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सरकार की आधी-अधूरी पहल

देश में कोरोना की तीसरी लहर अपने मामूली असर के साथ बीत गई, लेकिन अब चौथी लहर का खतरा तेजी से मंडरा रहा है। पिछले कुछ दिनों से कोरोना के मामले बढ़ने की खबर आ रही है। हालांकि हालात दूसरी लहर जैसे घातक नहीं हैं, न ही अब अस्पतालों के बाहर इलाज के लिए मारामारी की नौबत है।

सरकार की आधी-अधूरी पहल
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देश में कोरोना की तीसरी लहर अपने मामूली असर के साथ बीत गई, लेकिन अब चौथी लहर का खतरा तेजी से मंडरा रहा है। पिछले कुछ दिनों से कोरोना के मामले बढ़ने की खबर आ रही है। हालांकि हालात दूसरी लहर जैसे घातक नहीं हैं, न ही अब अस्पतालों के बाहर इलाज के लिए मारामारी की नौबत है।

पिछले साल लगभग इसी वक्त देश ने जीता-जागता नर्क भुगत लिया है। यह तो आम आदमी की अपनी संघर्ष क्षमता और इच्छा शक्ति थी कि देश उस कठिन दौर को पार करके निकल आया है। क्योंकि सरकार ने तो उस वक्त हाथ खड़े ही कर दिए थे। तब एक दिन नहीं बीतता था जब कहीं न कहीं से सरकारी स्तर पर कुप्रबंधन या लापरवाही की खबरें न आती रही हों।

आम जनता ही नहीं, बहुत से खास लोगों ने भी सरकार की अदूरदर्शिता और हालात संभालने में अक्षमता को लेकर सवाल खड़े किए थे। लेकिन भाजपा सरकार ने फिर भी ईमानदारी से जिम्मेदारी निभाने का जज्बा नहीं दिखाया, बल्कि अपनी नाकामी पर लीपापोती करने में ही ढेर सारी ऊर्जा खर्च कर दी। न कभी मौत के सही आंकड़े सामने आए न उन मौतों के सही कारण का खुलासा हुआ। बहरहाल, उस दौर के जख्म आज भी बहुत से लोगों के लिए आज भी भरे नहीं हैं। इसलिए जब तीसरी लहर आई, तब भी डर का थोड़ा माहौल बना और अब चौथी लहर को लेकर भी घबराहट दिख रही है।

अच्छा है कि इस बार केंद्र सरकार ने समय पर कदम उठाने की कवायद शुरु कर दी है। लॉकडाउन जैसे मुश्किल फैसले तो सरकार अब लेगी नहीं, क्योंकि इससे अर्थव्यवस्था इस तरह टूट चुकी है, जो न जाने कब संभलेगी। सरकार इस बात को खुलकर स्वीकार नहीं कर रही है कि लॉकडाउन के कारण देश में महंगाई, बेरोजगारी और गरीबी सब में इजाफा हुआ है। लेकिन दोबारा इस तरह के फैसले लागू करने से बचना इस बात की पुष्टि करता है कि सरकार को कहीं न कहीं अपनी गलती का अहसास है।

बहरहाल, देश में चौथी लहर के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए देश में कोविड-19 की स्थिति पर राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ समीक्षा बैठक की। प्रधानमंत्री ने इस बैठक में कहा कि स्पष्ट है कि कोरोना की चुनौती अभी पूरी तरह टली नहीं है। उन्होंने कहा कि बीते 2 वर्षों में कोरोना को लेकर ये हमारी 24वीं बैठक है। कोरोना काल में जिस तरह केंद्र और राज्यों ने मिलकर काम किया है और जिन्होंने कोरोना के खिलाफ देश की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई है, मैं सभी कोरोना वॉरियर्स की प्रशंसा करता हूं। पिछले 2 हफ्तों से मामले जो बढ़ रहे है, उससे हमें सावधान रहना है। इसके आगे श्री मोदी ने टीकाकरण, अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाएं और कोरोना से बचाव के लिए अपनाए जा रहे उपायों पर चर्चा की। देश मुश्किल घड़ी में एकजुट होकर खड़ा है, राजनैतिक हितों से परे होकर प्रधानमंत्री सभी राज्यों के साथ संकट से निपटने की चर्चा कर रहे हैं, अभी यह भरम बन ही रहा था कि प्रधानमंत्री ने पेट्रोल-डीजल की महंगी दरों की बात करते हुए गैरभाजपा शासित राज्यों पर तोहमत लगा दी कि ये राज्य वैट कम नहीं कर रहे हैं।

