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पितृत्व अवकाश को बनाया जाए कानूनी अधिकार, राज्यसभा में उठी मांग

Paternity Leave: चड्ढा ने कई देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कर्मियों को लंबा अवकाश मिलता है। उन्होंने कहा कि भारत में भी सोच में बदलाव लाने की जरूरत है क्योंकि बच्चों के लालन-पोषण की जिम्मेदारी सिर्फ मां की ही नहीं, बल्कि यह साझा जिम्मेदारी है।

पितृत्व अवकाश को बनाया जाए कानूनी अधिकार, राज्यसभा में उठी मांग
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नई दिल्ली। राज्यसभा में देश में पितृत्व अवकाश को कानूनी अधिकार का दर्जा दिए जाने की मांग की गई। आम आदमी पार्टी (आप) के सांसद राघव चड्ढा ने इसकी मांग करते हुए कहा कि बच्चों के लालन-पोषण की जिम्मेदारी सिर्फ मां की ही नहीं, बल्कि यह साझा दायित्व है। उच्च सदन में विशेष उल्लेख के जरिए यह मुद्दा उठाते हुए आप सांसद ने कहा कि अभी केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए 15 दिनों के (पितृत्व) अवकाश का प्रावधान है लेकिन निजी क्षेत्र में नहीं है।

उन्होंने कहा कि देश के कुल कार्यबल का करीब 90 फीसदी यानी बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र में काम करता है। इसलिए उन्हें भी यह अधिकार मिलना चाहिए।

चड्ढा ने कई देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कर्मियों को लंबा अवकाश मिलता है। उन्होंने कहा कि भारत में भी सोच में बदलाव लाने की जरूरत है क्योंकि बच्चों के लालन-पोषण की जिम्मेदारी सिर्फ मां की ही नहीं, बल्कि यह साझा जिम्मेदारी है। बाद में उन्होंने सोशल मीडिया पर अपने भाषण की एक वीडियो क्लिप साझा करते हुए लिखा, “मैंने संसद में यह मांग की कि भारत में 'पैटर्निटी लीव' (पितृत्व अवकाश) एक कानूनी अधिकार होना चाहिए।”

माता-पिता दोनों को बधाई दी जाती है

उन्होंने आगे लिखा, जब किसी बच्चे का जन्म होता है, तो माता-पिता दोनों को बधाई दी जाती है। लेकिन बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी किसी एक पर ही यानी सिर्फ माँ पर क्यों आती है। एक पिता को अपने नवजात बच्चे की देखभाल करने और अपनी नौकरी बचाने के बीच किसी एक को चुनने की मजबूरी नहीं होनी चाहिए। और एक माँ को भी, बच्चे के जन्म और उसके बाद ठीक होने की प्रक्रिया से, अपने पति के सहारे के बिना नहीं गुजरना चाहिए।

बच्चे की देखभाल एक साझा जिम्मेदारी

चड्ढा ने कहा कि बच्चे के जन्म के ठीक बाद, महिला को अपने पति की मौजूदगी की सबसे ज़्यादा जरूरत होती है। अपनी पत्नी के प्रति पति की देखभाल की ज़िम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने लिखा, “मैंने संसद में यह मुद्दा इसलिए उठाया, क्योंकि बच्चे की देखभाल एक साझा जिम्मेदारी है। हमारे कानूनों में भी यह बात झलकनी चाहिए।


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