फ़िल्म 'चक्र' (1981) : रबिन्द्र धर्मराज
सभ्यता के विकासक्रम में नगरों का विकास अनिवार्य रूप से हुआ

- अजीत चंद्रवंशी
इस तरह महानगरों में एक बड़ी आबादी लगभग 'आवास विहीन' स्थिति में जीवन जीती रहती है। ये क्षेत्र राजनीति के 'खेल' के क्षेत्र भी होते हैं। राजनीतिज्ञ आवास और सुविधाएं देने के बड़े-बड़े वादे करके जाते हैं, मगर स्थिति ऐसी ही रहती है।
सभ्यता के विकासक्रम में नगरों का विकास अनिवार्य रूप से हुआ। बाज़ार-विनिमय के केंद्र नगर के रूप में विकसित होते गए। नगर प्रशासन के केंद्र भी रहे हैं, इसलिए वहां तमाम नागरिक सुविधाएं पहले-पहल उपलब्ध होती रही है। उद्योग और व्यापार के केंद्र के कारण रोजगार की उपलब्धता भी यहां बढ़ी जिसके कारण आस-पास के ग्रामीण भी नगर की ओर आकर्षित
होते रहें।
नगरों में सब सुविधाएं तो होती हैं मगर जगह की कमी होती है,इसलिए जनघनत्व अत्यधिक होता है। जो थोड़ी-बहुत जगहें होती हैं इस पर 'पैसे वालों' की ही पहुँच हो पाती है। बहुसंख्यक जनता छोटे-छोटे कमरों में किसी तरह निर्वाह करती है।मगर मजदूर वर्ग को इतना भी नसीब नहीं होता और अधिकांशत: झोपड़-पट्टियों में जीवन निर्वाह करते हैं।
इधर नगर, महानगर बन गए तो झोपड़-पट्टियों की संख्या घटने के बजाए बढ़ती गई। बड़े-बड़े 'स्लम एरिया' बन गए जहां जिंदगियां घसीट रही हैं। बावजूद इसके यहां आने वालों की संख्या कभीकम नहीं होती। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि की बर्बादी,सीमित आय,बेहतर जीवन की लालसा,जीवन निर्वाह में दिक्कत आदि कई कारणों से लोग शहर आते ही रहते हैं।
इस तरह महानगरों में एकबड़ी आबादी लगभग 'आवास विहीन' स्थिति में जीवन जीती रहती है। ये क्षेत्र राजनीति के 'खेल' के क्षेत्र भी होते हैं। राजनीतिज्ञ आवास और सुविधाएं देने के बड़े-बड़े वादे करके जाते हैं, मगर स्थिति ऐसी ही रहती है।
मगर जीवन है कि अपनी राह बना लेता है।परिस्थिति कैसी भी जीवन जीने के 'तरीके' विकसित हो जाया करते हैं।ज़ाहिर है ये तरीके तथाकथित सभ्य समाज से भिन्न होते हैं।अभाव की पूर्ति का भी अपना मनोविज्ञान होता है। जहाँ दोनों जून रोटी मिलने की निश्चिंतता न हो वहां भविष्य की कौन सोचेगा! वहां तो 'आज है तो मौज कर लो कल भले भूखा रहो' का दर्शन ही पनपेगा।
ले देकर झोपड़ी की एक खोली, वहीं सब को गुजर करना है। ऐसे में कहां की प्राइवेसी!न शौचालय, न स्नान घर। नैतिक-अनैतिक,मर्यादा सब धरे रह जाते हैं! बच्चे उम्र से पहले बड़े हो जाते हैं।
ग़रीबी और असुविधा की अपनी एक संस्कृति होती है। मार्क्सवाद की शब्दावली में कहें तो यह 'लम्पट सर्वहारा' की संस्कृति ।मेहनत से पैसा नहीं मिलता,ऊपर से छोटी-छोटी गलती में अपमानित होना पड़ता है, ऐसे में काल्पनिक इच्छापूर्ति का रास्ता ही बचता है!शराब, सेक्स,फिल्मी नकल और हीरोभाव,अराजकता जीवन दर्शन बन जाता है।देहव्यवसाय, नशाखोरी, अवैधशराब,के ये केंद्र बनते जाते हैं।
'सभ्य जीवन' के मापदंड और अभाव के इस द्वंद्व में जो संस्कृति और जीवन दर्शन विकसित होता है वह इन जगहों में देखा जा सकता है,जहां दाहकर्म के बाद शराबनोशी सहज होता है।
ऐसा नहीं कि ग़रीबी की इस 'संस्कृति' में मानवीय संवेदना, प्रेम की चाह या करुणा नहीं होती, मगर वक्त-बेवक्त यह बेबसी उभर ही आती है जिसका ईलाज तो क्या होगा! बस दर्द हद से गुजर कर दवा हो जाता है।
फ़िल्म 'चक्र' के पात्र भी इसी 'महानगरीय स्लम संस्कृति' में जी रहे हैं। कथा 'अम्मा' के इर्द-गिर्द बुनी गई कही जा सकती है। हालांकि फिल्म में 'कहानी' कम परिवेश का दृश्य-चित्रण अधिक है,डाक्यूमेंट्री फ़िल्म की तरह।
