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दो प्रमुख वजहें, जिनकी वजह से बागी सांसद टीएमसी पर कब्जा करने के बजाय नई पार्टी में शामिल हुए

लोकसभा में बहुमत होने के बावजूद तृणमूल कांग्रेस की संसदीय पार्टी पर कब्जा करने की कोशिश करने के बजाय, बागी सांसदों ने त्रिपुरा स्थित 'नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (एनसीपीआई) में शामिल होने का फैसला किया है। यह पार्टी राजनीतिक रूप से लगभग निष्क्रिय मानी जाती है। राजनीतिक जानकारों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि उनकी रणनीति बदलने के पीछे दो प्रमुख कारण रहे।

दो प्रमुख वजहें, जिनकी वजह से बागी सांसद टीएमसी पर कब्जा करने के बजाय नई पार्टी में शामिल हुए
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कोलकाता। लोकसभा में बहुमत होने के बावजूद तृणमूल कांग्रेस की संसदीय पार्टी पर कब्जा करने की कोशिश करने के बजाय, बागी सांसदों ने त्रिपुरा स्थित 'नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (एनसीपीआई) में शामिल होने का फैसला किया है। यह पार्टी राजनीतिक रूप से लगभग निष्क्रिय मानी जाती है। राजनीतिक जानकारों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि उनकी रणनीति बदलने के पीछे दो प्रमुख कारण रहे।

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, पहला कारण पार्टी के संविधान का स्वरूप है, जैसा कि उसे भारत निर्वाचन आयोग को सौंपा गया था। इसी वजह से संभवतः बागी सांसदों की वे कोशिशें नाकाम रहीं, जिनके जरिए वे लोकसभा में तृणमूल की संसदीय पार्टी पर कब्जा करना चाहते थे और बाद में पार्टी के चुनाव चिह्न तथा फंड पर दावा जताना चाहते थे।

तृणमूल कांग्रेस के संविधान के अनुसार, पार्टी के भीतर निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था की पहचान पहले राज्य कार्यकारी समिति (स्टेट एग्जीक्यूटिव कमेटी) के रूप में की गई थी। हालांकि, बाद में संविधान में संशोधन के बाद राष्ट्रीय कार्यसमिति को पार्टी की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था का दर्जा दिया गया। यह समिति काफी हद तक पार्टी अध्यक्ष, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, के इर्द-गिर्द केंद्रित मानी जाती है।

पार्टी के मूल और संशोधित दोनों संविधान के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस में संगठनात्मक पदाधिकारियों का प्रभाव चुने हुए जनप्रतिनिधियों, यानी सांसदों और विधायकों, की तुलना में अधिक माना जाता है।

एक राजनीतिक जानकार ने कहा, "चूंकि राष्ट्रीय कार्यसमिति और संगठन के पदाधिकारी प्रत्यक्ष रूप से ममता बनर्जी तथा अप्रत्यक्ष रूप से उनके भतीजे और पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी के प्रभाव में माने जाते हैं, इसलिए बागी सांसदों के लिए लंबे समय में तृणमूल कांग्रेस की संसदीय पार्टी, चुनाव चिह्न या पार्टी फंड पर नियंत्रण हासिल करना मुश्किल होता। यही वजह है कि बागियों ने अंतिम समय में अपनी रणनीति बदली और त्रिपुरा की एक ऐसी राजनीतिक पार्टी के साथ जुड़ गए, जिसका वास्तविक राजनीतिक प्रभाव बहुत सीमित है।"

सीपीआई (एम) के राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य का मानना है कि इस पूरी योजना के पीछे भारतीय जनता पार्टी का हाथ है। उनके मुताबिक, नई दिल्ली में वरिष्ठ भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर बागी सांसदों की कई बैठकों से यह संकेत मिलता है।

भट्टाचार्य ने कहा, "भाजपा का मुख्य उद्देश्य संसद में महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए बागी तृणमूल कांग्रेस सांसदों का समर्थन हासिल करना है। इसलिए पार्टी ने कोई जोखिम नहीं उठाया और लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस की संसदीय पार्टी पर कब्जा करने की कोशिश जारी रखने के बजाय, बागी सांसदों को किसी नई पार्टी में शामिल कराने की रणनीति अपनाई।"

अब सवाल यह है कि जब पश्चिम बंगाल विधानसभा में पार्टी के 80 में से 60 विधायकों के समर्थन से बहुमत वाला नया गुट बनाने की कोशिश सफल रही, तो बागी सांसदों ने लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस की संसदीय पार्टी के भीतर ऐसा ही बहुमत वाला गुट बनाने की कोशिश क्यों नहीं जारी रखी?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में विधायकों के बागी गुट के बहुमत में आने के बाद ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी ने जो रणनीति अपनाई, उसी के कारण बागी सांसद लोकसभा में वैसी रणनीति नहीं अपना सके।

एक राजनीतिक जानकार ने बताया, "बागी गुट बनने के तुरंत बाद ममता बनर्जी ने पार्टी की सभी पुरानी आंतरिक कमेटियों और तृणमूल कांग्रेस से जुड़े जन-संगठनों की आंतरिक कमेटियों को भंग करने की घोषणा की। इसके बाद उन्होंने उन पार्टी नेताओं के साथ नई आंतरिक कमेटियां बनाने की घोषणा की, जो उनके और उनके भतीजे के प्रति वफादार बने रहे। इस तरह लोकसभा में अपनी संसदीय टीम और पश्चिम बंगाल विधानसभा में अपनी विधायी टीम पर नियंत्रण खोने के बावजूद ममता बनर्जी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति पर अपना नियंत्रण बनाए हुए हैं।"



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