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पश्चिम बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल, ममता बनर्जी की पार्टी में टूट की अटकलें तेज

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के दो विधायकों के निष्कासन के बाद पार्टी में टूट की अटकलें तेज हो गई हैं। राजनीतिक गलियारों में महाराष्ट्र जैसी स्थिति की चर्चा, लेकिन अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल, ममता बनर्जी की पार्टी में टूट की अटकलें तेज
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कोलकाता। पश्चिम बंगाल की सियासत में इन दिनों तृणमूल कांग्रेस (TMC) को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष और हालिया अनुशासनात्मक कार्रवाइयों के बाद राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठने लगा है कि क्या राज्य में भी महाराष्ट्र जैसी राजनीतिक स्थिति देखने को मिल सकती है। हालांकि अब तक किसी भी बड़े नेता या पार्टी की ओर से विभाजन को लेकर आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

हाल ही में पार्टी प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने अपने दो विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया। इस कार्रवाई के बाद राजनीतिक हलकों में अटकलों का दौर और तेज हो गया है। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि पार्टी के भीतर कई विधायक असंतुष्ट हैं, हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

दो विधायकों के निष्कासन से बढ़ी सियासी चर्चा

तृणमूल कांग्रेस द्वारा जिन दो विधायकों पर कार्रवाई की गई, उनमें रीताब्रत बनर्जी और संदीपन साहा के नाम प्रमुख रूप से सामने आए हैं। पार्टी की ओर से जारी पत्र में कहा गया कि दोनों विधायक बार-बार पार्टी नेतृत्व द्वारा बुलाई गई बैठकों में शामिल नहीं हुए और उन्होंने ऐसी गतिविधियों में हिस्सा लिया जो संगठन के हितों के खिलाफ मानी गईं।

पार्टी उपाध्यक्ष चंद्रिमा भट्टाचार्य के हस्ताक्षर वाले पत्र में यह भी कहा गया कि दोनों नेताओं के कुछ सार्वजनिक बयान और कदम तृणमूल कांग्रेस की नीतियों और संगठनात्मक हितों के प्रतिकूल पाए गए। इसके बाद उन्हें तत्काल प्रभाव से प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया गया।

क्या बंगाल में दोहराया जा सकता है महाराष्ट्र मॉडल?

राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा है कि यदि बड़ी संख्या में विधायक किसी नए गुट के साथ जाते हैं, तो राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। महाराष्ट्र में जिस तरह शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में विभाजन के बाद चुनाव आयोग ने पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर फैसले दिए थे, उसी संदर्भ में बंगाल की राजनीति की तुलना की जा रही है।

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी राजनीतिक दल का नाम या चुनाव चिह्न खोने की स्थिति केवल अटकलों से नहीं बनती। इसके लिए कानूनी और संवैधानिक प्रक्रियाओं के तहत चुनाव आयोग द्वारा विस्तृत जांच और निर्णय लिया जाता है।

शिकायतों से शुरू हुआ विवाद

राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता के चयन को लेकर भी विवाद सामने आया है। नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने दावा किया था कि दो तृणमूल विधायकों की शिकायत के आधार पर विधानसभा सचिवालय ने कथित फर्जी हस्ताक्षरों के मामले में कार्रवाई शुरू की।

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि विपक्ष के नेता के चयन से जुड़े समर्थन पत्र में कुछ हस्ताक्षर संदिग्ध थे और पार्टी विधायक दल की बैठक में संबंधित प्रस्ताव पारित नहीं किया गया था। इस मामले को लेकर जांच जारी है और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज हो गया है।

2026 के बाद बदले समीकरण?

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद से राजनीतिक समीकरण लगातार बदल रहे हैं। ऐसे में TMC के भीतर उठ रहे सवाल और विपक्ष के हमले आने वाले समय में राज्य की राजनीति को नई दिशा दे सकते हैं। फिलहाल पार्टी नेतृत्व स्थिति को नियंत्रित बताने की कोशिश कर रहा है, जबकि विपक्ष इसे तृणमूल कांग्रेस के भीतर बढ़ते असंतोष का संकेत बता रहा है।


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