SC-ST एक्ट की धाराओं को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, एफआईआर और गिरफ्तारी प्रक्रिया पर उठे सवाल
SC-ST एक्ट की धारा 18-A समेत कई प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका में एफआईआर, गिरफ्तारी, अग्रिम जमानत और सजा से जुड़े प्रावधानों पर सवाल उठाए गए हैं।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कुछ प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 में दिए गए समानता, जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी प्रक्रिया से जुड़े अधिकारों के प्रभावित होने का कारण बन सकते हैं। हालांकि, इन दावों पर अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट को करना है।
धारा 18-A को लेकर सबसे बड़ा सवाल
याचिका में धारा 18-A पर विशेष रूप से आपत्ति जताई गई है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक इस प्रावधान के तहत SC/ST एक्ट के मामलों में FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं है और गिरफ्तारी के लिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था भी नहीं है।
याचिकाकर्ताओं ने इसे सुप्रीम कोर्ट के 2018 के सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य फैसले के संदर्भ में चुनौती दी है। उनका दावा है कि बाद में संसद द्वारा धारा 18-A जोड़े जाने से उस फैसले में दिए गए सुरक्षा संबंधी निर्देशों का प्रभाव खत्म हुआ।
अग्रिम जमानत और गिरफ्तारी की प्रक्रिया भी मुद्दा
याचिका में धारा 18 को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रावधान SC/ST एक्ट के मामलों में अग्रिम जमानत की राह को सीमित करता है। उनके मुताबिक यदि किसी मामले में आरोप गलत या दुर्भावनापूर्ण पाए जाते हैं तो गिरफ्तारी और लंबी कानूनी प्रक्रिया से व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
धारा 8 के तहत कुछ परिस्थितियों में आरोपी के खिलाफ वैधानिक अनुमान से जुड़े प्रावधानों को भी याचिकाकर्ताओं ने निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के संदर्भ में चुनौती दी है।
सजा और परिवीक्षा से जुड़े प्रावधान भी चुनौती में
याचिका में धारा 19 के तहत दोषसिद्ध व्यक्तियों को परिवीक्षा संबंधी राहत उपलब्ध नहीं होने पर भी सवाल उठाया गया है। इसके अलावा धारा 3(2)(v) के तहत कुछ अपराधों में बढ़ी हुई सजा और धारा 3(2)(i) से जुड़े मृत्युदंड के प्रावधान को अनुपातिकता के सिद्धांत के आधार पर चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि कानून के कुछ प्रावधानों के कथित दुरुपयोग से निर्दोष लोगों की गिरफ्तारी और लंबे समय तक मुकदमे की स्थिति पैदा हो सकती है। साथ ही उन्होंने पुलिस को FIR और गिरफ्तारी की प्रक्रिया के संबंध में स्पष्ट दिशानिर्देश देने की मांग की है।
अंतरिम राहत की भी मांग
याचिका के साथ दाखिल अंतरिम आवेदन में धारा 8, 18, 18-A और 19 के संचालन पर रोक लगाने की मांग की गई है। केंद्र सरकार, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को मामले में पक्षकार बनाया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर 22 सितंबर 2026 की कार्यवाही और सूची उपलब्ध है।


