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बिहार में घर पर रहकर श्रद्धालु मना रहे गंगा दशहरा

कोरोना महामारी से सचेत और सतर्क बिहार के श्रद्धालु सोमवार को गंगा दशहरा के अवसर पर अपने-अपने घरों में ही पूजा-अर्चना कर रहे हैं।

बिहार में घर पर रहकर श्रद्धालु मना रहे गंगा दशहरा
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पटना। कोरोना महामारी से सचेत और सतर्क बिहार के श्रद्धालु सोमवार को गंगा दशहरा के अवसर पर अपने-अपने घरों में ही पूजा-अर्चना कर रहे हैं।

गंगा नदी की महत्ता को देखते हुए ‘गंगा दशहरा’ ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि को मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था। इस दिन गंगा स्नान, गंगा जल का प्रयोग और दान करना विशेष लाभकारी होता है। इस दिन गंगा की आराधना करने से पापों से मुक्ति मिलती है। कहा जाता है कि गंगा में डुबकी लगाने से 10 पापों से छुटकारा मिल जाता है। आम तौर पर आज के दिन श्रद्धालु गंगाघाट पर पूजा करते हैं और फिर पानी में डुबकी लगाते हैं।

इस कोरोना की महामारी की रोकथाम के लिए रियायत के साथ जारी लॉकडाउन के चलते ज्यादातर जगहों पर लोग अपने घरों में ही रहकर इस पर्व को मना रहे हैं। हालांकि लॉकडाउन में थोड़ी रियायत का असर गंगा दशहरा पर्व पर दिख रहा है और कुछ जगहों पर गंगा किनारे बने घाटों पर श्रद्धालु पूजा के लिए पहुंच रहे हैं और कोरोना संकट से मुक्ति के लिये मां गंगा से प्रार्थना कर रहे हैं।

गंगा दशहरा भारत के कुछ अहम राज्यों में बड़े धूम धाम से मनाया जाता है, ज्यादातर ऐसे राज्यों में यह मनाया जाता है जहां से गंगा हो कर जाती है। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में गंगा दशहरा बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष के दसवें दिन ही गंगा धरती पर अवतरित हुईं थी। यह त्यौहार पूरे 10 दिन तक चलता है और दसवें दिन गंगा नदी के किनारे मां गंगा की आरती, पूजन और कथा की जाती है।

भारतीय ज्योतिष विज्ञान परिषद के सदस्य कर्मकांड विशेषज्ञ ज्योतिषाचार्य पंडित राकेश झा ने “यूनीवार्ता ” को दूरभाष पर स्कन्द पुराण का हवाले से बताया कि ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को संवत्सरमुखी की संज्ञा दी गई है। इस दिन गंगा स्नान और दान बहुत ही पुण्यप्रद माना गया है। स्मृति ग्रंथ के मुताबिक गंगा दशहरा के दिन गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान एवं दान करने से दस महापातकों (तीन कायिक, चार वाचिक और तीन मानसिक) के बराबर का पाप से मुक्ति मिलती है। इस दिन हस्त नक्षत्र, सिद्धियोग के साथ रवियोग के होने से ग्रह-गोचरों का युग्म संयोग बन रहा है। उन्होंने भविष्य पुराण के हवाले से बताया कि गंगा दशहरा के दिन स्नान, पूजा के बाद ‘ॐ नारायण्यै दशहरायै गंगायै नमः’ का दस बार जाप करने से कर्ज तथा कलंक के दोष से मुक्ति एवं अनंत पुण्यफल की प्राप्ति होती है।

पंडित झा ने वराह एवं शिव पुराण का हवाला देते हुए बताया कि गंगा दशहरा के दिन सत्तू, पंखा, ऋतुफल, सुपारी, गुड़, जल युक्त घड़ा के दान से आरोग्यता, समृद्धि और वंश वृद्धि का वरदान मिलता है। इस दिन स्नान के बाद दस दीपों की दान करने से पितरो को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन गंगा ध्यान व स्नान से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, ईर्ष्या, ब्रह्महत्या, छल, कपट, परनिंदा जैसे पापों से मुक्ति होती है।गंगा दशहरा के दिन गंगा को स्वच्छ रखने का संकल्प लेना चाहिये इसे साफ-सुथरा रखेंगे, गंदगी या पूजन अवशेष नहीं डालेंगे। इससे मां गंगा का अस्तित्व बना रहेगा। गंगा की सबसे बड़ी पूजा उसकी निर्मलता को बरकरार रखने की है।

गंगा दशहरा पर्व को गंगा अवतरण भी कहा जाता है, हिन्दू मान्यताओं और पोराणिक कथाओं के अनुसार इसी दिन गंगा स्वर्ग से उतरकर धरती पर आई थी। पुराणों के अनुसार, गंगा पहले स्वर्ग में बहती थी। ऋषि भागीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर आने को मनाने के लिए वर्षों तक गहन ध्यान किया। और देवी के रूप में पृथ्वी पर लाया गया था। तब से ही उस दिन को ‘गंगा दशहरा’ के तौर पर मनाया जाता है।

मान्यता है कि राजा सगर और उनके 60,000 पुत्र ऋषि कपिला के श्राप के कारण मारे गए थे। सगर के महान पौत्र, भगीरथ अपने पूर्वजों के लिए एक समारोह आयोजित करना चाहते थे लेकिन पानी नहीं था। राजा भागीरथ की कठिन तपस्या के कारण ही पृथ्वी पर गंगा मैया का अवतरण संभव हो पाया था लेकिन पृथ्वी के अंदर गंगा के वेग को सहने की शक्ति न होने के कारण भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं के बीच स्थान दिया, जिससे एक धारा के रूप में पृथ्वी पर गंगा का जल उपलब्ध हो सके। गंगा मैया को पृथ्वी पर लाने में भगवान शिव का भी महत्वपूर्ण योगदान है।

गंगा दशहरा के अवसर पर दस दिन में गंगा किनारे मेला लगता है। श्रद्धालु गंगा की आरती करते हैं और गंगा स्नान करते है। मेले का आयोजन बड़े पैमाने पर होता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु इस पर्व में हिस्सा लेते हैं। हरिद्वार, वाराणसी, प्रयागराज और ऋषिकेश प्रमुख शहर हैं जहां गंगा दशहरा पर्व के मेले का आयोजन किया जाता है। इसी दिन कई शहर मथुरा, वृन्दावन और बटेश्वर में यमुना नदी की भी आरती की जाती है और पतंगे भी उड़ाई जाती है।

इस दिन लस्सी, शर्बत और शिकंजी का दान और प्रसाद के रूप में सेवन किया जाता है। इसके अलावा तरबूज, खरबूज और सत्तू का दान और सेवन भी किया जाता है। हरिद्वार और वाराणसी जैसे शहरों में तो यह त्योहार बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है। वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर दीये गंगा नदी में प्रवाहित किए जाते हैं और गंगा महा आरती का आयोजन किया जाता है। पटना के गांधी घाट और अदालत घाट पर भी महा आरती और फूलों की माला अर्पित की जाती है।


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