नरेंद्र मोदी ने कहा कि पेट्रोल डीजल की बढ़ती कीमत का बोझ कम करने के लिए केंद्र सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में पिछले नवंबर में कमी की थी। इसके साथ ही राज्यों से भी अपील की गई थी कि वे अपना टैक्स कम करें, जिसके बाद कुछ राज्यों ने तो वैट में कमी की, लेकिन कुछ राज्यों ने अभी टैक्स में कमी नहीं की है। ये राज्य महाराष्ट्र, बंगाल, तेलंगाना, आंध्र प्रद्रेश, केरल, झारखंड, तमिलनाडु राज्य शामिल हैं। ये सभी राज्य गैर-भाजपा सरकार वाले राज्य हैं।

इस वक्तव्य के साथ ही प्रधानमंत्री ने जतला दिया कि उनके लिए राजनैतिक हितों से पहले कुछ नहीं है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में किस तरह उछाल आया है, इसे पूरे देश ने भुगता है। लेकिन इस पर केवल गैरभाजपाई दलों से शासित सात राज्यों का नाम लेने का क्या औचित्य। क्या केवल इन राज्यों की जनता को महंगाई तीर सी चुभ रही है। क्या देश के बाकी राज्यों में हालात अच्छे हैं। पेट्रोल-डीजल के दामों पर विधानसभा चुनावों तक रोक लगी हुई थी। हालांकि रूस और यूक्रेन के बीच लड़ाई तब भी छिड़ी हुई थी, लेकिन दाम नहीं बढ़ रहे थे। फिर चुनाव परिणाम 10 मार्च को आए और दामों के बढ़ने का सिलसिला शुरु हुआ।

22 मार्च से अब तक 14 बार तेल के दाम बढ़े हैं। फिलहाल 6 अप्रैल से दाम स्थिर हैं, लेकिन ये राहत कब तक रहेगी, कोई नहीं जानता। सरकार रूस-यूक्रेन की जंग को दामों में बढ़ोतरी का जिम्मेदार बता रही थी, अब राज्यों पर वैट न घटाने का दोष लगा दिया गया है। जबकि सच ये है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें तेल कंपनियां तय कर रही हैं। जो केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय के अधीन काम करती हैं। उसमें राज्य अपना टैक्स वसूलते हैं, और पेट्रोल पंप इसकी भरपाई आम उपभोक्ता से करते हैं।

प्रधानमंत्री यह तो कह रहे हैं कि राज्य अपना वैट छोड़ें लेकिन तेल कंपनियों से दामों पर अंकुश लगाने नहीं कह रहे हैं। तेल की कीमतों का असर हर चीज पर पड़ता है, जिस कारण महंगाई बेतहाशा बढ़ी है। पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क से सरकार 26 लाख करोड़ रुपये कमा चुकी है, लेकिन इसके बावजूद राज्यों को जीएसटी का बकाया नहीं दे रही, ये आरोप अब विपक्षी दल केंद्र सरकार पर लगा रहे हैं।

भाजपा बनाम विपक्ष की इस लड़ाई में किसका पलड़ा भारी रहेगा, ये तो कहा नहीं जा सकता। मगर आम जनता के लिए राहत की कहीं कोई किरण नहीं दिख रही है। उसे महंगा पेट्रोल-डीजल भी खरीदना ही है और दोगुनी-चौगुनी कीमतों पर सब्जी-अनाज-दूध भी खरीदना ही है। जनता के इन कष्टों को दूर किया जा सकता था, अगर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर केंद्र सरकार राज्यों के साथ मिलकर काम करती। मगर अभी आधी-अधूरी पहल से अच्छे दिनों की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती।


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