'अम्मा' अपने पति के साथ गांव से भागकर आयी थी,क्योंकि ठेकेदार उसके साथ ज्यादती करना चाह रहा था और इस बचाव में अम्मा का पति उसकी हत्या कर देता है। और इस तरह वे महानगर के स्लम एरिया में आ जाते हैं। उसका पति झोपड़ी बनाने के लिए टीन 'चोरी' करते वक्त पुलिस की गोली से मारा जाता है।
'अम्मा' अपने बेटे का किसी तरह पालन पोषण कर इसे बड़ा करती है। इस दौरान पहले 'लुक्का' से उसका सम्बन्ध बनाता है,मगर बाद के दिनों में जब उसका बस्ती में आना कम हो जाता है तो ट्रक डाइवर 'अन्ना' से सम्बन्ध बनाती है।
ह सम्बन्ध जितना दैहिक है उतना ही 'पारिवारिक' सुरक्षा की चाह भी। 'अम्मा' के अन्तस् में इस बस्ती में रहकर भी 'अच्छे' जीवन की चाह है जिसमे कहीं पुलिस का साया न हो।उसके ज़ेहन में बार-बार पति का पुलिस गोली से मारा जाना कौंध जाता है। इसलिए वह अपने बेटे 'बेनवा' को बार-बार 'गैर कानूनी' कामों से दूर रखने का प्रयास करती है। ज़ाहिर है इस माहौल में उसकी सोच बार-बार खंडित होती है।
वह 'लुक्का' को अपने पास रोकने में असफल होकर ही कहीं 'अन्ना' के तरफ आकर्षित होती जान पड़ती है। उसके गर्भ में अन्ना का बच्चा है।यह सुखद अहसास उसे कुछ देर के लिए खुशियों से भर देता है।मगर उसके भविष्य के बारे में सोचकर वह आशंकित हो जाती है। वह इस 'गटर' में बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती और उसके लिए अलग 'झोपड़ी' चाहती है। अन्ना का चरित्र सहज है,वह यथासम्भव सहयोग करता है।
'लुक्का' बिंदास,मस्त-कलंदर 'अपनो' से प्रेम करने वाला व्यक्ति है।पैसा किसी भी तरह कमाता है, ज़ाहिर है 'गैर कानूनी' ढंग से।उसके व्यक्तित्व और पैसे के कारण बस्ती की कई स्त्रियां उसके करीब आती हैं, मगर वह कहीं टिककर रहता नहीं ,और अंतत: अपनी रंगीन मिज़ाजी के कारण संक्रामक बीमारी से ग्रस्त होकर असहाय हो जाता है जिसकी मंज़िल मृत्यु ही है।मगर उसके अंदर करुणा है। किसी क्षण उसे अपनी विडम्बना का बोध भी होता है और वह अपने उस बच्चे को याद करता है जिसका उसने गर्भपात करवा दिया था।मगर जैसे वह यह भी जानता है कि चाहकर भी ऐसी ज़िंदगी से मुक्त नहीं हो सकता।
'बेनवा' किशोर उम्र को पार कर युवावस्था में प्रवेश कर रहा है। 'अच्छा काम' करने का प्रयास करते रहता है,मगर 'मालिकों' के बात-बात पर तिरस्कार और अपमान से उसका विश्वास खंडित होता है और वह 'लुक्का' की राह से आकर्षित होता है जहां 'लुटेरों' से छीनना कोई बुराई नहीं है।
फ़िल्म के क्लाइमेक्स में 'बेनवा' और 'अमली' के विवाह से जैसे स्थिति में सुधार दिखाई पड़ती है,मगर विडम्बना कि जैसे इस दुनिया से कहीं मुक्ति ही नहीं है। पुलिस लुक्का को गिरफ्तार करने आती आती है बचाव करने पर बेनवा को भी पकड़ लेती है। अम्मा को धक्का देने से उनके पेट मे ठोकर लग जाती है और सब कुछ खत्म हो जाता है।उसकी सुनी आँखों मे जैसे फिर अंधेरा छा जाता है।
अमली के जीवन की शुरुआत ही जैसे इस विडम्बना से होती है और एक तरह से वह दूसरी 'अम्मा' बन जाती है। फिर वही जीवन,वही दुनिया! यह 'चक्र' क्या कभी खत्म नहीं होगा? फ़िल्म के आख़िर में प्रशासन द्वारा बस्ती उजाड़ दिया जाता है। बस्तियां अब भी उजाड़ी जाती हैं।मगर जैसे कि फ़िल्म में पार्श्व में यह गीत बजता रहता है
'सर छुपाने को छाया नहीं ना सही
बस ही जाएगी बस्ती कोई फिर नयी
*फ़िल्म जयवंत दलवी के मराठी उपन्यास 'चक्र' पर आधारित है।


