अमूल से आहत नन्दिनी बना कन्नड़ गौरव का सवाल
कर्नाटक में भाजपा के लिए चुनावी मैदान को काफी फिसलन भरा बना दिया है। भ्रष्टाचार से निपटने में विफलता के लिए मुख्यमंत्री बी बोम्मई पर अभी भी हमला किया जा रहा है

- अरुण श्रीवास्तव
कर्नाटक में भाजपा के लिए चुनावी मैदान को काफी फिसलन भरा बना दिया है। भ्रष्टाचार से निपटने में विफलता के लिए मुख्यमंत्री बी बोम्मई पर अभी भी हमला किया जा रहा है, नागरिक समाज के कार्यकर्ता संघ परिवार के फ्रिंज समूहों के हालिया व्यवहार से परेशान हैं और अब नवीनतम कन्नड़ उप राष्ट्रवाद है जो अमूल के अचानक प्रवेश पर कर्नाटक की नंदिनी को चुनौती दे रहा है।
कर्नाटक में 10 मई को होने वाले विधानसभा चुनाव से मात्र एक महीने से भी कम समय रह गया है, जब भाजपा की राज्य इकाई ऊपर से नीचे तक विभाजित हो गयी है। वफादार और दलबदलू तथा हिंदुत्व में भरोसा रखने और नहीं रखने वाले स्पष्ट रूप से अलग-अलग दिख रहे हैं। दलबदलू दिल्ली में अपने संरक्षकों के माध्यम से वफादारों को किनारे करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं, तथा जो हिंदुत्व की आरएसएस राजनीतिक लाइन में विश्वास नहीं करते वे सांप्रदायिक विभाजन को गहरा करने के लिए कट्टरपंथियों पर उंगली उठा रहे हैं।
एक और मुद्दा जिसने भाजपा को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है, वह है कर्नाटक में अमूल का प्रवेश। इसने राज्य में अपने दूध और दही के कारोबार की योजना बनाई है। कन्नडिगा लोग दही शब्द के ही विरोधी हैं। इसके बजाय वे उसे कर्ड कहना पसंद करते हैं। इतना ही नहीं, स्थानीय लोगों का मानना है कि कर्नाटक की अपनी नंदिनी की जगह अमूल को लाना गुजरात भाजपा नेताओं की राज्य दुग्ध महासंघ को कमजोर करने की योजना का हिस्सा है।
उन्हें याद है कि पिछले साल अगस्त में सहकारिता मंत्री अमित शाह ने बेंगलुरु में केएमएफ डेयरी का दौरा किया था। उनकी यात्रा ने लोगों के बीच संदेह को जन्म दिया है कि इसका उद्देश्य नंदिनी ब्रांड को अमूल के साथ मिलाना था। इस बीच विवाद ने कर्नाटक से कहीं आगे भी ध्यान खींचा है। यह तर्क दिया जा रहा है कि मोदी सरकार को अमूल को कर्नाटक में प्रवेश करने की अनुमति देने के बजाय नंदिनी को मजबूत करने के लिए और उपाय करने चाहिए थे।
चुनाव से ठीक पहले हो रहे इस घटनाक्रम ने कई लोगों की आंखें नम कर दी हैं और सवाल पूछे जा रहे हैं; 'राज्य स्तरीय सहकारी दुग्ध निकायों को प्रतिस्पर्धा के लिए क्यों मजबूर किया जाना चाहिए?' यह कन्नड़ पहचान का मुद्दा बन गया है। वास्तव में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया ने मोदी से जानना चाहा था,'आपके कर्नाटक आने का उद्देश्य कर्नाटक को देना है या कर्नाटक से लूटना है?आप कन्नडिगाओं से पहले ही बैंकों, बंदरगाहों और हवाई अड्डों को चुरा चुके हैं। क्या अब आप नंदिनी (केएमएफ) को हमसे चुराने की कोशिश कर रहे हैं?' राज्य के सहकारिता मंत्री द्वारा दिये गये स्पष्टीकरण को स्वीकार करने वाले बहुत कम हैं;' हर कोई जानता है कि गर्मियों में दुग्ध उत्पाद प्रभावित होते हैं। केएमएफ किसी से भी प्रतिस्पर्धा का सामना करने में सक्षम है।' तर्क दिया जाता है कि अमूल दूसरे सीजन में अपनी सप्लाई कैसे रोक सकता था?
