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ललित सुरजन की कलम से- वंशवाद चिरजीवी हो ! - 2

इतिहास के अध्येता जानते हैं कि कांग्रेस के 1950 के नासिक अधिवेशन के दौरान पंडित नेहरू के नेतृत्व को चुनौती देने की पूरी तैयारी कर ली गई थी

ललित सुरजन की कलम से- वंशवाद चिरजीवी हो ! - 2
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इतिहास के अध्येता जानते हैं कि कांग्रेस के 1950 के नासिक अधिवेशन के दौरान पंडित नेहरू के नेतृत्व को चुनौती देने की पूरी तैयारी कर ली गई थी। उस वक्त बंबई से नासिक की यात्रा करते हुए जनता ने पंडितजी का जैसा अद्भुत स्वागत किया उससे सबको यह समझ आ गया कि पंडित नेहरू अप्रतिम जननायक हैं एवं उन्हें अपदस्थ करना कांग्रेस के लिए अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा।

सन् 1951 में एक बार फिर पंडित नेहरू के नेतृत्व को चुनौती देने की योजना बनी। तत्कालीन सीपी एंड बरार प्रांत के गृहमंत्री पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र ने पंडित नेहरू के खिलाफ खुला बयान दिया। योजना थी कि आठ मुख्यमंत्री उनके समर्थन में सामने आएंगे और बदलाव को अंजाम दिया जा सकेगा, लेकिन जनसामान्य में एवं कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच मिश्राजी के बयान की प्रतिकूल प्रतिक्रिया हुई। उन्हें पीछे से प्रश्रय देने वाले नेताओं के हाथ-पांव फूल गए। परिणामत: मिश्रजी को बलि का बकरा बनाते हुए पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। वे 1952 में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़े और बुरी तरह हारे। आगे चलकर 1962 में इंदिराजी ने उनका पुनर्वास किया।

1954 व 56 इत्यादि वर्षों में भी पंडित नेहरू ने स्वेच्छा से पद त्याग की पेशकश की। भारतीय जनमानस ने इसे स्वीकार नहीं किया। उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहोवर तक ने नेहरूजी को निजी पत्र लिखा कि विश्व के राजनीतिक मंच पर आपकी सेवाओं की आवश्यकता है और आपको इस्तीफा देने के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए। अमेरिकी और सोवियत- इन दो ध्रुवों के बीच नेहरू के नेतृत्व में भारत जो संतुलनकारी भूमिका निभा रहा था उसका महत्व विश्व समुदाय जान रहा था।
(देशबन्धु में 30 अक्टूबर 2014 को प्रकाशित)


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