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बांग्लादेश चुनाव से पहले हिंदुओं को निशाना बनाने की साजिश, खुफिया रिपोर्ट में किया गया खुलासा

खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, पिछले सप्ताह हुई इस बैठक में कट्टरपंथी संगठनों के प्रतिनिधि और कुछ राजनीतिक दलों से जुड़े नेता शामिल थे। बैठक का उद्देश्य चुनावों के दौरान अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ भावनाएं भड़काना और असुरक्षा का माहौल बनाना था। रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंसा को “स्वतःस्फूर्त जन आक्रोश” के रूप में दिखाने की योजना है, ताकि अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचा जा सके।

बांग्लादेश चुनाव से पहले हिंदुओं को निशाना बनाने की साजिश, खुफिया रिपोर्ट में किया गया खुलासा
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ढाका। बांग्लादेश में फरवरी में होने वाले संसदीय चुनावों से पहले अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के खिलाफ हिंसा भड़काने की एक बड़ी साजिश का खुलासा हुआ है। खुफिया ब्यूरो की एक गोपनीय रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हाल ही में कुछ राजनीतिक नेताओं और कट्टरपंथी तत्वों के बीच एक अहम बैठक हुई, जिसमें चुनावी माहौल को ‘हिंदू विरोधी’ और ‘भारत विरोधी’ दिशा में मोड़ने की रणनीति तैयार की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार चुनाव का केंद्र विकास, अर्थव्यवस्था या रोजगार जैसे मुद्दे नहीं, बल्कि धार्मिक और राष्ट्रवादी ध्रुवीकरण होगा।

खुफिया रिपोर्ट में क्या खुलासा

खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, पिछले सप्ताह हुई इस बैठक में कट्टरपंथी संगठनों के प्रतिनिधि और कुछ राजनीतिक दलों से जुड़े नेता शामिल थे। बैठक का उद्देश्य चुनावों के दौरान अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ भावनाएं भड़काना और असुरक्षा का माहौल बनाना था। रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंसा को “स्वतःस्फूर्त जन आक्रोश” के रूप में दिखाने की योजना है, ताकि अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचा जा सके।

फर्जी खबरें और नफरत फैलाने की रणनीति

साजिश के तहत हिंदू समुदाय के खिलाफ फर्जी खबरें और झूठे नैरेटिव फैलाने की विस्तृत योजना बनाई गई है। इसमें हिंदुओं पर चोरी, जमीन कब्जाने और अन्य आपराधिक गतिविधियों के मनगढ़ंत आरोप लगाना शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन फर्जी खबरों को सोशल मीडिया और स्थानीय नेटवर्क के जरिए तेजी से फैलाया जाएगा, ताकि आम लोगों को अल्पसंख्यकों के खिलाफ उकसाया जा सके। राजनीतिक प्रचार में यह भी कहा जा रहा है कि चूंकि भारत ने अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना को शरण दी है, इसलिए बांग्लादेश के हिंदू समुदाय को “भारत समर्थक” माना जाना चाहिए। इसी तर्क के आधार पर उन्हें देश में रहने का अधिकार न होने जैसी खतरनाक बातें फैलाई जा रही हैं।

हिंदू विरोधी और भारत विरोधी एजेंडा

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस बार चुनावी अभियान का मुख्य स्वर ‘हिंदू विरोधी’ और ‘भारत विरोधी’ एजेंडे पर केंद्रित होता दिख रहा है। भारत के साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों को मुद्दा बनाकर हिंदू समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य बहुसंख्यक आबादी को भावनात्मक रूप से भड़काकर वोटों का ध्रुवीकरण करना है।

जमात-ए-इस्लामी को सबसे ज्यादा फायदा

इस पूरे राजनीतिक ध्रुवीकरण से जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी संगठनों को सबसे ज्यादा फायदा होता नजर आ रहा है। ये संगठन शेख हसीना को ‘देशद्रोही’ और ‘भारत समर्थक’ बताकर जनता को लामबंद कर रहे हैं। उनके भाषणों और प्रचार सामग्री में 1971 के बाद बने धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह रणनीति न केवल अल्पसंख्यकों के लिए खतरनाक है, बल्कि बांग्लादेश की मूल पहचान और लोकतांत्रिक ढांचे के लिए भी गंभीर चुनौती है।

अल्पसंख्यक समुदाय में डर, पलायन की आशंका

बढ़ते तनाव और हिंसा की आशंका के बीच हिंदू समुदाय में गहरा डर व्याप्त है। कई इलाकों में लोग अपने घर और संपत्ति को लेकर असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। यदि चुनावी हिंसा बढ़ती है, तो बड़े पैमाने पर पलायन की आशंका जताई जा रही है। इसका सीधा असर भारत-बांग्लादेश सीमा पर पड़ सकता है, जहां पहले से ही मानवीय और सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां मौजूद हैं।

महिलाओं की सुरक्षा और प्रतिनिधित्व पर सवाल

12 फरवरी को होने वाले 13वें संसदीय चुनावों और जनमत संग्रह से पहले महिलाओं की स्थिति को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई है। ढाका में 71 मानवाधिकार संगठनों के साझा मंच ‘सामाजिक प्रतिरोध समिति’ ने महिलाओं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा, धमकी और डराने-धमकाने की घटनाओं पर कड़ा ऐतराज जताया है। निर्वाचन आयोग के आंकड़े चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। कुल 1,981 उम्मीदवारों में से सिर्फ 81 महिलाएं चुनावी मैदान में हैं, जो कुल प्रत्याशियों का महज 4.08 प्रतिशत है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस स्थिति को “अस्वीकार्य” बताते हुए कहा है कि राजनीतिक दलों के तमाम वादों के बावजूद महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी लगातार कमजोर बनी हुई है।

