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ईरान-अमेरिका-इजरायल तनाव के बीच सीजफायर की हलचल, बैकडोर डिप्लोमेसी में जुटे बड़े चेहरे

इस कूटनीतिक प्रयास में तीन नाम खास तौर पर चर्चा में हैं स्टीव विटकॉफ, जेरेड कुशनर और ईरान के वरिष्ठ नेता मोहम्मद बगेर गलीबाफ। बताया जा रहा है कि विटकॉफ और कुशनर अमेरिकी हितों के साथ-साथ इजरायल के साथ तालमेल बिठाते हुए बातचीत को आगे बढ़ा रहे हैं। वहीं, ईरान की ओर से गलीबाफ बातचीत की मेज पर अपनी शर्तें रख रहे हैं।

ईरान-अमेरिका-इजरायल तनाव के बीच सीजफायर की हलचल, बैकडोर डिप्लोमेसी में जुटे बड़े चेहरे
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वॉशिंगटन/तेहरान। US Iran ceasefire: ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी सैन्य तनाव को अब 25 दिन बीत चुके हैं। लगातार हमलों, मिसाइल स्ट्राइक और बमबारी के बीच अब कूटनीतिक स्तर पर हलचल तेज होती नजर आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से संभावित सीजफायर (युद्धविराम) को लेकर अटकलें सामने आ रही हैं, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उम्मीदें जगा दी हैं। सूत्रों के मुताबिक, पर्दे के पीछे कई स्तरों पर बातचीत जारी है, जिसमें अमेरिका, ईरान और मध्यस्थ देशों के बीच संपर्क बढ़ा है। इन प्रयासों का मकसद युद्ध को विराम देना और बातचीत का रास्ता खोलना है।

बैकडोर डिप्लोमेसी में सक्रिय विटकॉफ, कुशनर और गलीबाफ

इस कूटनीतिक प्रयास में तीन नाम खास तौर पर चर्चा में हैं स्टीव विटकॉफ, जेरेड कुशनर और ईरान के वरिष्ठ नेता मोहम्मद बगेर गलीबाफ। बताया जा रहा है कि विटकॉफ और कुशनर अमेरिकी हितों के साथ-साथ इजरायल के साथ तालमेल बिठाते हुए बातचीत को आगे बढ़ा रहे हैं। वहीं, ईरान की ओर से गलीबाफ बातचीत की मेज पर अपनी शर्तें रख रहे हैं। इन तीनों के जरिए एक तरह की ‘बैकडोर डिप्लोमेसी’ चल रही है, जिसमें औपचारिक घोषणाओं के बजाय पर्दे के पीछे समझौते की संभावनाएं तलाश की जा रही हैं।

पाकिस्तान, मिस्र और तुर्किये की मध्यस्थता


इस बीच क्षेत्रीय स्तर पर भी शांति की कोशिशें जारी हैं। पाकिस्तान, मिस्र और तुर्किये मिलकर अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता करने में जुटे हैं। पाकिस्तानी अखबार डॉन के अनुसार, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने रविवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बातचीत की। वहीं, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सोमवार को ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान से चर्चा की। इन उच्चस्तरीय संपर्कों को क्षेत्र में तनाव कम करने और शांति बहाल करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।

अमेरिका और ईरान के दूत भी सक्रिय


कूटनीतिक प्रक्रिया में अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। दोनों पक्षों के बीच सीधे या अप्रत्यक्ष संवाद के जरिए संभावित समझौते की जमीन तैयार की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये वार्ताएं सफल होती हैं, तो यह न केवल मौजूदा संघर्ष को रोक सकती हैं, बल्कि भविष्य में स्थायी समाधान की दिशा भी खोल सकती हैं।

कौन हैं स्टीव विटकॉफ?


स्टीव विटकॉफ अमेरिका के एक प्रमुख रियल एस्टेट डेवलपर और निवेशक हैं। वे ‘विटकॉफ ग्रुप’ के संस्थापक हैं और न्यूयॉर्क के कारोबारी जगत में एक बड़ा नाम माने जाते हैं। विटकॉफ की खास पहचान उनकी कारोबारी सफलता के साथ-साथ डोनाल्ड ट्रंप के साथ उनके करीबी रिश्ते के लिए भी है। दोनों लंबे समय से दोस्त रहे हैं। हालांकि, विटकॉफ का पारंपरिक कूटनीतिक अनुभव नहीं है, लेकिन इसके बावजूद ट्रंप ने उन्हें ईरान के साथ शांति वार्ता के लिए अपना विशेष दूत नियुक्त किया है। यह नियुक्ति इस बात को दर्शाती है कि ट्रंप प्रशासन भरोसेमंद और करीबी लोगों के जरिए संवेदनशील वार्ताएं आगे बढ़ाना चाहता है।

जेरेड कुशनर की भूमिका भी अहम


जेरेड कुशनर, जो डोनाल्ड ट्रंप के दामाद और पूर्व वरिष्ठ सलाहकार रह चुके हैं, पहले भी मध्य पूर्व की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं। ‘अब्राहम समझौते’ (Abraham Accords) में उनकी भूमिका को काफी अहम माना जाता है। ऐसे में मौजूदा संकट में उनकी भागीदारी यह संकेत देती है कि अमेरिका एक बार फिर अनुभव और रिश्तों का इस्तेमाल कर समाधान निकालने की कोशिश कर रहा है।

ईरान की ओर से गलीबाफ की अगुवाई


मोहम्मद बगेर गलीबाफ ईरान की राजनीति में एक प्रभावशाली नेता हैं। वे पहले तेहरान के मेयर रह चुके हैं और वर्तमान में ईरान की संसद (मजलिस) के स्पीकर हैं। गलीबाफ को ईरान के सत्ता प्रतिष्ठान में मजबूत पकड़ वाला नेता माना जाता है। उनकी भागीदारी यह संकेत देती है कि ईरान भी बातचीत के जरिए समाधान की संभावनाओं को खुला रखना चाहता है, भले ही वह अपनी शर्तों पर अडिग हो।

क्या जल्द संभव है सीजफायर?


हालांकि अभी तक किसी आधिकारिक सीजफायर की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन तेजी से बढ़ती कूटनीतिक गतिविधियां यह संकेत दे रही हैं कि सभी पक्ष युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं। आने वाले दिनों में यह साफ हो पाएगा कि ये बैकडोर बातचीत किसी ठोस समझौते में बदलती है या नहीं। फिलहाल, वैश्विक समुदाय की नजरें इन कोशिशों पर टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका असर पूरे मध्य पूर्व और दुनिया की स्थिरता पर पड़ सकता है।


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