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मजदूरी की तलाश में आधे लोग गांव छोड़ गए, पसरा सन्नाटा

जांजगीर-बलौदा ! सरकार द्वारा मजदूरो व गरीबो के उत्थान के लिए तमाम तरह की योजनाएं संचालित किये जाने का दावा किया जाता है

मजदूरी की तलाश में आधे लोग गांव छोड़ गए, पसरा सन्नाटा
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सरकारी योजनाओं से वंचित परिवार खेती का काम खत्म होते ही मजदूरी की तलाश में पलायन
जांजगीर-बलौदा ! सरकार द्वारा मजदूरो व गरीबो के उत्थान के लिए तमाम तरह की योजनाएं संचालित किये जाने का दावा किया जाता है मगर धरातल पर इसके क्रियान्वयन का हाल क्या है इसकी बनागी बलौदा विकासखण्ड के ग्राम पंचायत खोहा के आश्रिम ग्राम उसलापुर में देखा जा सकता है।
जहां के 70 से 80 फीसदी परिवार मजदूरी के लिए गांव से पलायन कर गया है। जिनके घरो के आगे कंटीले झाड़ी व अन्दर ताला लटका देखा जा सकता है। वही कुछ घरो में बुजुर्ग व्यक्ति जो मजदूरी योग्य नहीं रह गया घर की रखवाली के लिए रूका हुआ है। स्कूली बच्चो की बात की जाये तो कुछ तो परिजनों के हवाले रह जैसे-तैसे पढ़ाई कर रहे है वही कई मां-बाप के साथ पढ़ाई छोड़ परदेश चले गये है। जिला मुख्यालय से मात्र 15 किलो मीटर दूर बलौदा विकासखण्ड के ग्राम पंचायत खोहा के आश्रित गांव उसलापुर जो कि जगंल व पहाड़ो से घिरा हुआ है इस गांव में सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन कितना हो पा रहा है यह गांव के अधिकांश घरो में लटके ताले बया करता है। गांव मे लोगो की आवाज व बच्चो की किलकारी सुनने को नहीं मिल रहा है 6 सौ की आबादी वाले गांव मे विगत 2 माह मे 80 फीसदी ग्रामीण अपने घरो मे ताला जड़ और बाहर से कांटो से घेर कर परदेश चले गए है। इस विषय मे गांव के 45 वर्षीय राम बहादुर खैरवार का कहना है कि उसलापुर मे निवास करने वाले ग्रामीण के पास पुस्तैनी जमीन नहीं है। यहां की खेतिहर भूमि गौटिया घरानो की है जो अन्यत्र निवास करते है। वे अपनी जमीन को ठेका व अधिया के रूप मे लोगो को कृषि कार्य के लिए देते है, जो कि खेतो से मिलने वाली अनाज पूरे परिवार के पालन पोषण के लिए पर्याप्त नहीं है, केंद्र व राज्य सरकार गरीब मजदूरो और किसानो के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही है परंतु इन योजनाओ से उसलापुर निवासियो को कोई सरोकार नहीं है। शासकीय उचित मूल्य की दुकान भी इस गांव में नहीं खुल पाई है और 5 किलो मीटर दूर खैजा पैदल चलने के बाद बड़ी मुश्किल से उन्हे अनाज मिल पाता है। इस गांव मे रहने वाले युवा शिक्षा से दूर है, जिसके कारण शासकीय नौकरी उनके पल्ले नहीं पड़ पाया है। मुख्य रूप से मजदूरी ही जीवकोपार्जन का माध्यम है। श्री खैरवार ने गांव की बदहाली पर प्रकाश डालते हुए आगे बताया कि बीते कई वर्षो से ग्रामीण पलायन की ओर रूख करते आए है, जिस पर शासन ने अब तक कोई सुध नहीं ली है। जबकि प्रदेश के मुखिया कहते फिरते है कि प्रदेश मे अंतिम छोर तक कोई भी भूखा नहीं रहेगा। यह सिर्फ कहने की बात है अगर भूखा नहीं रहता तो गांव का एक भी व्यक्ति गांव छोडऩे के लिए मजबूर नही होता राज्य और केंद्र शासन ने पलायन रोकने के लिए रोजगार गारंटी जैसी योजनाएं प्रारंभ की है, लेकिन इस योजना मे पसीना बहाने से पेट की भूख नहीं मिटती। कई महिनो तक मजदूरी लेने के लिए चक्कर काटना पड़ता है, इस समस्या की वजह से पूर्व मे कई परिवार बिखर गए है। तब से लोगो का रूझान शासकीय योजना से उठ गया और लोग पलायन करने लगे।
कुछ बच्चे परिजनों के पास रूक आते है पढऩे
इस संबंध में प्राथमिक विद्यालय उसलापुर के प्रधान पाठक दिनेश दुबे बताते है कि गांव के ज्यादातर लोग पलायन कर बाहर चले गये है। विद्यालय में 74 की दर्ज संख्या है जिसमें से दर्जन भर बच्चे विद्यालय नहीं आ रहे है। वही कुछ बच्चे परिजनों के यहां रूके है जो विद्यालय आते है।
पलायन के बारे ली जाएगी जानकारी-सीईओ
उसलापुर गांव से हो रहे पलायन के विषय मे बलौदा जनपद पंचायत के प्रभारी मुख्य कार्यपालन अधिकारी जीआर राठौर ने जानकारी नहीं होने की बात कही साथ ही कहा कि गांव की समस्याओ से लेकर पलायन के विषय मे सरपंच और ग्रामीणो से चर्चा कर समस्या का निराकरण की कोशिश की जावेगी।


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