फांसी की जगह मौत का इंजेक्शन देने की मांग खारिज, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मौजूदा व्यवस्था रहेगी लागू
सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की जगह लीथल इंजेक्शन से मृत्युदंड देने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने भविष्य में वैज्ञानिक प्रमाण मिलने पर समीक्षा की संभावना खुली रखी।

नई दिल्ली। मृत्युदंड देने के तरीके को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने फांसी की जगह कथित तौर पर कम पीड़ादायक विकल्प, जैसे लीथल इंजेक्शन, अपनाने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि फिलहाल भारत में फांसी के जरिए मृत्युदंड देने की मौजूदा कानूनी व्यवस्था लागू रहेगी।
याचिका में फांसी की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाते हुए इसे अधिक मानवीय विकल्प से बदलने की मांग की गई थी। हालांकि, अदालत ने इस मामले से जुड़े पुराने फैसलों को बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग को भी स्वीकार नहीं किया।
याचिकाकर्ता ने फांसी को बताया था क्रूर तरीका
सीनियर अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की ओर से दायर जनहित याचिका में दंड प्रक्रिया संहिता की पुरानी धारा 354(5), जिसे अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 393(5) के रूप में लागू किया गया है, की संवैधानिकता को चुनौती दी गई थी।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि फांसी का तरीका अत्यधिक पीड़ादायक और अमानवीय हो सकता है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार का हवाला देते हुए मृत्युदंड को कम से कम पीड़ा वाले तरीके से लागू करने की मांग की गई थी।
यूएन प्रस्ताव का भी दिया गया हवाला
याचिका में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का हवाला देते हुए कहा गया था कि जिन देशों में मृत्युदंड मौजूद है, वहां इसे ऐसे तरीके से लागू किया जाना चाहिए जिससे अनावश्यक पीड़ा कम हो। याचिकाकर्ता ने फांसी के अलावा लीथल इंजेक्शन सहित अन्य विकल्पों पर विचार करने की मांग की थी।
भविष्य में समीक्षा का रास्ता खुला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि याचिका खारिज करने का अर्थ यह नहीं है कि भविष्य में इस मुद्दे पर संवैधानिक समीक्षा की संभावना पूरी तरह खत्म हो गई है।
अदालत के मुताबिक, यदि भविष्य में ठोस वैज्ञानिक, मेडिकल या व्यावहारिक साक्ष्य सामने आते हैं, तो मृत्युदंड दिए जाने के तरीके की दोबारा समीक्षा की जा सकती है। केंद्र सरकार चाहे तो कानून, फॉरेंसिक मेडिसिन और न्यूरोसाइंस के विशेषज्ञों की समिति बनाकर फांसी के विकल्पों का अध्ययन भी कर सकती है।
केंद्र ने समिति की बात कही थी
सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने बताया था कि केंद्र सरकार इस विषय पर गंभीरता से विचार कर रही है और इसके लिए समिति गठित की गई है। हालांकि, कैदियों को फांसी और लीथल इंजेक्शन जैसे विकल्पों में से चुनने का अधिकार देने के सुझाव को केंद्र ने व्यावहारिक रूप से संभव नहीं माना था।
इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मौजूदा व्यवस्था को बरकरार रखा है, लेकिन भविष्य में नए वैज्ञानिक और चिकित्सकीय प्रमाण सामने आने पर बदलाव की संभावनाओं को पूरी तरह बंद नहीं किया है।


