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टीएमसी के 20 बागी सांसदों को ओम बिरला का नोटिस, 7 दिन में देना होगा जवाब; सदस्यता पर फैसला जल्द

टीएमसी के 20 बागी सांसदों को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने नोटिस जारी किया है। सायोनी घोष और यूसुफ पठान समेत सभी सांसदों को 7 दिन में जवाब देना होगा।

टीएमसी के 20 बागी सांसदों को ओम बिरला का नोटिस, 7 दिन में देना होगा जवाब; सदस्यता पर फैसला जल्द
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नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (TMC) में चल रहे राजनीतिक विवाद के बीच लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने पार्टी के 20 बागी सांसदों को नोटिस जारी किया है। इन सांसदों के खिलाफ टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव और लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी ने अयोग्यता याचिकाएं दाखिल की थीं। स्पीकर कार्यालय की ओर से जारी नोटिस में सभी सांसदों से इसे प्राप्त होने के सात दिनों के भीतर अपना जवाब देने को कहा गया है।

अभिषेक बनर्जी की याचिका पर कार्रवाई

अभिषेक बनर्जी ने 20 सांसदों के खिलाफ अलग-अलग अयोग्यता याचिकाएं दाखिल कर लोकसभा अध्यक्ष से जल्द फैसला लेने की मांग की थी। सीएमसी का आरोप है कि पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव जीतने वाले इन सांसदों ने बाद में पार्टी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) के साथ जाने और विलय का दावा किया।

टीएमसी का कहना है कि यह कदम संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता का आधार बन सकता है। अब स्पीकर की ओर से नोटिस जारी होने के बाद सांसदों को अपना पक्ष रखने का औपचारिक अवसर मिल गया है।

सायोनी घोष और यूसुफ पठान समेत कई बड़े नाम

बागी सांसदों में कई चर्चित चेहरे शामिल हैं। इनमें पूर्व क्रिकेटर और सांसद यूसुफ पठान, अभिनेत्री से नेता बनीं सायोनी घोष, शताब्दी रॉय, रचना बनर्जी, जून मालिया और प्रसून बनर्जी जैसे नाम शामिल हैं। बागी धड़े में वरिष्ठ सांसदों काकोली घोष दस्तीदार और सुदीप बंद्योपाध्याय का नाम भी प्रमुखता से सामने आया है।

इन सांसदों ने खुद को अलग समूह के रूप में पेश करते हुए एनसीपीआई में विलय का दावा किया था। उनका तर्क है कि पर्याप्त संख्या में सांसदों के साथ विलय होने के कारण उन पर दल-बदल विरोधी कानून लागू नहीं होना चाहिए।

दो-तिहाई सांसदों के समर्थन का दावा

बागी सांसदों का कहना है कि उनके पास TMC के लोकसभा सांसदों का दो-तिहाई समर्थन है और इसी आधार पर उनका दूसरे राजनीतिक संगठन में विलय हुआ है। दूसरी ओर, अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाला टीएमसी धड़ा इस दावे को चुनौती दे रहा है। पार्टी का कहना है कि केवल सांसदों का किसी अन्य राजनीतिक संगठन से जुड़ना अपने आप में वैध विलय नहीं माना जा सकता।

लोकसभा अध्यक्ष ने बागी सांसदों के लिए सदन में अलग बैठने की व्यवस्था की है, लेकिन उन्हें अलग संसदीय दल के रूप में मान्यता दिए जाने को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में भी चल रही सुनवाई

अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय में कथित देरी को लेकर अभिषेक बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। 25 अगस्त को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए 20 बागी सांसदों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। हालांकि, अदालत ने लोकसभा स्पीकर को सीधे नोटिस जारी नहीं किया।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया था कि स्पीकर कार्यालय की ओर से सांसदों को नोटिस पहले ही जारी किए जा चुके हैं।

अब 7 दिन में देना होगा जवाब

अब 20 सांसदों के सामने सबसे अहम चुनौती अपने जवाब में यह स्पष्ट करना है कि टीएमसी से अलग होकर एनसीपीआई में जाने और कथित विलय का उनका फैसला किस कानूनी आधार पर वैध है। जवाब मिलने के बाद स्पीकर यह तय करेंगे कि मामला दल-बदल विरोधी कानून के तहत आता है या नहीं।

इस फैसले का असर केवल 20 सांसदों की सदस्यता पर ही नहीं, बल्कि लोकसभा में टीएमसी की ताकत और बागी गुट की राजनीतिक स्थिति पर भी पड़ सकता है।


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