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फिल्म रिव्यु - छिछोरे 

हिंदी सिनेमा में दोस्ती के ऊपर अभी तक जितनी भी फिल्में बनी है उन सबने ही सफलता का मज़ा चखा है

फिल्म रिव्यु - छिछोरे 
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-सुनील पाराशर

हिंदी सिनेमा में दोस्ती के ऊपर अभी तक जितनी भी फिल्में बनी है उन सबने ही सफलता का मज़ा चखा है और इस तरह की फिल्में हमेशा ही युवाओं को आकर्षित करती है खासकर वो दोस्ती जो कॉलेज हॉस्टल में गुज़ारी हो, क्योंकि वहां के अनुभव इंसान को पूरी ज़िन्दगी याद रहते है और कहीं न कहीं उनको मुश्किल समय में मजबूत बनाते है, ऐसी ही एक फिल्म लेकर आये दंगल के निर्देशक नितेश तिवारी जिसका नाम है "छिछोरे"।

इस फिल्म का नाम कुछ और होता तो और अच्छे फैमिली दर्शक भी मिल सकते थे, इसी से पता चलता है की फिल्म का नाम ऐसा होना चाहिए जो हर वर्ग और उम्र को खींच सके। नितेश ने फिल्म को बहुत ख़ूबसूरती से बनाया है और कॉलेज लाइफ को बखूबी दिखाया है। इस सप्ताह रिलीज़ फिल्मों में छिछोरे के साथ रिलीज़ हुई है हॉलीवुड की फिल्म "इट" जो एक हॉरर और सस्पेंसफुल फिल्म है।
फिल्म रिव्यु - छिछोरे

कलाकार - सुशांत सिंह राजपूत, श्रद्धा कपूर, वरुण शर्मा, प्रतीक बब्बर, ताहिर राज भसीन, सहर्ष शुक्ला, रोहित चौहान, तुषार पांडे और नवीन पॉली शेट्टी

कहानी - फिल्म की शुरुआत होती है एक ऐसे कपल से जो काफी समय पहले डाइवोर्स ले चुके है जिनका एक बेटा है राघव यानि समद, जिसे पाला है एक सिंगल पैरेंट अनिरुद्ध यानि सुशांत सिंह राजपूत ने, जो उसकी हर ज़रूरत को और हर अच्छी बुरी चीज़ो को जानता समझता है, राघव जो पढ़ाई लिखाई में बहुत होनहार है लेकिन इनदिनों वो अपने करियर पर ध्यान देने के लिए एंट्रेंस एग्जाम की तैयारी कर रहा है जिसकी वजह से वो प्रेशर में है।

अनिरुद्ध जानता है की वो एग्जाम क्लियर कर लेगा और वो अपने बेटे से प्रॉमिस करता है की वो इसका एक शानदार सेलिब्रेशन करेगा, लेकिन राघव एग्जाम क्लियर नहीं कर पाता जिसकी वजह से वो अपने आपको एक लूज़र समझने लगता है और यहाँ तक की एक बिल्डिंग से कूदकर जान देने की कोशिश करता है जिसकी वजह से उसे कई जगह गहरी चोट आ जाती है। हॉस्पिटल में लेटे अपने बेटे को देखते हुए और उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए वो अपनी कॉलेज लाइफ को अपने बेटे से शेयर करता है और बताता है की वो कितना बड़ा लूज़र था और उसके दोस्त भी लूज़र में अव्वल नंबर थे।

उस कहानी में उसके दोस्त सेक्सा यानि वरुण शर्मा, डेरेक यानि ताहिर राज भसीन, एसिड यानि नवीन पॉलीशेट्टी, बेवड़ा यानि सहर्ष शुक्ला, क्रिस क्रॉस यानि रोहित चौहान, मम्मी यानि तुषार पांडे जैसे दोस्तों की टोली थी। इसमें डेरेक जो गाली देने में माहिर है तो बात बात में मम्मी को याद करने वाला मम्मी और हमेशा दारू पीने के लिए तैयार बेवड़ा ऐसी ऐसी हरकते करते है जिससे दर्शक ताली बजाए बिना नहीं रह पाते।

इस फिल्म में सीनियर के रूप में रेजी यानि प्रतीक बब्बर है जोकि रैगिंग को भी बढ़िया तरीके से निभाते है। शुरू शुरू में राघव अपने पिता की स्टोरी को सुनकर रिस्पॉन्ड करता है। फिर अनिरुद्ध अपनी और माया यानि श्रद्धा कपूर की कहानी बताता है की कैसे उसे प्यार हो जाता है और यह प्यार शादी तक पहुंचता है और फिर डायवोर्स तक। अब देखना यह है की अनिरुद्ध की कहानी से राघव कितना ठीक हो पाता है क्योंकि फिल्म को वर्तमान और भविष्य में झूझती हुई कहानी है जिसमें प्यार मोहब्बत और मस्ती के अलावा संवेदनशील भी है जो कहीं कहीं आपकी आँखों को नम कर जाती है।

निर्देशन - नितेश तिवारी ने दंगल फिल्म बनाकर ही स्वयं को साबित कर दिया था की वो बेहतर फिल्म बनाने में माहिर है और छिछोरे बनाकर उन्होंने साबित कर दिया की वो एक सुलझे हुए निर्देशक है जो अपनी बात को कहने का मद्दा रखते है। इस फिल्म में भी उन्होंने मनोरंजन के साथ साथ एक संदेश भी दिया है की अगर इंसान कुछ करना चाहे तो कर सकता है जो उनके किरदारों को और अच्छे से दिखाता है। कॉलेज की ज़िन्दगी को आज से पहले के दशक में देखना और वहां के माहौल और कॉलेज लाइफ को दिखाना बहुत ही अच्छा लगता है। साथ ही अपने किरदारों से सही एक्टिंग करवा लेना नितेश अच्छी तरह जानते है।

एक्टिंग - जहाँ तक एक्टिंग का सवाल है यह फिल्म कई किरदारों को एक साथ जगह देती है खासकर सुशांत सिंह राजपूत को, जिनके बारे में कहा जा सकता है की वो अपनी अदाकारी में कहीं भी उन्नीस नज़र नहीं आते और वो अपनी फिल्म के हर करैक्टर को बखूबी जीते है, काई पो चे से आज तक जितनी भी फिल्म उन्होंने की है उसमें अपनी अदाकारी, डांस और एक्सप्रेशन से सभी का दिल जीता है। श्रद्धा को इस फिल्म में स्पेस कम ही मिला है लेकिन जितना मिला है उसमें अच्छा काम किया है और वो देखने में भी अच्छी लगी है। वरुण शर्मा अपने चूचा वाले किरदार में ही नज़र आते है। बाकि सभी कलाकारों ने भी अपने किरदारों को बखूबी जिया है। ग्रे शेड लिए प्रतीक बब्बर भी खूब जमे है और उनके चेहरे पर इस तरह के रोल जमते है।

गीत संगीत - फिल्म में संगीत प्रीतम का है लेकिन कोई भी गीत अभी तक जबान पर नहीं चढ़ा है जबकि ऐसी फिल्मों का गीत संगीत ज्यादा अच्छा होना चाहिए।
कुलमिलाकर इस मेलो ड्रामा फिल्म को जितने भी दर्शक मिले उन सबने फिल्म की काफी तारीफ की है लेकिन फिल्म को थोड़ा छोटा किया जा सकता था।
फिल्म समीक्षक


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