इंसाफ के 25 साल: जब जर्मनी ने मानी नाजी दौर के बंधुआ मजदूरों के प्रति अपनी जवाबदेही
नाजी शासन के दौरान जबरन काम करने पर मजबूर किए गए लाखों लोगों को मुआवजा देने के लिए जर्मनी ने 25 साल पहले एक फंड बनाया था. हालांकि, कई पीड़ितों का मानना है कि उन्हें इंसाफ मिलने में काफी देर हुई

नाजी शासन के दौरान जबरन काम करने पर मजबूर किए गए लाखों लोगों को मुआवजा देने के लिए जर्मनी ने 25 साल पहले एक फंड बनाया था. हालांकि, कई पीड़ितों का मानना है कि उन्हें इंसाफ मिलने में काफी देर हुई.
जर्मनी का ‘रिमेंबरेंस, रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड फ्यूचर' (ईवीजेड) फाउंडेशन इस जून के महीने में उन कुछ जीवित बचे पीड़ितों को मुआवजा दिए जाने के 25 वर्ष पूरे कर रहा है, जिन्हें नाजी शासन के दौरान बंधुआ मजदूरी करने के लिए विवश किया गया था. हालांकि, कुछ लोगों का कहना है कि यह मुआवजा 1945 में दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने के तुरंत बाद ही मिलना शुरू हो जाना चाहिए था और इसकी रकम भी कहीं ज्यादा होनी चाहिए थी.
ईवीजेड फाउंडेशन के मुताबिक, साल 2001 से 2007 के बीच (जब आखिरी भुगतान किया गया था) दुनिया के करीब 100 देशों में रहने वाले 16.6 लाख पूर्व बंधुआ मजदूरों और उनके कानूनी वारिसों को कुल 4.4 अरब यूरो (यानी लगभग 5.1 अरब डॉलर) का भुगतान किया गया था.
माना जाता है कि 1933 से 1945 के बीच करीब 2.6 करोड़ लोगों को नाजी शासन के लिए जबरन काम करने पर मजबूर किया गया था. इनमें से लगभग आधे लोग दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी की सीमाओं से बाहर, उन यूरोपीय देशों में थे जिन पर नाजियों ने कब्जा कर रखा था. ऐतिहासिक अध्ययनों से पता चलता है कि नाजी दौर में कराई गई जबरन मजदूरी का अगर पूरा और सही हर्जाना दिया जाता, तो उस शुरुआती फंड की रकम 180 अरब से 220 अरब डॉयचे मार्क (यानी लगभग 90 अरब से 112 अरब यूरो) के बीच होनी चाहिए थी.
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ईवीजेड की प्रमुख अंद्रेया डेस्पोट ने कहा, "अगर आप मुझसे निजी तौर पर पूछें कि क्या यह एक बड़ा फंड था? तो मैं कहूंगी कि नहीं, बिल्कुल नहीं. उस अन्याय को देखते हुए तो बिल्कुल भी नहीं. करीब 2.6 करोड़ लोगों ने फैक्ट्रियों, खेतों, चर्चों, निजी घरों और कंपनियों में काम किया था. समाज का शायद ही कोई ऐसा हिस्सा हो जिसे इससे फायदा न हुआ हो. कोई भी यह साफ कह सकता है कि जो नुकसान और शोषण हुआ था, उसकी भरपाई के लिए यह रकम काफी नहीं थी.”
ईवीजेड फाउंडेशन की स्थापना जुलाई 2000 में की गई थी. इसके दो बड़े मकसद थे: पहला, नाजी दौर के बंधुआ मजदूरों को मुआवजा देना और दूसरा, एक ऐसी संस्था के रूप में काम करना जो मानवाधिकारों, लोकतांत्रिक मूल्यों और नाजी शासन के जुल्मों से बचे हुए लोगों के हितों को बढ़ावा देने वाले प्रोजेक्ट की मदद कर सके और उन्हें पैसे दे सके.
इस संगठन को कुल 10.1 अरब डॉयचे मार्क का फंड दिया गया था. इसमें से आधी रकम केंद्र सरकार ने दी थी और बाकी की आधी रकम करीब 6,500 जर्मन कंपनियों के एक संगठन ने जुटाया था, जिसका नाम ‘जर्मन बिजनेस फाउंडेशन इनिशिएटिव' था. इनमें से कई कंपनियां ऐसी थीं (हालांकि सभी नहीं) जिन्होंने नाजी दौर में जबरन मजदूरी कराई थी.
