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20 बागी टीएमसी सांसदों के दावे से चर्चा में आई एनसीपीआई, बन सकती है पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी

वीकेंड तक लगभग अज्ञात रही एक राजनीतिक पार्टी ने सोमवार को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट से चर्चा में आ गई। पार्टी ने सोमवार को सोशल मीडिया पर एक ग्राफिकल प्रस्तुति साझा की, जिसमें लोकसभा में पश्चिम बंगाल से सांसदों के संभावित प्रतिनिधित्व को दर्शाया गया, जिसमें पार्टी के सांसदों की संख्या राज्य की दो मुख्य राजनीतिक पार्टियों की कुल संख्या के बराबर दिखाई गई।

20 बागी टीएमसी सांसदों के दावे से चर्चा में आई एनसीपीआई, बन सकती है पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी
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नई दिल्ली)। वीकेंड तक लगभग अज्ञात रही एक राजनीतिक पार्टी ने सोमवार को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट से चर्चा में आ गई। पार्टी ने सोमवार को सोशल मीडिया पर एक ग्राफिकल प्रस्तुति साझा की, जिसमें लोकसभा में पश्चिम बंगाल से सांसदों के संभावित प्रतिनिधित्व को दर्शाया गया, जिसमें पार्टी के सांसदों की संख्या राज्य की दो मुख्य राजनीतिक पार्टियों की कुल संख्या के बराबर दिखाई गई।

'नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (एनसीपीआई) के फेसबुक पेज पर पश्चिम बंगाल लोकसभा सीट-पार्टी-वार ब्योरा नाम से एक पोस्ट है। इसमें दिखाया गया है कि संसद के निचले सदन (लोकसभा) में पार्टी के 20 सदस्य हैं। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के 12 और राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के आठ सदस्य हैं। कांग्रेस का एक सदस्य है और एक सीट (बसीरहाट) मौजूदा सदस्य की मौत के बाद खाली है।

दिलचस्प बात यह है कि मामूली शुरुआत और 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बावजूद एनसीपीआई हाल ही में चर्चा में आई है, खासकर रविवार को जब तृणमूल के 20 बागी सांसदों के इसमें शामिल होने से इसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।

एनसीपीआई लोकसभा में पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है,पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है, बशर्ते स्पीकर इसे मंजूरी दें।जनवरी 2023 में रजिस्टर्ड यह पार्टी अभी भारत के चुनाव आयोग के पास रजिस्टर्ड अनरिकॉग्नाइज्ड पॉलिटिकल पार्टी के तौर पर दर्ज है।

इस तरह से यह कानूनी रूप से रजिस्टर्ड पार्टी तो है, लेकिन इसे राज्य या राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर मान्यता नहीं मिली है। इसलिए इसे चुनाव के लिए आरक्षित चुनाव चिह्न नहीं मिलते और न ही सरकारी मीडिया पर मुफ्त एयरटाइम या प्रचार के लिए सब्सिडी वाली सुविधाएं जैसी सहूलियतें मिलती हैं। मान्यता पाने के लिए लगातार अच्छा चुनावी प्रदर्शन करना होगा और राज्य या राष्ट्रीय चुनावों में तय वोट शेयर या सीटों की संख्या हासिल करनी होगी।

आर्थिक रूप से उपलब्ध रिकॉर्ड बताते हैं कि पार्टी को कुल 1.13 लाख रुपए का चंदा मिला है, जो इसके सीमित आर्थिक आधार को दिखाता है। रिपोर्टों के अनुसार, यह पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के बांकरा शहर के एक पते पर रजिस्टर्ड है। कहा जाता है कि पार्टी त्रिपुरा में कुछ सामाजिक गतिविधियों में शामिल रही है और उसने 2023 के विधानसभा चुनावों में कुछ सीटों पर चुनाव भी लड़ा था, लेकिन चुनावी तौर पर कोई खास असर नहीं डाल पाई।

अपने चुनावी सफर की शुरुआत में एनसीपीआई ने त्रिपुरा की सात विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, हालांकि तकनीकी कारणों से इसके चार नामांकन रद्द कर दिए गए थे। चावामानु विधानसभा सीट पर पार्टी के उम्मीदवार बरजेदा त्रिपुरा को सिर्फ 536 वोट मिले, जो कुल वैध वोटों का 1.4 प्रतिशत से भी कम था।

कैलाशहर सीट पर एनसीपीआई उम्मीदवार को और भी कम यानी 286 वोट मिले। कुल मिलाकर पार्टी के तीनों उम्मीदवारों को 2000 से भी कम वोट मिले, जिससे जमीनी स्तर पर उनकी चुनावी मौजूदगी और समर्थन का दायरा सीमित होने का पता चलता है। कहा जाता है कि पार्टी अध्यक्ष उत्तिया कुंडू राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे हैं और कई राजनीतिक नेताओं के साथ उनके करीबी संबंध हैं।

पार्टी की कोषाध्यक्ष शेवली कुंडू भी पश्चिम बंगाल में एक ही पते पर रजिस्टर्ड सामाजिक संगठनों और निजी कंपनियों से जुड़ी हुई हैं। कुंडू दंपति का नेतृत्व भारत में छोटी पार्टियों की राजनीति के व्यक्तिगत स्वरूप को दर्शाता है।

एनसीपीआई नेताओं के तौर पर रिपोर्ट में जिन अन्य नामों का जिक्र आया है, उनमें शांतनु डे भी शामिल हैं।

मीडिया से बातचीत में उन्होंने बताया कि पार्टी का शुरुआती फोकस त्रिपुरा की ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (स्वायत्त जिला परिषद) के तहत आने वाले इलाकों में वंचित आदिवासी समुदायों के हितों की वकालत करने पर था।

बागी तृणमूल सांसदों के इस कदम ने पार्टी को गुमनामी से निकालकर पश्चिम बंगाल के राजनीतिक संकट के बीच एक संभावित अहम खिलाड़ी बना दिया है। यह कदम जाहिर तौर पर दलबदल विरोधी कानूनों से बचने और खुद को भाजपा के नेतृत्व वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) के साथ जोड़ने के लिए उठाया गया था।



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