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भूपेंद्र सिंह हुड्डा को हाई कोर्ट से 'क्लीन चिट', एजेएल जमीन मामले में सीबीआई कोर्ट का आरोप तय करने का आदेश रद
जस्टिस त्रिभुवन दहिया की एकल पीठ ने अपने विस्तृत आदेश में स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है, जिसके आधार पर याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही आगे बढ़ाई जा सके। इसके साथ ही विशेष अदालत द्वारा तय किए गए आरोपों और उससे उपजी सभी आगामी कार्यवाहियों को भी रद्द कर दिया गया।

चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और गांधी परिवार से जुड़ी कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) को पंचकूला प्लॉट पुनः आवंटन मामले में बड़ी राहत दी है। अदालत ने भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश से जुड़े आरोपों को निरस्त करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत सामग्री प्रथमदृष्टया भी आरोपों के आवश्यक तत्वों को स्थापित नहीं करती।
जस्टिस त्रिभुवन दहिया की एकल पीठ ने अपने विस्तृत आदेश में स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है, जिसके आधार पर याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही आगे बढ़ाई जा सके। इसके साथ ही विशेष अदालत द्वारा तय किए गए आरोपों और उससे उपजी सभी आगामी कार्यवाहियों को भी रद्द कर दिया गया।
विशेष सीबीआई अदालत के आदेश पर रोक
हाई कोर्ट ने 16 अप्रैल 2021 को पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत द्वारा पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें हुड्डा और एजेएल के खिलाफ आरोप तय किए गए थे और डिस्चार्ज अर्जी खारिज कर दी गई थी। विशेष अदालत ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश) और 420 (धोखाधड़ी) के तहत आरोप तय किए थे। साथ ही भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराओं को भी लागू किया गया था।
हाई कोर्ट ने कहा कि आरोप तय करने के लिए आवश्यक न्यूनतम मानक भी इस मामले में पूरे नहीं होते। अदालत के अनुसार, अभियोजन द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज और परिस्थितियां किसी आपराधिक मंशा या अवैध लाभ को स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं करतीं।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 2005 में पंचकूला में एक भूखंड के पुनः आवंटन से जुड़ा है। एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड को हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (तत्कालीन हुडा) द्वारा प्लॉट का पुनः आवंटन किया गया था। सीबीआई ने दिसंबर 2018 में आरोपपत्र दाखिल करते हुए आरोप लगाया था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री और प्राधिकरण के अध्यक्ष के रूप में भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने एजेएल को अवैध लाभ पहुंचाया। जांच एजेंसी का दावा था कि पुनः आवंटन की प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की गई और इससे प्राधिकरण को संभावित वित्तीय हानि हुई। हालांकि, हाई कोर्ट ने इन दावों को पर्याप्त आधारहीन माना।
प्रशासनिक निर्णय को आपराधिक नहीं ठहराया जा सकता
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि संबंधित निर्णय एक सुविचारित प्रशासनिक फैसला था, जिसे प्राधिकरण के अन्य सदस्यों ने भी अनुमोदित किया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल बाद में दिए गए बयानों या आकलनों के आधार पर किसी प्रशासनिक निर्णय को फर्जी या आपराधिक नहीं ठहराया जा सकता। यदि निर्णय सामूहिक रूप से लिया गया था और प्रक्रिया का पालन किया गया था, तो उसे आपराधिक रंग देना न्यायोचित नहीं होगा। अदालत ने यह भी कहा कि पुनः आवंटन के लिए निर्धारित राशि और विस्तार शुल्क का भुगतान एजेएल द्वारा किया गया था। किसी भी पक्ष ने वित्तीय हानि की औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई थी।
जांच की निष्पक्षता पर उठे सवाल
हाई कोर्ट ने सीबीआई की जांच प्रक्रिया पर भी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि केवल उस समय प्राधिकरण के अध्यक्ष रहे हुड्डा को आरोपित बनाना और अन्य सदस्यों को नजरअंदाज करना जांच की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। कोर्ट के अनुसार, यदि निर्णय सामूहिक था, तो केवल एक व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराना उचित प्रतीत नहीं होता। अदालत ने यह भी कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड दुर्भावनापूर्ण मंशा की आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं करता। यह टिप्पणी जांच एजेंसी की भूमिका और उसके आकलन की निष्पक्षता को लेकर महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
संभावित आय बनाम वास्तविक हानि
सीबीआई ने अपने आरोपपत्र में कहा था कि यदि भूखंड का पुनः आवंटन न किया जाता तो प्राधिकरण को अधिक आय हो सकती थी। हाई कोर्ट ने इस तर्क को भी अस्वीकार करते हुए कहा कि केवल संभावित अधिक आय के अनुमान के आधार पर वास्तविक हानि या आपराधिक कृत्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि जब तक ठोस और प्रत्यक्ष वित्तीय नुकसान का प्रमाण न हो, तब तक आपराधिक दायित्व तय करना उचित नहीं है।
अन्य आरोपितों का उल्लेख
इस मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री मोतीलाल बोरा को भी आरोपित बनाया गया था। हालांकि बाद में उनका निधन हो गया। हाई कोर्ट के ताजा आदेश के बाद अब इस मामले में शेष आरोपितों के खिलाफ भी आपराधिक कार्यवाही पर विराम लग गया है।
राजनीतिक और कानूनी महत्व
यह फैसला राजनीतिक और कानूनी दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भूपेंद्र सिंह हुड्डा लंबे समय से इस मामले का सामना कर रहे थे। हाई कोर्ट के इस आदेश से उन्हें बड़ी राहत मिली है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अदालत का यह निर्णय प्रशासनिक फैसलों को आपराधिक जांच के दायरे में लाने की सीमाओं को स्पष्ट करता है। साथ ही यह भी संकेत देता है कि आरोप तय करने से पहले अभियोजन को ठोस और स्पष्ट साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे।
सुप्रीम कोर्ट में अपील का विकल्प
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद सीबीआई के पास सुप्रीम कोर्ट में अपील का विकल्प मौजूद है। हालांकि फिलहाल के लिए विशेष अदालत की कार्यवाही पर पूर्ण विराम लग गया है। इस आदेश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आपराधिक मुकदमे की प्रक्रिया केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों पर आधारित होनी चाहिए। पंचकूला प्लॉट आवंटन मामले में हाई कोर्ट का यह निर्णय न केवल संबंधित पक्षों के लिए राहत भरा है, बल्कि प्रशासनिक निर्णयों और आपराधिक दायित्व के बीच की रेखा को भी रेखांकित करता है।
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