नाजी दौर के गुलामों को मुआवजे का ‘सांकेतिक' महत्व
पश्चिमी जर्मनी ने मुआवजे के कुछ नियम लागू किए थे. जैसे, राजनीतिक, नस्ली या धार्मिक आधार पर प्रताड़ित लोगों के लिए 1953 का ‘फेडरल कॉम्पेन्सेशन एक्ट', लेकिन इन कोशिशों में जबरन काम करने वाले बंधुआ मजदूरों को शामिल नहीं किया गया था. बाद में, 1950 से 1980 के दशक के बीच, जब जनता का दबाव बढ़ा, तो पश्चिमी जर्मनी की कुछ बड़ी कंपनियों ने अपनी मर्जी से बंधुआ मजदूरों को मुआवजे के तौर पर करोड़ों डॉयचे मार्क की रकम दी. लेकिन, यह मुआवजा पूर्वी यूरोप में रहने वाले पीड़ितों को नहीं मिला.
1990 के दशक में इस मुद्दे को लेकर लंबी और मुश्किल बहस चली, क्योंकि शुरुआत में कई जर्मन कंपनियां इस फंड में पैसा देने से साफ मना कर रही थीं और बंधुआ मजदूरी की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं थीं.
पूर्वज नाजी थे ये पता चलने पर जर्मनी में कैसा लगता है
कॉन्स्टैंटिन गोशलेर, रुअर यूनिवर्सिटी बोखुम में इतिहासकार हैं. उन्होंने बताया, "आखिर में, यह मुआवजा सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी या दिखावा बनकर रह गया.” गोशलेर ने साल 2012 में नाजी दौर के बंधुआ मजदूरों के मुआवजे पर अध्ययनों का एक बड़ा संग्रह प्रकाशित किया था.
वह आगे बताते हैं, "पीड़ितों की तरफ से पैरवी करने वाले लोग कह रहे थे कि हमें कम से कम दहाई के आंकड़े में (यानी 10 अरब या उससे ज्यादा) रकम चाहिए. दूसरी तरफ, जो लोग भुगतान कर रहे थे (जर्मन सरकार और कंपनियां) वे कह रहे थे कि हमें ऐसी रकम चाहिए जो ज्यादा से ज्यादा दहाई के आंकड़े तक ही हो यानी 10 अरब से ऊपर न जाए. इस तरह आखिर में 10 अरब डॉयचे मार्क (डीएम) की रकम तय हुई. इस बात से कोई लेना-देना नहीं था कि नुकसान कितना बड़ा हुआ था. यह पूरी तरह से मोलतोल का मनोविज्ञान था.”
सामूहिक मुकदमों से सरकार पर बढ़ा दबाव
इस पूरे मामले में कानूनी दबाव ने भी एक बहुत बड़ी भूमिका निभाई, क्योंकि पीड़ितों के कई समूहों ने सामूहिक मुकदमों (क्लास-एक्शन लॉसूट) की ताकत को पहचानना शुरू कर दिया था, खासकर अमेरिका में.
डेस्पोट ने डीडब्ल्यू को बताया, "यह फैसला पूरी तरह से नैतिकता या इंसानियत के नाते नहीं लिया गया था. वह भी इसका एक हिस्सा था, लेकिन सिर्फ इकलौती वजह नहीं थी. पीड़ितों की तरफ से दशकों तक लंबी मांगों के बाद, जर्मनी पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा था, खासकर अमेरिका और यहूदी संगठनों की तरफ से, जो बड़े पैमाने पर सामूहिक मुकदमों की तैयारी कर रहे थे.”
इन धमकियों और मुकदमों के डर की वजह से आखिरकार जर्मनी को अमेरिका के साथ बातचीत शुरू करनी पड़ी, ताकि भविष्य के लिए कानूनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की जा सके.
मुआवजा मिलने में इतनी देर क्यों हुई?
गोशलेर ने कहा कि जर्मन सरकार को पूर्व बंधुआ मज दूरों को मुआवजा देने में आधी सदी से ज्यादा का समय क्यों लगा, इसके पीछे एक सबसे बड़ी और मुख्य वजह थी. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "पहला कारण था शीत युद्ध. शीत युद्ध के दौरान एक नियम लागू था: हम ‘आयरन कर्टेन' (कम्युनिस्ट देशों की सीमा) के पार कोई पैसा नहीं भेजेंगे. इसका सीधा मतलब यह था कि पश्चिमी जर्मनी ने अपने पूर्वी पड़ोसी देशों, खासकर पोलैंड को कोई भी पैसा भेजने से साफ इनकार कर दिया था.”
