतिक मैदान सीमित हो गया था। इस बीच, तारिक रहमान की चुनावी वापसी अपेक्षाकृत देर से हुई। वे 25 दिसंबर 2025 को 17 साल के निर्वासन के बाद बांग्लादेश लौटे। चुनाव में दो महीने से भी कम का समय बचा था। शुरुआती चरण में इसका लाभ जमात को मिला, खासकर उन इलाकों में जहां बीएनपी का संगठन पूरी तरह सक्रिय नहीं हुआ था।

लेकिन जैसे-जैसे प्रचार अभियान तेज हुआ, मतदाताओं का झुकाव बदलता गया। जिन युवा समूहों से जमात को उम्मीद थी विशेषकर आंदोलन में शामिल छात्र उन्होंने बड़ी संख्या में बीएनपी का समर्थन किया। महिला मतदाता भी अपेक्षित रूप से जमात के साथ नहीं आईं। अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर हिंदुओं, ने भी कट्टरपंथी छवि के कारण जमात की बजाय बीएनपी को प्राथमिकता दी। सबसे अहम बात यह रही कि अवामी लीग के पारंपरिक समर्थकों ने भी जमात की ओर रुख नहीं किया। उन्होंने रणनीतिक मतदान करते हुए बीएनपी को चुना।

‘अमेरिका एंगल’ और राजनीतिक ध्रुवीकरण

चुनाव अभियान के दौरान एक अंतरराष्ट्रीय आयाम भी जुड़ गया। अमेरिकी अखबार द वॉशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि अमेरिकी राजनयिक जमात-ए-इस्लामी के साथ संपर्क बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। रिपोर्ट में एक कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग का हवाला दिया गया और कहा गया कि ये बातचीत गोपनीय रूप से हो रही थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि एक अमेरिकी अधिकारी ने जमात की इस्लामी कानून की सख्त व्याख्या को लेकर उठी चिंताओं को कमतर बताया। इस खबर ने चुनावी विमर्श को प्रभावित किया। बीएनपी के महासचिव मिर्ज़ा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने एक रैली में आरोप लगाया कि जमात और अमेरिका के बीच कोई “गुप्त समझौता” हुआ है, जो देश की संप्रभुता के लिए खतरा हो सकता है। जमात ने किसी औपचारिक समझौते से इनकार किया, लेकिन विदेशी राजनयिकों से नियमित कूटनीतिक संपर्क की बात स्वीकार की। पार्टी ने कहा कि चुनाव से पहले विभिन्न दूतावासों के साथ सामान्य बैठकें हुईं, जिनमें स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव पर चर्चा की गई। ढाका में फ्रांस के राजदूत ज्यां-मार्क सेरे-शार्ले की जमात प्रमुख शफीकुर रहमान से मुलाकात भी चर्चा में रही। हालांकि इन बैठकों को कूटनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया, लेकिन चुनावी माहौल में इससे संदेह और बहस तेज हुई।

कट्टरपंथी छवि का साया

जमात-ए-इस्लामी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी उसके खिलाफ गई। पार्टी की स्थापना 1941 में सैयद अबुल आला मौदूदी ने की थी। 1971 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जमात ने बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया था और पश्चिमी पाकिस्तान का साथ दिया था। पार्टी के नेताओं पर रजाकार, अल-बद्र और अल-शम्स जैसे अर्धसैनिक समूहों के गठन और नागरिकों के खिलाफ हिंसा में शामिल होने के आरोप लगे। आजादी के बाद 1972 में जमात पर प्रतिबंध लगा, जिसे 1979 में हटा दिया गया। हालांकि जमात ने हाल के वर्षों में खुद को लोकतांत्रिक और सुधारवादी रूप में पेश करने की कोशिश की, लेकिन उसकी कट्टरपंथी छवि पूरी तरह नहीं बदली।

