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आपातकाल के समय में देश में था सरकारी आतंक तथा अराजकता का बोलबाला:  नकवी

 अल्पसंख्यक संख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने आज कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 1975 में लगाया गया

आपातकाल के समय में देश में था सरकारी आतंक तथा अराजकता का बोलबाला:  नकवी
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नयी दिल्ली। अल्पसंख्यक संख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने आज कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 1975 में लगाया गया आपातकाल देश के लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा बदनुमा दौर था जिसमें लोगों के लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक अधिकार छीन लिए गये थे और सरकारी आतंक तथा अराजकता का बोलबाला था ।



नकवी ने आपातकाल की 43 वीं वर्षगांठ के मौके पर लिखे ब्लाग में कहा कि आपातकाल में हजारों लोगों को जेलों में डाला गया जिनमें से सैकड़ों की मौत हुयी । बर्बरता और सरकारी आतंक-अराजकता चरम पर थी, लोकतांत्रिक-संवैधानिक अधिकार खत्म कर दिए गये थे ,विपक्षी नेता , राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता, छात्र, पत्रकार जो भी कांग्रेस सरकार की तानाशाही हरकतों की आलोचना करते उन्हें राष्ट्रद्रोही करार देकर गम्भीर अपराधिक धाराओं में या तो जेल भेज दिया जाता था।



उन्होंने कहा , “ संवैधानिक मूल्यों-मान्यताओं, वाणी-लेखनी की स्वतंत्रता सब कुछ कांग्रेसी आपातकाल की बन्धक बन गई थी। न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका का तानाशाही सल्तनत ने अपहरण कर लिया था। एक ऐसी डरावनी, भयानक तानाशाही जहां सांस लेने की इजाजत भी सत्ता के सिपहासलारों से लेनी पड़ती थी। समाचार पत्र, फिल्में, समाचार ऐजेन्सियां, रेडियो सबकुछ ‘‘सेन्सर के सोटे” से घायल थे ,बुद्धिजीवी-पत्रकार-लेखक या तो कांग्रेसी कवच पहनकर ‘‘इण्डिया इज इंदिरा,, कह रहे थे या जेल के सीखचों में थे। मीडिया पर तानाशाही नियंत्रण के लिए नया कठोर कानून बनाया गया। स्वतंत्र अखबारों की बिजली काट दी गई, जिन पत्रकारों-सम्पादकों ने सरकारी भाषा नहीं स्वीकार की उन्हें जेल भेज दिया गया। ”

नकवी ने कहा कि आपातकाल के पहले हफ्ते में ही संविधान के अनुच्छेद 14,21 और 22 को निलंबित कर दिया गया, ऐसा करके कांग्रेस सरकार ने कानून व संविधान की नजर में सबकी बराबरी, जीवन और संपत्ति की सुरक्षा की गारंटी और किसी की गिरफ्तारी के 24 घंटे के अन्दर उसे अदालत के सामने पेश करने के अधिकारों को खत्म कर दिया।

जनवरी 1976 में अनुच्छेद 19 को भी निलंबित कर दिया गया, जिससे अभिव्यक्ति, प्रकाशन करने, संघ बनाने और सभा करने की आजादी को खत्म कर दिया गया ; राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) में अपनी सुविधानुसार कई बार बदलाव किए गये , नजरबंदी को एक साल से अधिक तक बढाने का प्रावधान कर दिया गया। तीन हफ्ते बाद 16 जुलाई 1975 को इसमें पुन: बदलाव करके नजरबंदियों को कोर्ट में अपील करने के अधिकार से भी वंचित कर दिया गया।

उन्होंने कहा कि आपातकाल लगाने का प्रमुख कारण 12 जून 1975 का इलाहाबाद हाईकोर्ट का वह ऐतिहासिक फैसला था, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी को चुनाव में ‘ भ्रष्ट आचरण ’ अपनाने का दोषी करार देते हुए उनके लोकसभा चुनाव को निरस्त एवं उन्हें छह वर्षो तक चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराया गया था।

25 जून 1975 को आधी रात में लगाया गया यह आपातकाल न किसी बाहरी हमले के कारण था , न किसी युद्ध के चलते बल्कि शुद्ध रुप से कांग्रेस एवं श्रीमती गांधी की सत्ता पर खतरे को टालने के लिए किया गया गुनाह था।


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