जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड की रिपोर्ट लोकसभा में पेश, साजिश के नहीं मिले संकेत
जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड की तीन सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट लोकसभा में पेश हुई। रिपोर्ट में साजिश के संकेत नहीं मिले, लेकिन नकदी बरामदगी को गंभीर मामला बताया गया।

नई दिल्ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े चर्चित नकदी मामले की जांच रिपोर्ट बुधवार को लोकसभा में पेश कर दी गई। संसद के मानसून सत्र के समापन से एक दिन पहले रखी गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मामले में किसी साजिश के स्पष्ट संकेत नहीं मिले। हालांकि, समिति ने सरकारी आवास के भीतर इतनी बड़ी मात्रा में नकदी पाए जाने को गंभीर विषय माना है।
तीन सदस्यीय समिति ने की थी जांच
जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की जांच के लिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अरविंद कुमार ने की। इसमें बॉम्बे हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर और कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य शामिल थे।
समिति ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत मामले की जांच की। रिपोर्ट में जांच के दौरान दर्ज किए गए मौखिक बयानों और दस्तावेजी साक्ष्यों को शामिल किया गया है। समिति ने अपनी रिपोर्ट मई 2026 में ही लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी थी।
जांच के दौरान जवाबों पर भी सवाल
रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस वर्मा जांच प्रक्रिया के दौरान कुछ सवालों के स्पष्ट जवाब देने से बचते दिखाई दिए। समिति ने नकदी की बरामदगी को ऐसा तथ्य माना जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
रिपोर्ट में हालांकि किसी साजिश के संकेत नहीं मिलने की बात कही गई है। जस्टिस वर्मा ने पहले अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए पूरे घटनाक्रम को साजिश बताया था।
आग के बाद सामने आया था मामला
पूरा विवाद 14 मार्च 2025 की रात शुरू हुआ था। उस समय जस्टिस यशवंत वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट में न्यायाधीश थे। उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास में आग लगने के बाद दमकलकर्मियों और अधिकारियों को परिसर के एक स्टोर रूम में बड़ी मात्रा में अधजली और बिना जली नकदी मिली थी।
घटना के बाद मामला सार्वजनिक हुआ और जस्टिस वर्मा पर गंभीर सवाल उठे। बाद में उन्हें उनके मूल कैडर इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थानांतरित किया गया। इसके बाद उन्होंने न्यायिक पद से इस्तीफा दे दिया।
पहले भी हुई थी आंतरिक जांच
इससे पहले तत्कालीन सीजेआई संजीव खन्ना द्वारा गठित आंतरिक न्यायिक समिति ने भी मामले की जांच की थी। उस समिति ने पाया था कि जिस स्टोर रूम से नकदी बरामद हुई, उस पर जस्टिस वर्मा का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण था।
जुलाई 2025 में 200 से अधिक सांसदों ने जस्टिस वर्मा को पद से हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव की प्रक्रिया शुरू की थी। अब वैधानिक जांच समिति की रिपोर्ट संसद के पटल पर रखे जाने के बाद मामले को लेकर आगे की संसदीय प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो गई है।


