सुभाष चंद्र बोस को घोषित किया जाए 'राष्ट्रपुत्र', याचिका पर भड़के CJI सूर्यकांत- एंट्री ही बैन कर देंगे
जनहित याचिका दाखिल करने वाले वकील को भी मुख्य न्यायाधीश की अदालत ने आड़े हाथों लिया है और कहा कि आप में सुधार नहीं आ सकता। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की अदालत ने कहा कि आप कोर्ट का समय खराब कर रहे हैं।

नई दिल्ली।भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी नेताजी सुभाष चंद्र बोस को 'राष्ट्र पुत्र' घोषित किया जाए। इसके अलावा उनके बनाए संगठन आजाद हिंद फौज को भारत की स्वतंत्रता का क्रेडिट दिया जाए। ऐसी मांग के साथ सुप्रीम कोर्ट में आज एक याचिका दाखिल की गई, जिसे बेंच ने खारिज कर दिया। यही नहीं जनहित याचिका दाखिल करने वाले वकील को भी अदालत ने आड़े हाथों लिया है और कहा कि आप में सुधार नहीं आ सकता।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की अदालत ने कहा कि आप कोर्ट का समय खराब कर रहे हैं। याचिकाकर्ता पी. मोहंती से कहा कि आपने हमेशा ऐसा ही काम किया है। इस तरह की अर्जियां आपकी ओर से पहले भी दाखिल की गई हैं। बेंच ने कहा कि यदि आपके रवैये में सुधार नहीं आया तो फिर हम सुप्रीम कोर्ट में आपकी एंट्री पर ही बैन लगा देंगे।
यही नहीं चीफ जस्टिस ने फटकार लगाते हुए कहा कि आप पहले भी इस तरह की मनमानी अर्जियां दाखिल करके रहे हैं। ऐसा करना सही नहीं है और इससे अदालत का समय खराब होता है। चीफ जस्टिस ने जब पहले भी ऐसी ही अर्जियां दाखिल करने वाली बात कही तो याचिकाकर्ता ने कहा कि इस बार अलग है।
इस पर चीफ जस्टिस की बेंच ने पूछ लिया कि आखिर इस याचिका को ड्राफ्ट किसने किया है। इस पर मोहंती ने कहा कि 'मुखर्जी सर' ने इसे तैयार किया है। इस पर भी बेंच ने आपत्ति जताई। इस याचिका में मुख्य रूप से दो मांगें की गई थीं। पहली यह कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस को 'राष्ट्र पुत्र' घोषित किया जाए। इसके अलावा यह भी आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया जाए कि आजाद हिंद फौज के चलते ही देश को आजादी मिली थी।
CJI का आदेश- भविष्य में इनकी कोई PIL स्वीकार ना करें
इस पर अदालत ने कहा कि आपने यह याचिका सिर्फ इसलिए डाली है कि आपको लोकप्रियता मिले। इससे पहले भी आप ऐसी ही याचिकाएं लाए हैं, जिन्हें खारिज किया गया था। बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्री विभाग को कहा कि भविष्य में इनकी कोई भी जनहित याचिका रजिस्टर न की जाए।
बता दें कि पहले भी कई वकीलों की ओर से जनहित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट आपत्ति जता चुका है। अदालत का कहना था कि लोग गैर-जरूरी मसलों को भी चर्चा पाने के लिए अदालत में ले आते हैं। उनका मकसद होता है कि किसी तरह मीडिया में चर्चा मिल जाए।


