टीएमसी के 20 बागी सांसदों का नया ठिकाना बनी NCPI, त्रिपुरा से शुरू हुआ सफर अब पहुंचा संसद तक
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) का दामन थाम लिया है। जानिए क्या है इस छोटी पार्टी का इतिहास, त्रिपुरा से उसका संबंध और इस विलय के राजनीतिक मायने।

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा और अप्रत्याशित घटनाक्रम सामने आया है। लंबे समय तक लगभग अज्ञात रही नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) अचानक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है। इसकी वजह तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों का इस पार्टी में विलय माना जा रहा है। इस कदम ने न केवल बंगाल की राजनीति में हलचल मचा दी है, बल्कि एक छोटे राजनीतिक दल को राष्ट्रीय चर्चा का विषय भी बना दिया है।
क्या है NCPI और क्यों चर्चा में आई?
नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया चुनाव आयोग में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत पंजीकृत एक राजनीतिक दल है। हालांकि इसे अभी तक राज्य या राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त नहीं हुआ है। इसका दर्जा "पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल" का है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यही कानूनी पहचान टीएमसी के बागी सांसदों के लिए महत्वपूर्ण साबित हुई। किसी पंजीकृत राजनीतिक दल में शामिल होने से उन्हें संसदीय और कानूनी प्रक्रियाओं में एक संगठित मंच मिल सकता है।
हावड़ा में मुख्यालय, लेकिन त्रिपुरा से गहरा संबंध
चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक NCPI का मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के सांकराइल क्षेत्र में स्थित है। हालांकि इसकी सक्रिय राजनीतिक गतिविधियां मुख्य रूप से त्रिपुरा में देखने को मिली हैं।
वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में पार्टी ने सात सीटों पर उम्मीदवार उतारने की कोशिश की थी। इनमें से चार उम्मीदवारों के नामांकन खारिज हो गए थे। अंततः दो सीटों पर पार्टी ने अपने चुनाव चिह्न के साथ चुनाव लड़ा, लेकिन उसे केवल 822 वोट ही प्राप्त हुए। एक समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार को मिलाकर कुल वोट संख्या 1,198 तक पहुंची थी।
चुनावी प्रदर्शन कमजोर, लेकिन कानूनी पहचान बनी ताकत
एनसीपीआई के पास कोई स्थायी चुनाव चिह्न नहीं है। चूंकि यह मान्यता प्राप्त दल नहीं है, इसलिए हर चुनाव में उसे चुनाव आयोग द्वारा उपलब्ध कराए गए फ्री सिंबल में से किसी एक का चयन करना पड़ता है।
हालांकि चुनावी प्रदर्शन बेहद सीमित रहा, लेकिन पार्टी का पंजीकृत होना अब उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आया है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यही कारण है कि टीएमसी के असंतुष्ट सांसदों ने इसे अपने नए राजनीतिक मंच के रूप में चुना।
चुनाव के बाद गायब हो गई थी पार्टी
त्रिपुरा में पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ चुके कुछ उम्मीदवारों ने दावा किया कि चुनाव समाप्त होने के बाद संगठन लगभग निष्क्रिय हो गया था। कई नेताओं का कहना है कि चुनाव के बाद पार्टी नेतृत्व से उनका संपर्क टूट गया था और संगठनात्मक गतिविधियां भी रुक गई थीं।
बताया जाता है कि संसाधनों की कमी और आंतरिक मतभेदों के चलते पार्टी पश्चिम बंगाल पंचायत चुनावों और अन्य राजनीतिक योजनाओं को आगे नहीं बढ़ा सकी थी।
संसद में बढ़ेगी NCPI की ताकत
टीएमसी से अलग हुए सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता और बैठने की व्यवस्था की मांग की है। इसके बाद तृणमूल के वरिष्ठ नेता सुदीप बंद्योपाध्याय ने भी पुष्टि की कि बागी गुट का एनसीपीआई में विलय हो चुका है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटनाक्रम के बाद NCPI का स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है। जो पार्टी कभी कुछ सौ वोटों तक सीमित थी, वह अब लोकसभा में प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराने की स्थिति में दिखाई दे रही है। यह घटनाक्रम एक बार फिर साबित करता है कि भारतीय राजनीति में छोटे और कम चर्चित दल भी अचानक बड़े राजनीतिक समीकरणों का केंद्र बन सकते हैं।


