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 कान्हा की नगरी होली की खुमारी में डूबी

  देश भर में रंगो का त्योहार होली की तैयारियां जोर शोर से जारी है मगर कान्हा की नगरी होली की खुमारी में डूब चुकी है। 

 कान्हा की नगरी होली की खुमारी में डूबी
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मथुरा। देश भर में रंगो का त्योहार होली की तैयारियां जोर शोर से जारी है मगर कान्हा की नगरी होली की खुमारी में डूब चुकी है। श्रीकृष्ण की जन्मस्थली ब्रज की सभी होलियों के दर्शन होते हैं।इस बार यह होली आठ मार्च को खेली जाएगी।

मथुरा नगरी को तीन लोक से न्यारी कहा जाता है तथा वास्तव में यह ब्रज का हृदय है। इसे न्यारी इसलिए कहा जाता है कि यहां की परम्पराएं निराली हैं। यहां होली जैसा प्रेम का त्योहार भी लाठियों से खेला जाता है तो जेठ यानी बड़े भाई होने के बावजूद बल्देव जी राधा के सामने होली खेलने का प्रस्ताव रख देते हैं। यहां लठामार होली भी कई प्रकार की होती है, जहां बरसाने में लाठियों के प्रहार को चमड़े की बनी ढ़ालों से रोका जाता है वहीं जाव में लाठियों की बौछार को लकड़ी के बने “गर्द्या” से रोका जाता है।

राधारानी की जन्मस्थली रावल एवं मल्लपुरा में लाठियों के प्रहार को टीन की बनी ढाल से रोका जाता है। चाहे मलपुरा हो या रावल, नन्दगांव हो या बरसाना, जाव हो या बठेन सभी स्थानों पर खेली जाने वाली लठामार होली राधा श्यामसुन्दर की होली है।

इस सम्बन्ध में पौराणिक दृष्टांत का जिक्र करते हुए गीता आश्रम वृन्दावन के अधिष्ठाता महामंडलेश्वर डा0 अवशेषानन्द महराज ने बताया कि एक बार श्यामसुन्दर होली के मौसम में राधारानी से होली खेलने के लिए अकेले ही बरसाना पहुंच गए तो राधारानी की सखियों ने उन्हें पकड़ लिया तथा उन्हें अच्छी तरह से रंगकर महिला का रूप देकर नन्दगांव भेज दिया था।

जब नन्दगांव में श्यामसुन्दर के साथी गोपों ने उनसे इस अजीब हालत बनने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि वे अकेले ही बरसाना होली खेलने चले गए थे तथा वहां पर राधा और उनकी सखियों ने उनकी यह हालत कर दी।


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