बीएनपी का कड़ा संदेश: ‘पाक समर्थकों को नकारें’

चुनावी माहौल में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने भी तीखा रुख अपनाया है। पार्टी के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने मतदाताओं से अपील की है कि वे उन उम्मीदवारों को खारिज करें, जिन्होंने 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था। ठाकुरगांव में एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने जमात-ए-इस्लामी पर परोक्ष हमला करते हुए कहा कि “पाकिस्तानी सहयोगियों” को वोट देना देश को बर्बादी की ओर ले जाएगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि बांग्लादेश की पहचान 1971 के स्वतंत्रता संग्राम और बलिदान की भावना से जुड़ी है, जिसे किसी भी हाल में कमजोर नहीं पड़ने दिया जाना चाहिए।

लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा

बांग्लादेश के आगामी चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं, बल्कि देश के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष चरित्र की भी अग्निपरीक्षा बनते जा रहे हैं। अल्पसंख्यकों के खिलाफ साजिश, महिलाओं की सीमित भागीदारी और कट्टरपंथी राजनीति—ये सभी संकेत देते हैं कि चुनावी माहौल बेहद संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण है। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि बांग्लादेश नफरत और ध्रुवीकरण की राजनीति से बाहर निकल पाता है या नहीं।

नई दिल्ली, आइएएनएस : फरवरी में होने वाले चुनावों से पहले बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ हिंसा भड़काने की एक बड़ी साजिश का राजफाश हुआ है। खुफिया ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले सप्ताह कई नेताओं और कट्टरपंथी तत्वों के बीच एक बैठक हुई, जिसमें चुनावों के दौरान हिंदू विरोधी भावनाओं को भड़काने की रणनीति तैयार की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार चुनाव विकास या अर्थव्यवस्था के बजाय पूरी तरह से 'हिंदू विरोधी' और 'भारत विरोधी' एजेंडे पर केंद्रित होंगे।

नफरत और फर्जी खबरों का सहारा
साजिश के तहत कट्टरपंथी तत्व हिंदुओं के खिलाफ फर्जी खबरें (फेक नैरेटिव) फैलाने की योजना बना रहे हैं। इसमें अल्पसंख्यकों पर चोरी और अन्य अपराधों के झूठे आरोप लगाना शामिल है ताकि स्थानीय आबादी को उनके खिलाफ हिंसा के लिए उकसाया जा सके। राजनीतिक दल इस बात का प्रचार कर रहे हैं कि चूंकि भारत ने अपदस्थ नेता शेख हसीना को शरण दी है, इसलिए बांग्लादेश के हिंदू (जिन्हें भारत समर्थक माना जा रहा है) वहां रहने के हकदार नहीं हैं।

राजनीतिक ध्रुवीकरण व पलायन का डर
जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी संगठन इस राजनीतिक ध्रुवीकरण का सबसे अधिक लाभ उठा रहे हैं। वे शेख हसीना को 'देशद्रोही' और 'भारत समर्थक' बताकर जनता को लामबंद कर रहे हैं। इस तनावपूर्ण माहौल के कारण अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय गहरे डर में है। यदि हिंसा बढ़ती है, तो एक बड़े पलायन की आशंका है, जिससे भारत के साथ लगती सीमाओं पर दबाव बढ़ सकता है।

महिला प्रतिनिधित्व में कमी पर गंभीर चिंता
बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले 13वें संसदीय चुनावों और जनमत संग्रह से पहले महिलाओं की सुरक्षा और राजनीतिक भागीदारी को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई है। ढाका में 71 मानवाधिकार संगठनों के साझा मंच 'सामाजिक प्रतिरोध समिति' ने देश में महिलाओं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और डराने-धमकाने की घटनाओं पर कड़ा ऐतराज जताया है। निर्वाचन आयोग के आंकड़े बताते हैं कि राजनीतिक दलों के वादों के बावजूद महिलाओं की स्थिति निराशाजनक है। कुल 1,981 उम्मीदवारों में से केवल 81 महिलाएं चुनावी मैदान में हैं। यह संख्या कुल प्रत्याशियों का मात्र 4.08 प्रतिशत है, जिसे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने "अस्वीकार्य" बताया है।

''पाक सेना का साथ देने वाले उम्मीदवारों को खारिज करें''

चुनाव प्रचार के दौरान बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने एक कड़ा रुख अपनाया है। पार्टी के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने मतदाताओं से उन उम्मीदवारों को खारिज करने की अपील की है, जिन्होंने 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था। ठाकुरगांव में एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने जमात-ए-इस्लामी की ओर परोक्ष इशारा करते हुए कहा कि 'पाकिस्तानी सहयोगियों' को वोट देना देश को बर्बाद करने जैसा होगा। बांग्लादेश की पहचान 1971 के संघर्ष और स्वतंत्रता की भावना पर आधारित है, जिसे अक्षुण्ण रखना अनिवार्य है।


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