विवाद 'दूध के इर्द-गिर्द राजनीति' के महत्व को रेखांकित करता है, जहां 24 लाख सदस्यों वाले 22,000 गांवों में फैली 16 यूनियनें इस क्षेत्र को एक शक्तिशाली आवाज देती हैं, जिसे जमीनी स्तर पर उपस्थिति स्थापित करने के लिए पार्टियों द्वारा प्रतिष्ठित किया जाता है। केएमएफ भारत की दूसरी सबसे बड़ी डेयरी सहकारी संस्था है जिसके पास नंदिनी ब्रांड है।
अभी तक जद (एस) और कांग्रेस के नेता केएमएफ की कुर्सी पर काबिज रहे हैं। मोदी और शाह का मानना है कि ग्रामीण कर्नाटक में कांग्रेस की मजबूत पकड़ के पीछे केएमएफ का प्राथमिक कारक है। कुछ कन्नड़ संगठनों ने इस कदम के खिलाफ सड़कों पर उतर कर गुजरात स्थित अमूल के साथ राज्य संचालित सहकारी समिति को विलय करने की केंद्र सरकार की 'साजिश' की निंदा की है।
कांग्रेस और जद (एस) जैसे विपक्षी दलों ने राज्य की कंपनियों और बैंकों को 'खत्म' करने के प्रयास के लिए भाजपा पर हमला किया है। भाजपा ने विपक्ष के दावों को खारिज करते हुए कहा कि आरोप निराधार हैं और दो दुग्ध संघों के विलय का कोई प्रस्ताव नहीं है। लेकिन आम लोग भाजपा के स्पष्टीकरण को मानने से कतरा रहे हैं। उनका संदेह मुख्य रूप से राहुल गांधी के इस आरोप के कारण है कि मोदी एक गुजराती व्यवसायी अडानी को संरक्षण दे रहे हैं और उसे बढ़ावा दे रहे हैं। जहां नंदिनी 39 रुपये प्रति लीटर के पैकेट पर बिकती है, वहीं अमूल दूध की कीमत 54 रुपये प्रति लीटर होगी। मूल्य में यह असामान्य वृद्धि बहुत अधिक व्याकुलता पैदा कर रही है।
मानो दूध का मुद्दा कर्नाटक की चुनावी गणना को बिगाड़ने के लिए पर्याप्त नहीं था, लाल मिर्च का मुद्दा सामने आया है। कर्नाटक के बाजार में 20 हजार क्विंटल की भारी मात्रा डंप की गई है। कर्नाटक में जिस तरह से गुजरात की कारोबारी लॉबी अत्यधिक सक्रिय हो गई है, उससे ग्रामीण उत्पादकों, किसानों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। 224 विधानसभा क्षेत्रों में से 154 ग्रामीण क्षेत्र हैं। दूध और काली मिर्च के इस खेल का निश्चित रूप से भाजपा की चुनावी संभावनाओं पर असर पड़ेगा।
उधर वरिष्ठ भाजपा नेता केएस ईश्वरप्पा ने विधानसभा चुनाव से महज चार हफ्ते पहले यह घोषणा कर भाजपा को झटका दिया है कि वह चुनावी राजनीति से संन्यास ले रहे हैं। हालांकि भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि वह अमित शाह के निर्देश पर ऐसा कर रहै हैं ताकि पार्टी की पहचान भ्रष्ट संगठन के रूप में न हो, पर लोग जानना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार उजागर होने के ठीक बाद उन्हें दंडित क्यों नहीं किया गया?
आशंका जताई जा रही है कि पार्टी के कुछ और वरिष्ठ नेता चुनावी राजनीति छोड़ सकते हैं। बी.एस.येदियुरप्पा, लिंगायत बाहुबली और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री, प्रभावी चुनाव प्रचार करने की अनिच्छा ने नेताओं को हतोत्साहित किया है। वह एकमात्र बड़े नेता हैं और भाजपा की सबसे बड़ी ताकत हैं। उनके करीबी सहयोगियों की पार्टी आलाकमान द्वारा अनदेखी राज्य के कार्यकर्ताओं और नेताओं को नहीं भाया।
दुर्भाग्य से मंगलवार को आलाकमान द्वारा 189 उम्मीदवारों की सूची जारी करने के बाद राज्य भाजपा में गुटबाजी तेज हो गई है। येदियुरप्पा और उनके उम्मीदवार सीएम बसवराज बोम्मई के बीच अनबन के साथईश्वरप्पा, रमेश जरकिहोली, जनार्दन रेड्डी और श्रीरामुलु आदि ने अपनी विद्रोही गतिविधियों को तेज कर दिया है। उन्हें दलबदलुओं का समर्थन मिल रहा है।
येदियुरप्पा के कदमों से पार्टी आलाकमान डरा हुआ है। उन्हें उनके समर्थकों द्वारा विपक्षी उम्मीदवारों का समर्थन करने का संदेह है। शराब कारोबारी जरकीहोली को 'ऑपरेशन लोटस' के माध्यम से कांग्रेस से निकाला गया था। हालांकि बलात्कार के आरोप में उन्हें मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा था। यह भी अफवाह है कि जरकीहोली के जद (एस) में शामिल होने की संभावना है।
इन सभी घटनाक्रमों ने कर्नाटक में भाजपा के लिए चुनावी मैदान को काफी फिसलन भरा बना दिया है। भ्रष्टाचार से निपटने में विफलता के लिए मुख्यमंत्री बी बोम्मई पर अभी भी हमला किया जा रहा है, नागरिक समाज के कार्यकर्ता संघ परिवार के फ्रिंज समूहों के हालिया व्यवहार से परेशान हैं और अब नवीनतम कन्नड़ उप राष्ट्रवाद है जो अमूल के अचानक प्रवेश पर कर्नाटक की नंदिनी को चुनौती दे रहा है।


