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यूपी में हिंसक प्रदर्शन करने वालों को नहीं मिलेगी सरकारी नौकरी, नियम पर भड़की सपा-कांग्रेस, जेन-जी के समर्थन में उतरीं पार्टियां

यूपी में सरकारी नौकरी के चरित्र सत्यापन नियमों को सख्त करने पर सपा और कांग्रेस ने विरोध जताया। विपक्ष ने इसे युवाओं को डराने वाला कदम बताते हुए सरकार पर निशाना साधा।

यूपी में हिंसक प्रदर्शन करने वालों को नहीं मिलेगी सरकारी नौकरी, नियम पर भड़की सपा-कांग्रेस, जेन-जी के समर्थन में उतरीं पार्टियां
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लखनऊ।उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी की भर्ती के दौरान चरित्र सत्यापन के नियमों को सख्त किए जाने पर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। नए निर्देशों के तहत हिंसक गतिविधियों और व्यवस्था को हिंसा के जरिए बदलने की कोशिश करने वाले संगठनों से जुड़े लोगों के चरित्र की जांच पर विशेष जोर दिया गया है। इस फैसले को लेकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) ने सरकार पर निशाना साधा है। विपक्ष का आरोप है कि इन नियमों के जरिए युवाओं को आंदोलनों में भाग लेने से रोकने और उनकी आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है।

कांग्रेस बोली- युवाओं को डराने की कोशिश

कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि भाजपा युवाओं को हिंसा के नाम पर देशद्रोही ठहराने की कोशिश कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि आंदोलन में भाग लेने वाले युवाओं को नौकरी से वंचित करने की चेतावनी देना लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ है।

राजपूत ने कहा कि देश के युवा अपनी समस्याओं को लेकर आवाज उठाते रहेंगे और सरकार की ऐसी कोशिशों का विरोध किया जाएगा। कांग्रेस ने इसे युवाओं के अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बताते हुए सरकार से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की।

सपा ने बताया ब्रिटिश शासन की याद दिलाने वाला आदेश

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता उदयवीर ने भी इन निर्देशों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि विरोध करने का अधिकार स्वतंत्र भारत में संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है। उनके मुताबिक, इस तरह के आदेश ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की याद दिलाते हैं, जब सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने वालों को दबाने के प्रयास किए जाते थे।

सपा का आरोप है कि सरकार डर और दबाव की राजनीति कर रही है। पार्टी ने कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और असहमति को अपराध की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।

किन अभ्यर्थियों पर लागू होंगे नियम?

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश के विभिन्न विभागों, निगमों और स्थानीय निकायों में भर्ती के दौरान चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया को अधिक सख्त बनाने के निर्देश दिए गए हैं। नियुक्ति विभाग के प्रमुख सचिव एम. देवराज की ओर से जारी निर्देशों में पुलिस को सत्यापन रिपोर्ट 30 दिनों के भीतर देने की बात कही गई है।

निर्देशों के मुताबिक, केवल एफआईआर दर्ज होने या जांच लंबित रहने से किसी अभ्यर्थी को स्वतः अयोग्य नहीं माना जाएगा। हालांकि, संबंधित मामले और अभ्यर्थी की भूमिका की जांच की जा सकती है। पहले से सरकारी सेवा में कार्यरत कर्मचारियों के लिए इस प्रक्रिया को अलग रखा गया है।

तीन साल की अवधि को लेकर भी चर्चा

आदेश में 21 वर्ष की आयु के बाद और जांच की तारीख से पिछले तीन वर्षों के भीतर कुछ निर्धारित गतिविधियों में भागीदारी को लेकर प्रावधान का उल्लेख है। ऐसे मामलों में व्यक्ति की मौजूदा प्रवृत्ति का आकलन किया जा सकता है। हालांकि, नियमों का वास्तविक प्रभाव संबंधित तथ्यों, जांच और लागू प्रावधानों पर निर्भर करेगा।

इस फैसले के बाद सवाल उठ रहे हैं कि चरित्र सत्यापन में पुलिस की भूमिका कितनी निर्णायक होगी और शांतिपूर्ण विरोध तथा हिंसक गतिविधियों के बीच अंतर किस तरह सुनिश्चित किया जाएगा। फिलहाल, इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव तेज हो गया है।


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