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पहाड़ी पर कुल्हाड़ी बंदी की तो पानीदार हो गए गाँव...!

इंदौर ! एक पहाड़ी पर लोगों ने कुल्हाड़ीबंदी करने का निर्णय लिया तो कुछ ही सालों में उनके गाँव पानीदार बन गए।

पहाड़ी पर कुल्हाड़ी बंदी की तो पानीदार हो गए गाँव...!
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मनीष वैद्य

गांव के लोगों ने खुद संवारी अपनी तकदीर, ठ्ठडेढ़ सौ बीघा जमीन सिंचित, ठ्ठ142 हेक्टेयर की पहाड़ी अब हो गई हरी-भरी
इंदौर ! एक पहाड़ी पर लोगों ने कुल्हाड़ीबंदी करने का निर्णय लिया तो कुछ ही सालों में उनके गाँव पानीदार बन गए। 142 हेक्टेयर की पहाड़ी हरी–भरी हो गई, सात तालाबों में पानी रुकने लगा। सूखे खेत लहलहाने लगे। सीताफल की बहार आई, उम्मीद हार चुके किसानों के चेहरे पर चमक लौट आई. इस दौरान उन्हें खेती, सीताफल और अन्य उपक्रमों से करीब दो करोड़ रूपये का फायदा हो रहा है।इंदौर से कोटा सडक़ पर करीब सवा सौ किमी दूर आगर मालवा शहर के पास ही है बैजनाथ महादेव मंदिर। यहीं से शुरू होती है निपानिया की पहाड़ी जो करीब दो किमी तक चलते हुए सडक़ के किनारे भानपुरा और देहरिया गांवों तक जाती है। सन 2000से पहले तक यह पहाड़ी बंजर और ऊसर होकर अपनी पहचान खो चुकी थी। आसपास के करीब आधा दर्जन गांव भी गर्मियों से पहले ही पानी की कमी महसूसने लगे थे। इनकी करीब डेढ़ सौ बीघा जमीन में एक फसल ही हो पाती थी। दुधारू मवेशी भी कम होने लगे थे।
तभी किसी के मन में आया कि किसी तरह इस पहाड़ी पर पानी थमने लगे और हरियाली बढ़ जाए तो उनके गाँव पानीदार बन सकते हैं। आसपास के ग्रामीणों ने बैठक कर तय किया कि वे अब पहाड़ी का कायाकल्प करेंगे। सरकार से काम करवाने में बहुत समय लग सकता था, इसलिए उन्होंने खुद ही शुरुआत की। कुछ किसानों ने सहकारी समिति बनाकर सरकार से इसे 30 साल की लीज पर ले लिया। फिर कुल्हाड़ीबंदी की कि कोई भी गीली लकड़ी नहीं काटेगा। यहाँ पानी रोकने के लिए कन्टूर ट्रेंच खोदी। बरसाती नालों के प्राकृतिक प्रवाह को सुचारू किया। जगह-जगह उन्हें छोटे पत्थरों से रोका। सात छोटे तालाब बनाए. पौधे लगाए। इससे पानी थमने लगा। जहाँ चाह, वहाँ राह की तर्ज पर इस काम में उज्जैन की संस्था फाउंडेशन फॉर इकोलाजी सिक्योरिटी ने तकनीकी और जागरूकता बढ़ाने में ग्रामीणों की मदद की तो आईटीसी ने कुछ वित्तीय मदद की है। आज 15 साल बाद पहाड़ी हरियाली से आच्छादित है। यहाँ शीशम, चंदन, पलाश, नीम महुआ, बांस सहित कई प्रजातियों के करीब पांच हजार से ज़्यादा पौधे 8 से 10फीट तक हो चुके हैं। करीब तीन सौ किसानों की उपज में बढ़ोतरी हुई है। कुओं में पानी रहने लगा है। पहाड़ी के पास डेढ़ सौ बीघा खेती में अब दो फसले और सब्जियां होने लगी हैं। इससे लगे छह गांवों में पीने के पानी की दिक्कत खत्म हुई है। सीताफल, जामुन और करौंदे की बहार ऐसी आती है कि हर साल हजारों रूपये में नीलाम करना पडती है। अब सब बहुत खुश हैं और उनके चेहरे पर खोई चमक लौट आई है।


इनका कहना है
यह हमारे लिए किसी सपने के सच होने की तरह है। हम सोच भी नहीं सकते थे कि थोड़े से काम से इतना फायदा होगा। पानी तो हुआ ही। डेरी में दूध भी 60-70 लीटर से बढक़र 400 लीटर हो गया है। पहाड़ी पर जंगली जानवर और पक्षी आने लगे हैं।
नारायणसिंह चौहान, ग्रामीण निपानिया
15 सालों में यहाँ के ग्रामीणों ने अपने पर्यावरण का जिस तरह कायाकल्प किया है, उसे देख अभिभूत हूँ। आज ऐसे कई गांवों की ज़रूरत है।
सुनील चतुर्वेदी, पर्यावरणविद
हमने देखा कि ग्रामीण जोश-खरोश से काम कर रहे हैं तो हमने उन्हें जागरूकता बढ़ाने और तकनीकी मदद की। सच में उनका काम अनुकरणीय है।
सतीश पंवार, वरिष्ठ प्रबंधक, फाउंडेशन फॉर इकोलाजी सिक्योरिटी उज्जैन


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