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सोनिया गांधी को अदालत से मिली मोहलत, वोटर लिस्ट ‘जालसाजी’ मामले में देना है जवाब

सोनिया गांधी को दिल्ली के एक कोर्ट से मोहलत मिली है। मामला वोटर लिस्ट जालसाजी से जुड़ा बताया जा रहा है, जिसमें FIR दर्ज करने की मांग की गई है।

सोनिया गांधी को अदालत से मिली मोहलत, वोटर लिस्ट ‘जालसाजी’ मामले में देना है जवाब
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नई दिल्ली। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने मंगलवार को कांग्रेस नेता सोनिया गांधी को उस याचिका का जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया, जिसमें मतदाता सूची में कथित जालसाजी के जरिए उनका नाम शामिल किए जाने के आरोपों पर FIR दर्ज करने के निर्देश देने की मांग की गई है।

याचिका मैजिस्ट्रेट के उस आदेश को चुनौती देते हुए दाखिल की गई है, जिसमें आरोप की जांच से इनकार कर दिया गया था। आरोप के मुताबिक 1983 में भारतीय नागरिकता हासिल करने से 3 साल पहले ही सोनिया गांधी का नाम वोटर लिस्ट में मौजूद था।

स्पेशल जज विशाल गोगने ने सोनिया गांधी की ओर से पेश वकील के अनुरोध को मंजूर कर लिया और मामले की सुनवाई 7 फरवरी तक के लिए स्थगित कर दी। स्पेशल जज ने बीते साल 9 दिसंबर को इस याचिका पर सोनिया गांधी और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया था। यह रिवीजन याचिका राउज एवेन्यू कोर्ट के ‘सेंट्रल दिल्ली कोर्ट बार एसोसिएशन’ के उपाध्यक्ष एडवोकेट विकास त्रिपाठी ने दायर की है।

जालसाजी और धोखेधड़ी का दावा

एडवोकेट विकास त्रिपाठी की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट पवन नारंग ने मजिस्ट्रेट के सामने आरोप लगाया था कि जनवरी 1980 में सोनिया गांधी का नाम नई दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता के रूप में जोड़ा गया था, जबकि वह भारतीय नागरिक नहीं थीं। याचिका में विकास त्रिपाठी ने ‘जालसाजी और धोखाधड़ी’ का दावा किया है।

मजिस्ट्रेट अदालत ने कही थी ये बात

11 सितंबर के आदेश में मजिस्ट्रेट अदालत ने मुद्दे को पूरी तरह से अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया था। अदालत ने कहा था कि उसके लिए ऐसी जांच शुरू करने की कोशिश भी करना, सक्षम संवैधानिक प्राधिकारियों (केंद्र सरकार और चुनाव आयोग) को सौंपी गई जिम्मेदारी में अनुचित दखल और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 329 का उल्लंघन होगा।

दखल को उचित नहीं ठहराया जाएगा

शिकायतकर्ता को चेताते हुए अदालत ने कहा था कि जो सीधे नहीं किया जा सकता, वह परोक्ष रूप से भी नहीं किया जा सकता। महज बीएनएस 2023 के तहत अपराधों को जोड़ने मात्र से इस अदालत के संवैधानिक प्राधिकारों में किसी भी दखल को उचित नहीं ठहराया जाएगा।


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