छवि सुधार की कोशिशें

जुलाई 2024 के आंदोलन के बाद जमात ने नई रणनीति अपनाई। उसने खुद को ‘फासीवाद विरोधी’ और ‘लोकतंत्र समर्थक’ के रूप में प्रस्तुत किया। पार्टी ने अल्पसंख्यक अधिकारों की बात की, पहली बार एक हिंदू उम्मीदवार उतारा और शरीया कानून पर सार्वजनिक बयानों को अपेक्षाकृत नरम किया। चुनावी भाषणों में शफीकुर रहमान ने महिलाओं की भागीदारी और समान अधिकारों की बात की। उन्होंने कहा कि “महिलाएं और पुरुष मिलकर कल का बांग्लादेश बनाएंगे।” उन्होंने महिलाओं के खिलाफ हिंसा के प्रति सख्त रुख दिखाया और न्याय आधारित व्यवस्था का वादा किया। लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये बदलाव सतही थे और पार्टी की मूल वैचारिक छवि को पूरी तरह बदलने में नाकाम रहे।

छात्र संगठन और हिंसा के आरोप

जमात के छात्र संगठन पर पहले से हिंसा और कट्टर गतिविधियों के आरोप लगते रहे हैं। अल्पसंख्यक समुदायों में भी पार्टी को लेकर आशंकाएं बनी रहीं। इसके अलावा कुछ नेताओं पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप भी लगे। इन सबने मिलकर एक ऐसा नैरेटिव तैयार किया कि जमात भविष्य का नहीं, बल्कि अतीत की राजनीति का प्रतिनिधित्व करती है।

रणनीतिक मतदान और बीएनपी की बढ़त

विश्लेषकों के अनुसार इस चुनाव में रणनीतिक मतदान की बड़ी भूमिका रही। अवामी लीग के अनुपस्थित रहने से मुख्य मुकाबला बीएनपी और जमात गठबंधन के बीच था। मतदाताओं के एक बड़े वर्ग ने जमात को रोकने के लिए बीएनपी को समर्थन दिया। तारिक रहमान की वापसी, स्थिरता और आर्थिक सुधार के वादों ने भी मतदाताओं को प्रभावित किया। बीएनपी ने खुद को अपेक्षाकृत मध्यमार्गी और व्यापक गठबंधन के रूप में पेश किया, जिससे उसे शहरी, ग्रामीण, युवा और अल्पसंख्यक सभी वर्गों से समर्थन मिला।

जनता का स्पष्ट संदेश

चुनाव परिणाम साफ संकेत देते हैं कि जमात-ए-इस्लामी की राजनीतिक पुनरुत्थान की कोशिशों को जनता ने सीमित समर्थन दिया। पार्टी चाहकर भी अपनी कट्टरपंथी छवि से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाई। हालांकि उसने रणनीतिक रूप से छवि सुधार और गठबंधन राजनीति की कोशिश की, लेकिन मतदाताओं ने स्थिरता और व्यापक स्वीकार्यता को प्राथमिकता दी। बीएनपी की दो-तिहाई बहुमत की जीत ने यह स्पष्ट कर दिया कि बांग्लादेश की जनता फिलहाल कट्टरपंथी प्रयोगों की बजाय स्थिर और व्यापक राजनीतिक नेतृत्व चाहती है।

नया अध्याय खुला

अब सवाल यह है कि क्या जमात-ए-इस्लामी भविष्य में अपनी रणनीति में और बदलाव करेगी या फिर अपनी वैचारिक पहचान पर कायम रहेगी। दूसरी ओर, बीएनपी के सामने भी बड़ी चुनौती है- जनादेश को स्थिर शासन, आर्थिक सुधार और लोकतांत्रिक संस्थाओं की बहाली में बदलना। फिलहाल इतना तय है कि 2026 का चुनाव बांग्लादेश की राजनीति में एक नया अध्याय खोल चुका है, जहां जनता ने कट्टरपंथी राजनीति की बजाय व्यापक स्वीकृति और स्थिरता को तरजीह दी है।


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