गोशलेर ने कहा कि दूसरा कारण यह था कि पूर्वी यूरोप में जबरन मजदूरी कराए गए लोगों को अक्सर अपने ही देशों में शक की निगाह से देखा जाता था. इसलिए, उनके खुद के घर में उनका साथ देने वाले लोग बहुत कम थे.
उन्होंने कहा, "पूर्व सोवियत संघ के इन बंधुआ मजदूरों को ‘सहयोगी' माना जाता था, जिन्होंने नाजी युद्ध-व्यवस्था के लिए काम किया था. इनमें काफी संख्या में महिलाएं भी शामिल थीं. जब वे युद्ध के बाद अपने वतन लौटे, तो उन पर शक किया गया. उन्हें जांच और छंटनी वाले ‘फिल्ट्रेशन कैंपों' में भेज दिया गया. उन्होंने बेहद दर्दनाक और बदहाली का जीवन जिया.
गोशलेर का तर्क है कि जब जर्मनी ने आखिरकार इन लोगों को मुआवजा दिया, तब बचे हुए पीड़ितों को उस पैसे से ज्यादा इस बात की परवाह थी कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड में सुधार किया जाए. उन्होंने कहा, "जर्मनी से मिले उस थोड़े-से पैसे से कहीं ज्यादा जरूरी उनके लिए वह सर्टिफिकेट था, जिसने आधिकारिक तौर पर यह साबित कर दिया कि वे पीड़ित थे, गद्दार या देशद्रोही नहीं.”
मानवाधिकार और लोकतंत्र की रक्षा
जबरन मजदूरी कराए गए कई लोग आज भी जिंदा हैं. ‘ज्यूइश क्लेम्स कॉन्फ्रेंस' के मुताबिक, दुनिया भर में अब भी करीब दो लाख पीड़ित यहूदी जीवित हैं. इसके अलावा, कई लाख पूर्वी यूरोपीय नागरिक, रोमा और सिंती (बंजारा समुदाय) के लोग और वे पूर्व राजनीतिक कैदी भी हैं जिन्हें नाजियों ने जबरन काम करने पर मजबूर किया था. हालांकि, बाद वाले इन समूहों (गैर-यहूदियों) की सटीक संख्या कभी पता नहीं चल पाई.
भले ही मुआवजे के दावों का भुगतान बहुत पहले ही पूरा हो चुका है, लेकिन ईवीजेड फाउंडेशन का काम आज भी जारी है. आज के समय में ईवीजेड एक चैरिटेबल संस्था बन चुका है, जो मानवाधिकारों, लोकतांत्रिक मूल्यों और ऐतिहासिक व राजनीतिक शिक्षा को बढ़ावा देने वाले प्रोजेक्ट की मदद करता है और उन्हें पैसा देता है.
डेस्पोट के मुताबिक, आज के समय में ईवीजेड फाउंडेशन का मुख्य मकसद नाजी दौर की यादों को जर्मनी की संस्कृति और चेतना में जिंदा रखना है. खासकर जबरन मजदूरी कराने वाली उन योजनाओं की याद को जिंदा रखना है जिससे जर्मनी की हजारों कंपनियों ने भारी मुनाफा कमाया था.
साल 2025 में, यूक्रेन का समर्थन करने की वजह से रूस की सरकार ने ईवीजेड को एक ‘अवांछित संगठन' घोषित कर दिया. डेस्पोट ने कहा, "यूक्रेन, बेलारूस और रूस, ये सभी देश नाजियों के उस क्रूर नरसंहार और शोषण के दौर से बुरी तरह प्रभावित हुए थे. हम इन सभी देशों को अपने काम में साझेदार के तौर पर देखते थे. आज यूक्रेन के खिलाफ रूस की यह जंग सिर्फ सीमाओं की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह यूक्रेन की पहचान और उसके इतिहास पर भी एक हमला है. अब, ईवीजेड उन रूसी और बेलारूसी संगठनों की मदद करता है जिन्हें उनकी सरकारों ने देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया है.


